राजनीति में लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए

भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई घटना नहीं है। समय-समय पर विभिन्न दलों के नेता और सांसद राजनीतिक परिस्थितियों, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं या वैचारिक मतभेदों के कारण अपने दल छोड़कर दूसरे दलों का दामन थामते रहे हैं। हाल के वर्षों में कई राज्यों में यह प्रवृत्ति और अधिक बढ़ी है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि सत्ता पक्ष में शामिल होने वाले बागी सांसदों को क्या अगले चुनाव में टिकट मिलेगा?
राजनीति में टिकट का निर्धारण केवल निष्ठा के आधार पर नहीं होता, बल्कि जीत की संभावना, जनाधार और पार्टी की रणनीति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सत्ता पक्ष आमतौर पर उन नेताओं को अपने साथ जोड़ना चाहता है जो चुनावी दृष्टि से लाभकारी साबित हो सकते हैं। इसलिए यदि कोई बागी सांसद अपने क्षेत्र में मजबूत जनाधार रखता है और उसके आने से पार्टी को राजनीतिक फायदा होता है, तो उसे टिकट मिलने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि यह भी सच है कि किसी दल में वर्षों से कार्य कर रहे पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए ऐसे फैसले असंतोष का कारण बन सकते हैं। जब बाहर से आए नेता को प्राथमिकता मिलती है, तो संगठन के भीतर नाराज़गी बढ़ने का खतरा रहता है। कई बार यही नाराज़गी चुनावी नुकसान का कारण भी बन जाती है। इसलिए राजनीतिक दलों को संतुलन बनाकर चलना पड़ता है।
दूसरी ओर बागी सांसदों के सामने भी चुनौती कम नहीं होती। दल बदलने के बाद उन्हें नए दल की विचारधारा, संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित करनी पड़ती है। केवल सत्ता पक्ष में शामिल हो जाना टिकट या राजनीतिक भविष्य की गारंटी नहीं है। यदि पार्टी नेतृत्व को लगता है कि संबंधित नेता चुनाव जिताने में सक्षम नहीं हैए तो टिकट किसी अन्य उम्मीदवार को भी दिया जा सकता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में दल-बदल की बढ़ती घटनाएं राजनीतिक सिद्धांतों और जनादेश की भावना पर भी सवाल खड़े करती हैं। मतदाता किसी उम्मीदवार के साथ-साथ उसकी पार्टी और विचारधारा को भी ध्यान में रखकर मतदान करता है। ऐसे में बार-बार होने वाले राजनीतिक पलायन से जनता के बीच विश्वास का संकट पैदा होना स्वाभाविक है। बागी सांसदों या विधायकों को टिकट मिलेगा या नहीं, इसका निर्णय राजनीतिक समीकरणों, जनाधार, संगठनात्मक संतुलन और चुनावी संभावनाओं पर निर्भर करेगा, लेकिन यह अपेक्षा अवश्य की जानी चाहिए कि राजनीति में अवसरवादिता के बजाय जनसेवा, सिद्धांत और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता मिले। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की निष्ठा, सिद्धांतों तथा जनसेवा की भावना से तय होती है। दुर्भाग्यवश हाल के वर्षों में दल-बदल, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और सत्ता प्राप्ति की राजनीति ने अवसरवादिता को बढ़ावा दिया है। इससे जनता के बीच राजनीति की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं। राजनीति का मूल उद्देश्य समाज और राष्ट्र की सेवा है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इस विश्वास के साथ चुनती है कि वे उनके हितों, समस्याओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करेंगे। लेकिन जब निर्वाचित प्रतिनिधि व्यक्तिगत लाभ, पद या सत्ता के लिए बार-बार राजनीतिक निष्ठा बदलते हैं, तो मतदाताओं का विश्वास कमज़ोर होता है। लोकतंत्र में यह स्थिति स्वस्थ नहीं मानी जा सकती। सिद्धांत आधारित राजनीति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला होती है। विचारधारा, नीतियों और जनहित के मुद्दों पर आधारित राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र को मज़बूत करती है। इसके विपरीत अवसरवादिता राजनीतिक मूल्यों को कमज़ोर करती है और जनता में निराशा पैदा करती है। राजनीतिक दलों को भी ऐसे नेताओं को बढ़ावा देना चाहिए जो संगठन और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध हों।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति में नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। जन प्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि उनकी पहली ज़िम्मेदारी जनता के प्रति है, न कि व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के प्रति। लोकतंत्र तभी मज़बूत होगा जब जनसेवा को राजनीति का केंद्र बनाया जाएगा। राजनीति में अवसरवादिता के बजाय जनसेवा, सिद्धांत और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता देना समय की मांग है। यही लोकतंत्र की गरिमा बनाए रखने और जनता के विश्वास को मज़बूत करने का सबसे प्रभावी मार्ग है। (एजेंसी)

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