मानसून से नहीं, कुप्रबंधन से हार रहा भारत

मॉनसून को भारतीय अर्थव्यवस्था, कृषि और जल संसाधनों की जीवनरेखा माना जाता है। इसकी पहली वर्षा जहां खेतों में हरियाली और किसानों के चेहरों पर मुस्कान लेकर आती है, वहीं दूसरी ओर यही मानसून जब अत्यधिक वर्षा, बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ का रूप धारण कर लेता है तो विकास की तमाम चमक फीकी पड़ जाती है। इस वर्ष भी मानसून ने अपने शुरुआती दौर में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के मामले में अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं है। महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर सहित देश का बड़ा भूभाग अतिवृष्टि की मार झेल रहा है। कहीं राष्ट्रीय राजमार्ग बह रहे हैं, कहीं रेल सेवाएं ठप हैं, कहीं पुल पानी में डूब गए हैं तो कहीं भूस्खलन और भवन ढहने से लोगों की जान जा रही है। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या हर वर्ष दोहराई जाने वाली इस त्रासदी को अब भी केवल प्राकृतिक आपदा कहकर टाल दिया जाएगा या फिर इसके लिए जिम्मेदार व्यवस्थागत विफलताओं का भी ईमानदारी से आकलन होगा?
जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में लगातार हो रही भारी बारिश ने पहाड़ी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को एक बार फिर उजागर कर दिया है। राष्ट्रीय राजमार्ग-244 कई स्थानों पर भूस्खलन के कारण बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने से कई क्षेत्रों का सम्पर्क टूट गया है। पर्वतीय राज्यों में सड़क निर्माण के दौरान भूगर्भीय अध्ययन, ढलानों की मजबूती, वर्षा जल निकासी और पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी आज जानलेवा साबित हो रही है। जिस तेजी से पहाड़ों को काटकर सड़कें और निर्माण परियोजनाएं तैयार की जा रही हैं, उसी अनुपात में उनकी सुरक्षा के लिए आवश्यक तकनीकी उपाय नहीं अपनाए जा रहे। परिणामस्वरूप प्रत्येक मानसून के साथ पहाड़ दरकते हैं और विकास परियोजनाएं स्वयं विनाश का कारण बन जाती हैं। महाराष्ट्र की स्थिति भी कम भयावह नहीं है। पुणे ज़िले में भूस्खलन की घटना में लोगों की मौत और कई लोगों का सुरक्षित निकाला जाना इस बात का संकेत है कि खतरे पहले से मौजूद थे लेकिन समय रहते पर्याप्त एहतियाती कदम नहीं उठाए गए। उल्हास नदी का जलस्तर खतरे के निशान तक पहुंचने से वांगणी के निकट कुडसावरे पुल पूरी तरह पानी में डूब गया, जिससे अनेक गांवों का संपर्क टूट गया। मुंबई महानगर एक बार फिर बारिश के आगे बेबस दिखाई दे रहा है। दो दिनों की मूसलाधार बारिश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि देश की आर्थिक राजधानी आज भी प्रभावी जल निकासी व्यवस्था विकसित नहीं कर सकी है। सड़कों पर कई-कई फुट पानी भरने, रेल-सड़क यातायात प्रभावित होने, पेड़ उखड़ने, पुराने भवन ढहने और अनेक लोगों को अपनी जान गंवाने की घटनाएं कोई पहली बार सामने नहीं आई हैं बल्कि हर वर्ष यही दृश्य दोहराया जाता है लेकिन समाधान आज भी अधूरा है।
विडंबना यह है कि मानसून भारत में कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। इसकी तिथियां, संभावित तीव्रता और वर्षा के पैटर्न का अनुमान भारतीय मौसम विभाग पहले ही जारी कर देता है। इसके बावजूद नगर निकायों और प्रशासन की तैयारियां क़ागजों से आगे नहीं बढ़ पाती। मानसून से पहले नालों की सफाई, जल निकासी मार्गों की मुरम्मत, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और आपदा प्रबंधन की तैयारी हर वर्ष सरकारी फाइलों में पूरी दिखाई देती है लेकिन पहली ही तेज बारिश उन दावों की वास्तविकता सामने ला देती है। यदि दो दिन की बारिश में महानगर जलमग्न हो जाएं, पुल डूब जाएं, सड़कें बह जाएं और रेल सेवाएं बंद करनी पड़ें तो यह केवल प्रकृति का नहीं बल्कि व्यवस्था का भी संकट है। मुंबई इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। प्रशासन लोगों को घरों में रहने की सलाह देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है लेकिन यह नहीं बताता कि यदि मजदूर और कामकाजी लोग घर से बाहर नहीं निकलेंगे तो उनके परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा।
जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं लेकिन हमारी शहरी योजनाएं आज भी दशकों पुराने मानकों पर आधारित हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है। सड़क निर्माण, सुरंग परियोजनाओं, अंधाधुंध खनन और वनों की कटाई ने पहाड़ों की प्राकृतिक स्थिरता को कमजोर कर दिया है। पर्याप्त ढ़लान सुरक्षा, रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज चैनल और भूस्खलन रोकने वाली संरचनाओं के अभाव में तेज वर्षा सीधे विनाश का कारण बन जाती है। गुजरात में अमरेली के निकट राष्ट्रीय राजमार्ग का बह जाना और अनेक राज्यों में पुलों तथा सड़कों का क्षतिग्रस्त होना यह संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में पुराने निर्माण मानक अब पर्याप्त नहीं रह गए हैं। अब ऐसी आधारभूत संरचना विकसित करनी होगीए जो अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन जैसी चरम परिस्थितियों का सामना कर सके। केवल परियोजनाओं का उद्घाटन करना पर्याप्त नहीं है, उनकी जलवायु सहनशीलता भी सुनिश्चित करनी होगी।
जब तक नगर निकाय मानसून से पहले केवल औपचारिक तैयारियां करते रहेंगे, जब तक पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी जारी रहेगी और जब तक विकास योजनाओं में प्रकृति की सीमाओं का सम्मान नहीं किया जाएगा, तब तक हर वर्ष यही त्रासदी नए रूप में हमारे सामने आती रहेगी। देश अभी भी समय रहते दिशा बदल सकता है, अन्यथा हर वर्ष बादल केवल पानी नहीं बरसाएंगे बल्कि हमारी विकास योजनाओं, प्रशासनिक दावों और तैयारी की वास्तविकता को भी बहाकर ले जाएंगे।

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