प्रभात के सपने
आजकल मुझे बिल्लियों के बहुत सपने आने लगे हैं। आप कहेंगे मियां सपना भी देखा तो बिल्लियों का। किसी कोमलांगी का देखते, किसी सुन्दर ललना का देखते, उसका प्रेम निवेदन सपने में सुनते, तो कम से कम तुम्हारा जीवन अगर सफल नहीं हो सका, तुम्हारा यह सपना तो सफल हो जाता।
सुना था प्रभात के सपने सच हो जाते हैं। हमने आज प्रभात में एक सपना देख लिया। एक परम सन्तुष्ट बिल्ली का सपना, जो हमारे ओसारे में पड़ी मक्खन की हांडी चट करके मूछें संवारती हुई, हमें अलविदा किये बिना दीवार फांद कर निकल गई थी। हमने देखा मक्खन की हांडी औंधी पड़ी थी, और उसमें बित्ता भर भी मलाई नहीं बची थी।
जी नहीं, हमें शक से नहीं देखिये। खाने को सत्तू नहीं, और डिब्बा भरके मलाई रख कर बैठे हैं। ईर्ष्या न कीजिये। आपने तो सूखी रोटियां बांटी थीं, सस्ते राशन के नाम पर। यह मलाई कहां से आ गई?
चिंता न कीजिये, सब उधार की मलाई है। एक डिब्बा भर के उधार ली थी, इस वायदे के साथ कि कालान्तर में डेढ़ डिब्बा करके लौटा देंगे, लेकिन डेढ़ डिब्बा कहां, यहां तो यह डिब्बा भर कर मलाइयां खाने की इच्छा भी सफल न हो सकी। मलाई देखते ही बिल्ली उसे चट कर गई।
बेशक हम बुढ़ा गये हैं। यह हमारा दृष्टि दोष भी हो सकता है, लेकिन आजकल तो हमें हर उचित और अनुचित स्थान पर बिल्लियां ही बैठी नज़र आती हैं। पहले कहा करते थे, ‘हर शाख पे उल्लू बैठे हैं, इस चमन का यारो क्या होगा?’
लेकिन आजकल तो हमें यही कहने को जी चाहता है, ‘हर शाख पर बिल्लियां बैठी हैं, इस चमन का यारो क्या होगा?’
आप पूछ सकते हैं, जनाब आप बिल्लियों की बात ही किए जा रहे हैं, कुछ शेरों की बात भी कर लीजिये, जिन्हें जंगल का राजा कहा जाता है।
क्या बात करें शेरों की साहिब? उन्होंने तो बहुत पहले ही बिल्ली को अपनी मौसी कहना शुरू कर दिया था। इधर बिल्ली को यूं मलाई चट करते देखा तो शेर भी मांसाहार छोड़ कर वैष्णव हो गये हैं। मलाई के डिब्बों की तलाश में लगे हैं। जहां मिले झपट लिया। अब ये शेर हैं, देश और समाज की प्रभावशाली कुर्सियों पर बैठे हैं। कुर्सियों पर बैठे हैं, तो कुर्सी पर बैठते ही घोषणा कर देते हैं, हम शेर हैं। इस देश में भ्रष्टाचार को शून्य स्तर पर भी सहन नहीं किया जाएगा। अब शेर तो शेर है, उसकी घोषणा लोगों को दहाड़ जैसी लगती है। दहाड़ गूंजती है, फिर अपनी ही प्रति-ध्वनि में खो जाती है। शेर है, दहाड़ता है, फिर अपने पास स्वत: ही मलाई का ढेर लगता देख कर सो जाता है, वह वैष्णो हो गया है, इसलिए अब उसे वह मलाई पसन्द है, जो अनजान लॉकरों में समा सके।
नतीजा आपके सामने है। देश आज भी दुनिया के भ्रष्टाचार सूचकांक में बहुत ऊंचे दर्जे पर बैठा है। इस सूचकांक ने उसे महामन्त्र दे दिया, ‘यहां सब चलता है।’ जन-सेवा के नाम पर असली जन-सेवक वही है, जो आपके गलत और ़गैर-कानूनी कार्य करवा कर उसे जन-सेवा कह सके। देश में एक शार्टकट संस्कृति का जनक बन सके, और लोगों को जन-जागरण के स्थान पर हथेलियों पर सरसों जमाने के तरीके बांट सके। युग बदल गया है। कल के झूठ आज का सत्य बन गये और जीवन में आदर्शवाद का अस्तित्व तलाशने वाले लोग, बीते हुए ज़माने के लोग।
पर्यावरण प्रदूषण के कारण बदले हुए मौसमों ने कुछ नई संस्कृतियों को भी जन्म दे दिया है। इनमें से पहली संस्कृति है सम्पर्क संस्कृति। जीवन में पैदा होते बच्चे की जन्म-तिथि का प्रमाण पत्र लेने से लेकर मर जाने पर डैथ सर्टिफिकेट बनाने तक अब आम लोगों को इस संस्कृति की ज़रूरत पड़ती है। इस संस्कृति का नाम है ‘सम्पर्क संस्कृति।’ अर्थात किसी बड़े आदमी के भाई-भतीजे हो या बन जाओ, आपका ही नहीं, पड़ोसी का काम भी आप आसानी से करवा सकते हो।
पड़ोसी कौन होता है? वसुदैव कुटुम्बकम के इस माहौल में हर आदामी आप का पड़ोसी है जो आपकी कोई भी डील करवाने के लिए आपकी जेब की चम्पी कर सके।
आपकी जेब की चम्पी हो गई। वह आगे से भारी लगने लगी, तो अब आपका काम आनन-फानन में ही जाएगा। अब आपके लिए दफ्तर का कोई सर्वर खराब नहीं होगा, और कोई भी सुविधा केन्द्र असुविधा केन्द्र नहीं लगेगा।
छक्कन हमसे पूछते हैं, कि तुम्हारे वे सब साथी जो शक्ल से ही मरभुक्खे और चिरंतन निष्क्रिय निद्रा से जागे लगते थे, अब देश के लिए मरने की बात करने लगे, परन्तु वैसे मरेंगे जैसे किसी को कुछ मालूम नहीं?
लेकिन अभी तो ज़िन्दगी को मारने की नहीं, आभा-मण्डित करने की बात है। इस महिमा-मण्डन में असुविधा केन्द्र सुविधा केन्द्र हो रहे हैं, नौकरशाही मुंह बिसूर कर बैठी है, कि आपको दिन-दहाड़े राजा से रंक बनते देख रही है। बाहर किसी ने बताया यह दलाल संस्कृति है जनाब! आइए, इसकी अभ्यर्थना करें, और अपना हर बिगड़ा काम ठीक हो जाने का उत्सव मनायें।



