पंजाब की कृषि में लागत बढ़ाने की ज़रूरत
आईसीएआर-इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट क्यू. एस. विश्व विश्वविद्यालय रैंकिंग में अव्वल घोषित किया गया है और पंजाब कृषि के क्षेत्र में भारत के सभी राज्यों में अग्रणी है। पंजाब में गेहूं का उत्पादन 51 क्ंिवटल प्रति एकड़ से बढ़ कर और चावल का उत्पादन 2024 में 14.4 मिलियन टन तक पहुंचने के बाद पंजाब का केन्द्रीय अनाज भंडार में गेहूं का योगदान 40 प्रतिशत और चावल का 31-32 प्रतिशत तक हो गया है। पंजाब का प्रति हेक्टेयर गेहूं और चावल का उत्पादन यूरोपियन यूनियन और यू.एस.ए. से ज़्यादा है। पंजाब की ज़मीन में ऑर्गेनिक शक्ति 0.03 प्रतिशत तक बढ़ गई है। किसानों को धान की सीधी बिजाई हेतु प्रोत्साहित करने के लिए 1500 रुपये प्रति एकड़ की वित्तीय सहायत दी जा रही है।
कृषि और किसान कल्याण विभाग के डायरेक्टर डॉ. गुरजीत सिंह बराड़ कहते हैं कि पंजाब का भू-जल कोई प्रदूषित नहीं है। जिन दक्षिण-पश्चिम मुक्तसर साहिब जैसे कुछ ज़िलों में भू-जल खारा है, वहां सोलर ट्यूबवेल लगाकर उसे सुधारा जा रहा है। हर ज़िले में नहरी पानी पहुंचा कर सिंचाई 100 प्रतिशत हो जाएगी। पंजाब में कीटनाशकों का इस्तेमाल सिर्फ 0.60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है जबकि यूरोपियन यूनियन में यह 2.67 किलोग्राम, यू.एस.ए. में 2.78 किलोग्राम और विश्व का औसत 2.40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। पंजाब में मछली उत्पादन 6.5 टन प्रति हेक्टेयर है, जो विश्व में सबसे ज्यादा और भारत के औसत से दोगुना है। इसके अलावा पंजाब में इटली जितना 21,000 टन शहद का उत्पादन होता है। अन्य देशों के मुकाबले पंजाब में कैंसर भी बहुत कम है। इस समय पंजाब में एक लाख आबादी पर 97 मामले हैं, जबकि यूरोपियन यूनियन में 292, यू.एस.ए. में 367 और विश्व का औसत 197 है। पंजाब का पर्यावरण तुलनात्मक रूप में अच्छा है। इनसिटू तकनीक का उपयोग करके पराली को आग लगाना बंद करने के लिए पंजाब भर में 600 करोड़ रुपये की सब्सिडाइज़्ड मशीनरी किसानों को उपलब्ध की गई है। पराली को ज़मीन में दबाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है ताकि ज़मीन की उपजाऊ शक्ति बढ़े।
डॉ. बराड़ कहते हैं कि पंजाब में दीर्घकालिक कृषि पर ज़ोर दिया जा रहा है। लेज़र लेवलिंग से ज़मीन अब ऊंची-नीची नहीं रही। क्षारीय और लवणीय ज़मीनों को ठीक किया जा रहा है। सब्ज़ खाद सब्सिडी पर दी जा रही है और 4 हज़ार हेक्टेयर से ज़्यादा मोहाली, रोपड़, नवांशहर, होशियारपुर, फाज़िल्का आदि ज़िलों में जिप्सम उपलब्ध किया जा रहा है। कपास-नरमा पैदा करने वाले ज़िलों में बीज 33 प्रतिशत सब्सिडी पर दिया जा रहा है। गांवों में गेहूं और धान के उत्पादन के अंतर को दूर करने और हर किसान तक कृषि विज्ञान पहुंचाने के लिए ब्लॉक और गांव स्तर पर किसान प्रशिक्षण शिविर लगाए जा रहे हैं। इस अंतर को दूर करने से उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय भी बढ़ेगी।
भारत 65 लाख टन बासमती विदेशों को निर्यात करता है, जिससे 50 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा विदेशी मुद्रा आती है। इसमें 60 प्रतिशत हिस्सा पंजाब का है। पंजाब में बासमती की काश्त के अधीन 7 लाख हेक्टेयर रकबा बढ़ा कर राज्य की अर्थव्यवस्था मज़बूत की जाएगी, जिससे फसली विभिन्नता भी आएगी। बासमती को पानी की ज़रूरत धान से कम है और कई किस्में तो मानसून की बारिश से ही पक जाती हैं। बासमती की काश्त के अधीन रकबे में 80 प्रतिशत किस्में, जैसे पी.बी.-1509, पी.बी. 1121 आदि आईसीएआर-आईएआरआई द्वारा विकसित की गई हैं। आईसीएआर-आईएआरआई के डायरेक्टर और उप-कुलपति डॉ. सी.एच. श्रीनिवासा राव कहते हैं कि पंजाब को बासमती और गेहूं की और नई किस्में विकसित करके देने के लिए पूसा इंस्टीच्यूट में अनुसंधान जारी है और ये जल्द ही उपलब्ध की जाएंगी।
पंजाब में कृषि के विकास के लिए विशेषकर गेहूं-धान के फसल चक्र से किसानों की आय बढ़ाने के लिए पीएयू के साथ आईएआरआई अनुसंधान में और किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हो रही है। कुछ तत्व जिनमें गैर-सरकारी एनजीओ भी शामिल हैं, विदेशों से आर्थिक सहायता लेकर पंजाब की कृषि और उससे संबंधित उद्योग यहां शुरू करने के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं, इनके बारे में डायरेक्टर डॉ. गुरजीत सिंह बराड़ कहते हैं कि ऐसे दोष पूरी तरह बेबुनियाद हैं और ऐसे गैर-सरकारी संगठनों पर नकेल कसने की ज़रूरत है। भारत से कई अन्य देशों को कीटनाशक निर्यात किए जा रहे हैं, ऐसे तथा अन्य कृषि आधारित उद्योगों को पंजाब में मज़बूत करने की ज़रूरत है। यहां नए एग्रो इंडस्ट्री यूनिट स्थापित किए जाएं, जिनके लिए डॉ. बराड़ का कहना है कि पंजाब सरकार ‘स्वागत’ कहती है। इसलिए इस समय कृषि में लागत बढ़ाने की सख्त ज़रूरत है।
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