फटते बादल, डूबते पहाड़ : पहाड़ों पर मंडराता जलवायु संकट
भारत में मानसून जहां जीवन और कृषि का आधार है, वहीं पिछले कुछ वर्षों से यही मानसून विनाश का पर्याय भी बनता जा रहा है। विशेष रूप से हिमालयी राज्यों में बादल फटने, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति ने यह संकेत दे दिया है कि पर्वतीय पारिस्थितिकी अब पहले जैसी सुरक्षित नहीं रह गई है। इस वर्ष का मानसून इसी भयावह प्रवृत्ति को दोहरा रहा है। 19 जुलाई की सुबह हिमाचल प्रदेश के चंबा ज़िले के जनजातीय उपमंडल पांगी में बादल फटने से कई क्षेत्रों में भारी क्षति हुई। इसी दिन हिमाचल के ही किन्नौर ज़िले के छितकुल क्षेत्र की पहाड़ियों में बादल फटने से एक नाले में अचानक मलबे और पत्थरों की तेज बाढ़ आ गई। एक दिन पहले 18 जुलाई को जम्मू-कश्मीर के तो कई ज़िलों में छह जगह बादल फटने से भारी तबाही हुई, जिससे सर्वाधिक प्रभावित जम्मू संभाग के राजौरी और पुंछ ज़िले हुए। लद्दाख के कारगिल में भी बादल फटने से अचानक आई बाढ़ से सड़कों पर मलबा जमा हो गया और व्यापक नुकसान हुआ। पिछले कुछ वर्षों के दौरान मानसून में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार जहां सामान्य वर्षा की कुल मात्रा में बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आया, वहीं कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यही स्थिति बादल फटने जैसी आपदाओं को जन्म देती है।
बादल फटने की घटनाओं को लेकर लोकमानस में यह धारणा प्रचलित है कि मानो आसमान में सचमुच बादल फट जाते हैं जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा नहीं होता। बादल फटना वास्तव में एक अत्यधिक स्थानीयकृत मौसमीय घटना है, जिसमें बहुत छोटे भौगोलिक क्षेत्र (आमतौर पर एक से दो वर्ग किलोमीटर) में 20 से 30 मिनट अथवा लगभग एक घंटे के भीतर अत्यधिक तीव्र वर्षा हो जाती है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार यदि किसी क्षेत्र में एक घंटे में लगभग 100 मिलीमीटर या उससे अधिक वर्षा हो जाए तो उसे सामान्यत: बादल फटने की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसी वर्षा का क्षेत्र इतना सीमित होता है कि कुछ किलोमीटर दूर सामान्य बारिश या बिल्कुल शुष्क मौसम भी हो सकता है। यही कारण है कि बादल फटने की घटनाओं का पूर्वानुमान अत्यंत कठिन माना जाता है।
बादल फटने के पीछे अनेक वैज्ञानिक प्रक्रियाएं एक साथ कार्य करती हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है ‘ओरोग्राफिक प्रभाव’। मानसून के दौरान बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली नमी से भरी हवाएं जब हिमालय जैसी ऊंची पर्वतमालाओं से टकराती हैं तो उन्हें ऊपर उठना पड़ता है। ऊंचाई पर तापमान तेजी से घटता है, जिससे जलवाष्प तीव्र गति से संघनित होकर विशाल वर्षा-बादलों में बदल जाती है। यदि वातावरण में नमी अत्यधिक हो, ऊपरी स्तर पर ठंडी हवा मौजूद हो और नीचे की सतह अपेक्षाकृत गर्म हो तो वायुमंडलीय अस्थिरता पैदा होती है। जब ये बादल अपनी जलधारण क्षमता से अधिक भारी हो जाते हैं तो सीमित क्षेत्र में अचानक अत्यधिक वर्षा होने लगती है। पर्वतीय घाटियां और संकरी जलधाराएं इस वर्षा को और अधिक विनाशकारी बना देती हैं। पानी को फैलने का अवसर नहीं मिलता और वह अत्यधिक वेग से नीचे उतरता हुआ अपने साथ चट्टानें, मिट्टी, पेड़ और मलबा बहाकर ले जाता है। परिणामस्वरूप कुछ ही मिनटों में फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।
आज लगभग सभी प्रमुख जलवायु वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि वैश्विक तापमान में वृद्धि चरम वर्षा घटनाओं को अधिक तीव्र बना रही है। वैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार वायुमंडल का तापमान प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर उसकी जलवाष्प धारण करने की क्षमता लगभग 7 प्रतिशत बढ़ जाती है अर्थात गर्म वातावरण पहले की तुलना में अधिक नमी संचित कर सकता है और जब यह नमी वर्षा के रूप में गिरती है तो उसका स्वरूप अधिक तीव्र और विनाशकारी होता है। हिमालयी क्षेत्र स्वयं वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, बर्फबारी के स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है और मानसून का व्यवहार अधिक अनिश्चित होता जा रहा है। यही कारण है कि पहले जहां बादल फटने जैसी घटनाएं अपवाद थी, वहीं अब लगभग प्रत्येक मानसून में अनेक स्थानों पर ऐसी घटनाएं देखने को मिल रही हैं।
इस बढ़ते संकट के लिए केवल प्रकृति को दोष देना उचित नहीं होगा बल्कि मानव गतिविधियों ने इस जोखिम को कई गुना बड़ा दिया है। हिमालय जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में अनियोजित शहरीकरण, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, चारधाम और अन्य सड़क परियोजनाओं के दौरान बड़े पैमाने पर विस्फोट, नदी तटों पर निर्माण, वनों की कटाई व पर्यटन का बढ़ता दबाव प्राकृतिक संतुलन को कमजोर कर रहे हैं। पहाड़ों की ढलानों पर बिना भू-वैज्ञानिक अध्ययन के निर्माण कार्य होने से मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है। जब अत्यधिक वर्षा होती है तो यही ढलान आसानी से खिसक जाते हैं और भूस्खलन का रूप ले लेते हैं।
किश्तवाड़, डोडा, कुल्लू तथा देश के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में सामने आ रही घटनाएं स्पष्ट संकेत हैं कि हिमालय जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को सबसे पहले और सबसे अधिक झेल रहा है। यदि विकास की वर्तमान शैली, अनियंत्रित निर्माण और पर्यावरणीय उपेक्षा जारी रही तो भविष्य में बादल फटने जैसी घटनाएं और अधिक घातक रूप ले सकती हैं। आज आवश्यकता केवल राहत और मुआवजे की नहीं बल्कि दूरदर्शी नीति, वैज्ञानिक योजना और प्रकृति के प्रति संवेदनशील विकास दृष्टिकोण की है। आधुनिक मौसम विज्ञान, उन्नत पूर्व चेतावनी प्रणाली, सुदृढ़ आपदा प्रबंधन, वनों का संरक्षण और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी ही इस बढ़ते संकट का प्रभावी समाधान बन सकती है। हिमालय केवल पर्वतों का समूह नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के जल, जलवायु और जीवन का आधार है। यदि हम उसकी नाजुक पारिस्थितिकी की रक्षा नहीं कर सके तो बादल फटने जैसी घटनाएं भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और मानवीय अस्तित्व की गंभीर चुनौती बन जाएंगी।



