स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में पंजाब की बड़ी पहल
हममें से ज्यादातर लोगों को अच्छे स्वस्थ्य की अहमियत तब समझ आती है, जब वह हमारा साथ छोड़ जाता है। अचानक दिल का दौरा, कैंसर का पता चलना, सड़क दुर्घटना या बच्चे के जन्म के दौरान पैदा होने वाली जटिलताएं कुछ ही घंटों में किसी परिवार की पूरी ज़िंदगी बदल सकती हैं। ऐसे कठिन समय में लोगों का ध्यान सिर्फ उपचार पर होना चाहिए, न कि इस बात की चिन्ता कि उपचार शुरू होने से पहले पैसों का प्रबंध कैसे किया जाए। लेकिन दुख की बात है कि यह हकीकत सिर्फ पंजाब की ही नहीं, बल्कि देश भर के असंख्य परिवारों की रही है। एक डॉक्टर के रूप में मैंने दशकों तक मरीज़ों का इलाज किया है। आज पंजाब के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री के रूप में मैं इस चुनौती को एक अलग नज़रिए से देखता हूं। सरकार अस्पताल बना सकती है, डॉक्टर नियुक्त कर सकती है और आधुनिक उपकरण उपलब्ध करवा सकती है, लेकिन अगर लोग सिर्फ आर्थिक मजबूरी की वजह से उपचार न करवा सकें तो यह व्यवस्था अपना मकसद पूरा नहीं कर सकती। स्वास्थ्य सेवा सिर्फ मेडिकल ढांचा खड़ा करने का नाम नहीं, बल्कि हर नागरिक में यह विश्वास पैदा करने का ज़रिया है कि जब बीमारी आएगी तो पूरी व्यवस्था उनके साथ खड़ी होगी।
इसी सोच के दृष्टिगत मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में ‘मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजना’ की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था—पंजाब का कोई भी निवासी सिर्फ आर्थिक तंगी की वजह से अच्छे उपचार से वंचित न रहे। किसी भी बड़ी जन कल्याण योजना बारे अंतिम फैसला लेने के लिए छह महीने पर्याप्त नहीं होते, लेकिन यह देखने के लिए ज़रूर पर्याप्त होते हैं कि क्या वह सही दिशा में बदलाव ला रही है। इसका जवाब राजनीतिक दावों में नहीं, बल्कि अस्पतालों, डॉक्टरों और मरीज़ों के प्रतिदिन के अनुभवों से मिलता है। अब तक इस योजना के तहत 2.62 लाख से ज़्यादा लाभपात्रियों का उपचार हो चुका है। पांच लाख से ज़्यादा उपचार प्रक्रियाओं को स्वीकृति दी जा चुकी है, जिन पर लगभग 927 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। ये आंकड़े इसलिए अहम हैं, क्योंकि हर अंक उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे उपचार के लिए न तो कज़र् लेना पड़ा और न ही अपनी पारिवारिक सम्पत्ति बेचनी पड़ी। योजना के तहत मंज़ूर हुआ हर केस उस परिवार की कहानी है, जिसने अस्पताल के बिल की चिन्ता करने की बजाय अपने पारिवारिक सदस्य के ठीक होने पर ध्यान दिया। किसी भी जन-स्वास्थ्य योजना के लिए इससे बड़ी उपलब्धि शायद ही कोई हो सकती है।
आज इस योजना के साथ 864 अस्पताल जुड़े हुए हैं, जिनमें 223 सरकारी और 641 सूचीबद्ध (इम्पैनल्ड) निजी अस्पताल शामिल हैं। डॉक्टरों के साथ बातचीत के दौरान सबसे अधिक हौसला देना वाला बदलाव दिखाई दिया। कई डॉक्टरों का कहना है कि मरीज़ अब सर्जरी या विशेष उपचार के लिए सहमति देने से पहले पैसे का प्रबंध करने में अपना कीमती समय बर्बाद नहीं कर रहे। डॉक्टरों ने यह भी महसूस किया कि लोग अब बीमारी के लक्षण नज़र आते ही समय पर अस्पताल पहुंच रहे हैं। यह बदलाव बहुत अहम है, क्योंकि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गुर्दे की बीमारी और कई तरह के कैंसर का अगर समय पर पता चल जाए तो उनका बेहतर ढंग से उपचार किया जा सकता है।
योजना लागू होने के तुरंत बाद हमें यह एहसास हुआ कि अकेले रहने वाले लोग रजिस्ट्रेशन नहीं करवा सकते थे, क्योंकि शुरुआती दिशा-निर्देशों में कम से कम दो पारिवारिक सदस्यों का होना ज़रूरी था। इस त्रुटि को दूर करते हुए अकेले सदस्य वाले परिवारों को भी योजना के दायरे में शामिल किया गया। इसी तरह हमने उन विशेष उपचार प्रक्रियाओं की भी समीक्षा की जो पहले सिर्फ सरकारी अस्पतालों तक ही सीमित थीं। डॉक्टरों, अस्पतालों और मरीज़ों से मिले सुझावों के आधार पर 15 मुख्य उपचार प्रक्रियाओं को सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में भी उपलब्ध करवाया गया। इन सुधारों को प्रभावशाली बनाने में तकनीक ने भी अहम भूमिका निभाई है। अब रजिस्ट्रेशन, अस्पतालों की मंज़ूरी और दावों के निपटान की पूरी प्रक्रिया डिजिटल माध्यम से चलाई जा रही है। मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजना का अगला पड़ाव अस्पतालों की समर्था बढ़ाने, सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने, पात्र परिवारों में जागरुकता बढ़ाने और उपचार से संबंधित आंकड़ों का इस्तेमाल करके सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को और प्रभावशाली बनाने पर केन्द्रित होगा। कोई भी सरकार यह दावा नहीं कर सकती कि सिर्फ छह महीने में उसका काम पूरा हो गया है। स्वास्थ्य सेवा एक निरन्तर ज़िम्मेदारी है, न कि कोई ऐसा प्रोजेक्ट जिसकी कोई सीमा-रेखा हो। फिर भी हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि पंजाब ने उस दिशा में एक कदम बढ़ाया है, जहां आर्थिक मुश्किलें धीरे-धीरे उपचार की राह में रुकावट बनना बंद हो रही हैं।
-स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री, पंजाब।



