देश के लिए एकमात्र उम्मीद है गांधी का रास्ता

दिल्ली से हजारों कि.मी. दूर बैठा मैं एक युवा बच्ची से बात कर रहा था। वो बार-बार अपने इंस्टा अकाउंट को देखती और बार-बार हमें जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन के बारे में नई जानकारियां देती। उसे पल पल की खबर थी। वो थी तो परदेस में लेकिन उसका दिल दिमाग सब जंतर मंतर पर अटका था और संजय की तरह वो हमें लगातार आंखों देखा हाल सुना रही थी। हमने उससे कुछ खास नहीं पूछा। ईमानदारी की बात है कि उससे पूछने का दिल भी नहीं किया। उसको देख कर ही लग गया था कि जंतर मंतर पर चल रहा आंदोलन सरकार की नींव को हिलायेगा और उसकी जड़ों को ऐसा झटका देगा कि वो लाख कोशिश के बाद भी उबर नहीं पायेगी।  
वो बच्ची मासूम थी, हृदय की बेहद निर्मल, देश के राजनीतिक माहौल से परेशान थी। वो एक समाधान ढूंढ रही थी। कॉकरोच आंदोलन ने उसे एक उम्मीद दी। वो अपने लिये नहीं, देश के लिये दुखी थी। उससे न मिलता तो शायद मुझे कॉकरोच आंदोलन की तपिश का अंदाजा नहीं होता। जंतर मंतर पर पहुंचे छात्रों का उत्तेजित हो जाना स्वाभाविक था लेकिन प्रदर्शन स्थल से हज़ारों किमी दूर प्रदर्शन से जुड़े रहना, पल पल की खबर देना और उस पर अपनी प्रतिक्रिया रखना, इस बात का प्रमाण था कि इस आंदोलन ने इस देश के हर युवा को भावनात्मक रूप से जोड़ दिया है और वो बिना धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिये उठने वाला नहीं है। यह बात प्रधानमंत्री मोदी को बड़ी देर से समझ आई। जब तक वो समझते, तब तक उनको, उनकी सरकार को, उनकी पार्टी को नुकसान हो चुका था। वो नुकसान जिसकी भरपाई आधी रात को विडियो बनाने से नहीं होने वाली। 
कॉकरोचों ने न केवल प्रधान का इस्तीफा लिया बल्कि उसने पूरे राजनीतिक तंत्र को यह संदेश भी दे दिया कि मोदी सरकार और उनके तंत्र से लड़ने के लिये किसी संगठन, किसी दल व किसी नेता की ज़रूरत नहीं है, उसे सिर्फ पक्के संकल्प और उस संकल्प के लिये कुछ भी कर गुज़रने का जज्बा चाहिये। वो जज़्बा जो किसी से नहीं डरता और न ही किसी के सामने झुकता है। पहले प्रधानमंत्री और महान् स्वतंत्रता सेनानी पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब ‘डिस्कवरी आ़फ इंडिया’ में लिखा है कि महात्मा गांधी का स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे बड़ा योगदान था जनता को ‘अभय’ प्रदान करना। ब्रिटिश साम्राज्य का जो डर था, उसे गांधी जी ने लोगों के दिल से निकाल दिया और जो जनता अंग्रेजों से डर कर घरों में दुबकी हुई थी, वही जनता गांधी जी के आह्वान पर सड़कों पर निकल पड़ी। फांसी के फंदे पर झूलने को तैयार हो गई, उसने जेल जाने से डरना बंद कर दिया। उसने पुलिस की लाठियों के सामने खड़ा होना सीख लिया। यह गांधी जी की अहिंसा का चमत्कार था कि दांडी मार्च के समय पुलिस की लाठियां गांधी के स्वयंसेवकों पर बरसती रहीं, उनके सिर फूटते रहे, शरीर से खून के फव्वारे निकलते रहे, बेहोश हो कर गिरते रहे लेकिन उफ नहीं की। यही चमत्कार हमें जंतर मंतर पर भी दिखा। ऐसे कई बच्चे दिखाई पड़े जिन पर पुलिस की लाठियां पड़ीं किन्तु वो हटे नहीं, खड़े हो गये और कहने लगे, मुझे और मारो। पुलिस को भी शर्म आयी और लाठियां थम गईं। इस आंदोलन ने गांधी जी की तरह देश को ‘अभय’ प्रदान किया। 
