ई-कचरे के समाधान की दिशा में बड़ी उपलब्धि
भारत ही नहीं पूरी दुनिया ई-कचरे के निस्तारण की समस्या से जूझ रही है। ऐसे में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के शोधकर्ताओं ने एक स्वदेशी प्रायोगिक संयंत्र विकसित किया है। यह प्रति वर्ष 100 टन इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का प्रसंस्करण करने की क्षमता रखता है। यह प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी) के उपचार के लिए डिजाइन किया गया है। इसे भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के तिरुचिरापल्ली में स्थित परिसर में स्थापित किया गया है। पीसीबी इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट सबसे अधिक खतरनाक और धातुओं से भरपूर घटकों में से एक हैं। इनमें तांबा, सीसा और टिन जैसी धातुएं होती हैं। यदि इस कचरे का उचित प्रबंधन नहीं किया जाए तो ये धातुएं मिट्टी और भू-जल में रिसकर लंबे समय तक पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती हैं। ऐसे समय में जब भारत हर वर्ष लगभग 50 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा कर रहा हो, तब आईआईटी मद्रास के शोधार्थियों की यह उपलब्धि बहुत बड़ी है। क्योंकि यह अनुपयोगी हुए ई-उपकरणों से मिट्टी पानी या वायु को प्रदूषित किए बिना मूलवान धातुएं निकाल कर उन्हें पुन: उपयोग के योग्य बना देता है।
आईआईटी मद्रास के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के प्राध्यापक एस. पुश्पावनम और वाई.बी.जी. वर्मा का कहना है कि यह संयंत्र साफ-सुथरे तरीके से धातु निकालने के लिए एक ऐसा मॉडल है, जिसे आसानी से बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है। यह काम मेक इन इंडिया सर्कुलर इकोनॉमी और ज़रूरी खनिजों की सुरक्षा के लक्ष्यों के अनुरूप है। यह अकादमिक अनुसंधान को प्रौद्योगिकी विकास में बदलने का दुर्लभ उदाहरण है। इस प्रक्रिया को एकमात्र अम्ल के प्रयोग से सम्पन्न कर लिया जाता है। इसमें उच्च स्तरीय सुरक्षा के स्वचालित उपाय किए गए हैं। यह संयंत्र पूरी तरह भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित है। यह संयंत्र भारत और एशियाई देशों के लिए इसलिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि पर्यावरण पर वैश्विक निगरानी रखने वाली सिएटल स्थित संस्था बासेल एक्शन नेटवर्क (बीएएन) की रिपोर्ट में जानकारी दी है कि अमरीका से लाखों टन खराब इलेक्ट्रोनिक सामग्री कई देशों में निस्तारण की दृष्टि से भेजी जा रही है, जिनमें से अधिकांश दक्षिण-पूर्व एशिया के विकासशील देश हैं। इन देशों में इस खतरनाक कचरे का सुरक्षित रूप से नष्ट करने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए वे इसे लेने को तैयार नहीं हैं। बावजूद दस अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां उपयेग की उम्र समाप्त कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे को एशिया और पश्चिमी एशिया के निर्धन देशों में ठिकाने लगा रही है। इसे ई-कचरे की छिपी हुई सुनामी माना जा रहा है।
पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाली संस्थाओं को यह आकलंन करना कठिन हो रहा है कि घातक कचरा जिन देशों में फेंका जा रहा है, वहां का वायुमंडल किस हद तक प्रभावित एवं प्रदूषित होगा। वहां के लोगों के स्वास्थ पर कितना असर पड़ेगा, यह अंदाज़ा कोई नहीं लगा पा रहा है। इस कचरे में कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट, मोबाइल और अन्य आईटी उपकरण शामिल हैं। इनमें सीसा, कैडमियम और पारा जैसी सामग्रियां हैं, जो मूल्यावन होने के साथ विशाक्त हैं। जैसे-जैसे उपकरण नए मॉडल के साथ तेज़ी से बदले जा रहे हैं, वैसे-वैसे पुनर्चक्रित नहीं किए जाने वाला कचरा पांच गुना बढ़ता जा रहा है। इस नज़रिये से भारत में निर्मित यह संयंत्र अत्यंत उपयोगी है। भविष्य में इसके निर्यात से भारत विदेशी पूंजी भी कमाएगा।
संयक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ और अनुसंधान शाखा (यूएनआईटीएआर) के अनुसार एकत्रित आंकड़े बताते है कि वैश्विक स्तर पर 2022 में 6.2 करोड़ मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन किया गया। 2030 तक इसके उत्पादन की मात्रा 8.2 करोड़ मीट्रिक टन हो जाने का अनुमान है। रपट के अनुसार हर महीने लगभग 2000 कंटेनरों में लगभग 33,000 मीट्रिक टन अमरीका में इस्तेमाल किया गया ई-कचरा अमरीकी बंदरगाहों से बाहर भेजा जाता है। इन कंटेनरों की खेपों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों को ई-कचरा ब्रॉकर कहा जाता है। ये आमतौर पर स्वयं कचरे का पुनर्चक्रण करने की बजाय इसे लाचार गरीब देशों की बंदरगाहों पर उतार देती हैं। यह कचरा लगातार एशियाई देशों में कचरे के बोझ को बढ़ाकर कई तरह के पर्यावरणीय संकट पैदा कर जल, वायु और पृथ्वी को प्रदूषित कर रहा है। इस कचरे से घातक लैंडफिल गैसों का भी उत्सर्जन कुछ सालों के बाद होने लगता है। इनसे उत्पन ज़हरीला रसायन जल और मिट्टी को दूषित करता है। इस कचरे का बहुत बड़ा हिस्सा गरीब लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए कबाड़खानों में पहुंचा देते हैं। यहां काम करने वाले मज़दूर अकसर बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के उन्हें हाथों से जला एवं पिघला कर अलग कर खोलते हैं। इस प्रक्रिया से विषाक्त धुआं निकलता है, जो अत्यंत हानिकारक होता है। बासेल एक्शन नेटवर्क की संधि के मुताबिक इस्तेमाल किए गए ई-कचरे को एक देश से दूसरे देश भेजने की अनुमति केवल ऐसे कचरे की है, जिसे पुनर्चक्रित करके पुन: इस्तेमाल किया जा सके और जो पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करने वाला हो। लेकिन ये कंपनियां ऐसी किसी शर्त का पालन नहीं कर रहीं।
आज ई-कचरा, जिसमें बड़ी मात्रा में प्लास्टिक के उपकरण भी शामिल हैं, नष्ट करना भारत समेत दुनिया के देशों के लिए मुश्किल हो रहा है। इसे नष्ट करने के जैविक उपाय तलाशे जा रहे हैं। जापान के क्योटो विश्वविद्यालय ने एक ऐसे जीवाणु के अनुसंधान का दावा किया है, जो जैविक रूप से प्लास्टिक नष्ट कर सकता है। हालांकि भारत में यही काम औद्योगिक एवं प्रौद्योगिकी कचरे को नष्ट करने के लिए केंचुओं से कराया जा रहा है।स्पष्ट है, समस्या बने ई-कचरे को यदि पुनर्चक्रित करने के संयंत्र बड़ी संख्या में लगाए जाते हैं तो बड़े पैमाने पर युवा तकनीकियों को रोज़गार तो मिलेगा। विकासशील और गरीब देश व्यापक स्तर पर इस कचरे को नष्ट करने के झंझट से भी मुक्त हो जाएंगे।
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