नदियों का विषाक्त होता पानी

देश भर में पर्यावरण और वातावरण संबंधी नियमों एवं कानूनों का होने वाला निर्मम उल्लंघन आज इस स्तर तक पहुंच गया है कि कई राज्यों में नदियों का पानी अतीव दूषित होकर गया है। कई राज्यों में यह पानी इन्सानों के लिए तो क्या, परिन्दों और जानवरों के पीने के योग्य भी नहीं रहा। इन प्रदेशों के औद्योगिक क्षेत्रों, सीवरेज विभाग और खासकर स्थानीय निकाय विभाग की लापरवाही के कारण उद्योगों का गंदा और विषाक्त पानी, सीवरेज का मल-मूत्र तक बिना साफ किये नदियों-नालों में डाला जाता है। त्रासदी यह भी है कि यह पानी अन्तत: गाद का रूप धारण करने लगता है जो बेहद हानिकर हो जाता है। यह स्थिति पूरे देश के लिए और खासकर औद्योगिक क्रांति एवं कृषि क्षेत्र वाले राज्यों के लिए बेहद खतरनाक हो चुकी है।
नि:संदेह यह स्थिति राज्यों के नागरिक प्रशासन की कुव्यवस्था को लेकर अनेकानेक प्रश्न खड़े करती है। केन्द्रीय वातावरण, वनों एवं पर्यावरण संबंधी मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार नदियों के इस प्रदूषण ने पर्यावरण को भी भारी नुक्सान पहुंचाया है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि नदियों के इस प्रदूषण, और पर्यावरण पर पड़े असर के बाद देश में मौसम की प्राकृतिक चाल भी प्रभावित हुई है। रिपोर्ट के विवरण में यह भी दर्ज है कि देश भर के राज्यों में कहीं सूखा और कहीं बाढ़ों का उपजना भी इस मौसमी मिज़ाज का ही प्रभाव है। कुछ राज्यों के नदी-नालों में सीवरेज और बरसाती नालों का पानी इतनी लापरवाही से गिराया जाता है कि प्रत्येक स्तर पर नियमों एवं कानूनों की धज्जियां उड़ाई जाती पाई गई हैं। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि देश में 4,498 ऐसे उद्योग हैं जो अति प्रदूषित हैं। इनमें से 601 उद्योग ऐसे हैं जो अत्यधिक प्रदूषण-उत्पादक इकाइयां हैं, और कि ये उद्योग अतीव प्रदूषित एवं विषाक्त पानी अपने-अपने प्रदेश की नदियों, नहरों और नालों में बड़ी लापरवाही से डालते हैं। सीवरेज और उद्योगों का प्रदूषित पानी डाले जाने के बाद स्थिति आज यह हो गई है कि धर्म एवं आस्था का निर्वहन करने वाले इस देश में 296 नदियों का पानी स्नानादि के लिए भी योग्य नहीं रह गया है। नि:संदेह इस स्थिति को लेकर कई बार सामाजिक, धार्मिक और नागरिक संस्थाओं की ओर से समय-समय पर आवाज़ उठाई जाती रहती है। इसके आधार पर केन्द्र और राज्यों की सरकारें कई बार हरकत में आती हैं किन्तु मामला अन्तत: त्रिशंकु की तरह अधर में लटक कर रह जाता है। सितम की बात यह भी सामने आई है कि गम्भीर शिकायतें होने के बावजूद, अधिकतर दोषी अथवा ज़िम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी किये जाने से कभी आगे नहीं बढ़ती।
केन्द्रीय मंत्रालय की इस रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में देश में 271 नदियां प्रदूषण मंत्रालय के राडार तले आती हैं। जहां-जहां और जिन राज्यों से ये नदियां गुज़रती हैं, वहां के अधिकतर स्थानों पर इनका पानी मनुष्यों के लिए नहाने के योग्य भी नहीं रहा। यह स्थिति उस देश में है जहां के लोगों के लिए धार्मिक आस्था के तहत स्नान करना अत्यावश्यक माना जाता है। देश का प्रदूषण मंत्रालय समय-समय पर देश की नदियों आदि के प्रदूषण के स्तर की पैमाइश करता है, और ज़िम्मेदार इकाइयों केविरुद्ध शिकायतें भी तैयार करता है, किन्तु ये शिकायतें भी अन्तत: प्रभावहीन होकर रह जाती हैं। कानून के अनुसार सम्पन्न राज्यों के प्राय: सभी बड़े उद्योगों में ट्रीटमैंट प्लांट लगाना आवश्यक होता है, किन्तु अधिकतर राज्यों में कई बड़े उद्योग भी इस आवश्यक सुविधा के बिना ही चलाये जा रहे हैं।
हम समझते हैं कि नि:संदेह यह स्थिति जन-साधारण और खासकर बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य हेतु बेहतर नहीं है, किन्तु प्रशासनिक कोताहियों, भ्रष्टाचार और थोड़े से लालच की घटिया वृत्ति के कारण देश के नदी-नालों का पानी बेहद गंदला होकर रह गया है। इस गंदे प्रदूषित पानी में पलने वाली मछलियों और इस पानी को पीने वाले दुधारू पशुओं के कारण समाज में कई प्रकार के रोगाणु पनपने लगते हैं जो भावी पीढ़ियों के लिए कदापि हितकर नहीं। हम समझते हैं कि इस स्थिति की रोकथाम हेतु सबसे बड़ी एवं प्राथमिक आवश्यकता उद्योगों एवं सीवरेज के गंदे पानी को स्वच्छ करके पुन: खेतों में सिंचाई हेतु प्रयुक्त किये जाने की परियोजना तैयार करना है। इसी प्रकार नदी-नालों के गंदे पानी को भी ट्रीट करके खेतों तक पहुंचाने की बड़ी आवश्यकता है। कुछ ऐसे प्रयास करके ही देश गंदे एवं प्रदूषित पानी की समस्या से बच सकता है। 

#नदियों का विषाक्त होता पानी