मोदी सरकार का खौफ न केवल राजनीतिक दलों में था बल्कि देश का आम आदमी भी डर गया था। 2014 के बाद पहली बार मैंने देखा, महसूस किया और भोगा कि किसी सार्वजनिक स्थल पर मोदी की आलोचना का अर्थ था, गाली खाना। लोग मरने मारने को उतारू हो जाते थे। ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ है। मित्रों के बीच में बैठे हैं और मोदी पर कोई आलोचनात्मक टिप्पणी की नहीं कि अचानक जो मित्र होने का ढोंग कर रहे थे, वे टेढ़े हो गये और गाली गलौच पर उतर आये। मेरे साथ ऐसा एक हादसा न्यूयार्क के एक रेस्तरां में हुआ जब एक नामी गिरामी शख्स अचानक उखड़ गये और ऊंटपटाग बोलने लगे। राजनीतिक दलों को जिस कदर सरकारी एजेंसियों से डराया गया है, उससे सरकार के खिलाफ संघर्ष करने की उनकी क्षमता खत्म हो गई। पहले पार्टियां टूटती थीं, अब पूरी पार्टी को ही होस्टाइल तरीके से टेकवोअर किया जाने लगा था। तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इस डर ने राजनेताओं की रीढ़ की हड्डी गायब कर दी। ऐसे माहौल में जबकि मुख्यमंत्रियों को सीधे जेल भेजा जाने लगा था, तब कुछ छात्रों का सरकार के खिलाफ आंदोलन करने का ऐलान करना और अंत में शिक्षा मंत्री को इस्तीफे के लिये मजबूर करना, सरकार के डर को पूरी तरह खत्म करना है। 
यह सच है कि जंतर मंतर पर ढेरों वीडियो हैं जिनमें प्रधानमंत्री को लिये अपशब्दों का प्रयोग किया गया। ऐसा नहीं होना चाहिये था, लेकिन यह असली तस्वीर नहीं थी। असली तस्वीर थी उन छात्रों की जो सोनम वांगचुक के आमरण अनशन तोड़ने के बाद भी अड़े रहे कि अनशन तब तक चलेगा, जब तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होगा। ये छात्र अगर सरकार से डरते होते तो अनशन नहीं करते, और अगर अनशन करते भी तो डर के आगे बीच में बहाना बना कर अनशन तोड़ देते। ऐसा नहीं हुआ क्योंकि सरकार का डर दिल से निकल चुका था। यहीं इस आंदोलन की सबसे बड़ी भूमिका है। बाकी तो बस ट्रेलर है। असली गांधी का वो तरीका है जिसने अंग्रेजों को झुका दिया। भारत छोड़ने के लिये मजबूर कर दिया। 
इस देश ने और युवाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जिस विचारधारा ने गांधी जी के शरीर को 30 जनवरी 1948 को हमसे छीन लिया था और पिछले बारह सालों से इस मुग़ालते में थी कि उसने गांधी की सोच और अहिंसा को हमेशा के लिये ज़मींदोज़ कर दिया है, वो अंतत: गांधी से एक बार फिर हार गई। सत्ता पक्ष चाहे कुछ भी कहे, उनके चमचे उपकृत पत्रकार कुछ भी नैरेटिव बनाने की कोशिश करें, सच्चाई यह है कि कॉकरोच आंदोलन पूरी तरह अहिंसात्मक था, गांधी के रास्ते पर चल रहा था और इसी वजह से सरकार एक सीमा के बाद बल का प्रयोग नहीं कर पाई। अगर आंदोलन हिंसात्मक होता तो इस आंदोलन को कुचलने में मोदी सरकार को दो मिनट से ज्यादा नहीं लगता। वो ऐसा नहीं कर पाई क्योंकि आंदोलन की नैतिक और आध्यात्मिक ताकत के सामने उसकी सारी ताकत और बल भोथरा हो गया, जैसे गांधी जी के नैतिक बल के सामने अंग्रेज प्रशासन अकसर निरुत्तर हो जाता था। 
गांधी का बताया रास्ता ही इस देश के लिये एक उम्मीद है। एक रोशनी की किरण। कॉकरोच आंदोलन ने देश के बड़े बुजुर्गों को निरंकुशवाद से बाहर निकलने का एक मंत्र दे दिया है। उसने बता दिया है कि जब जब देश पर संकट आयेगा, लोकतंत्र का अपहरण करने की कोशिश की जायेगी, गांधी फिर खड़े हो जायेंगे। उनकी अहिंसा ही देश को मुक्ति का मार्ग दिखायेगी। आंदोलन को जो ऐतिहासिक भूमिका अदा करनी थी, वो उसने निभा दी है। अब बारी विपक्ष की है, राजनीतिक दलों की है, सिविल सोसाइटी की है और उन संस्थानों की है जो डर की वजह से अपनी रीढ़ की हड्डी गिरवी रख आये हैं। उन्हें इस संघर्ष को अब आगे लेकर जाना है। इस देश के लिये, इस देश के हर नागरिक के लिये, उस बच्ची के लिये, हज़ारों किमी दूर होने के बाद भी जिसकी आत्मा भारत में बसती है क्योंकि उसे अपने मुल्क से प्यार है, जो अपने देश को गांधी के रास्ते से भटकने नहीं देना चाहती। 

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