दुश्मनी की दास्तान
कारगिल विजय दिवस पर कश्मीर के द्रास सैक्टर में संबोधित करते हुए जहां रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी, वहीं एक बार फिर दोहराया कि पाकिस्तान के साथ अभी बातचीत की सम्भावना नहीं है। देशभर में कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ मनाई गई है। भारत और पाकिस्तान में यह युद्ध वर्ष 1999 में हुआ था। चाहे यह युद्ध तो महज़ दो माह ही चला था परन्तु इसका भारतीय मानसिकता पर प्रभाव उसी प्रकार कायम है। पाकिस्तानी सेना और घुसपैठियों ने जम्मू-कश्मीर की कारगिल, द्रास, बटालिक और तोलोलिंग सेक्टर की ऊंची पहाड़ियों पर चुपचाप घुसपैठ करके कब्ज़ा कर लिया था। भारत ने पता चलने पर इस चुनौती को कबूल करते हुए एक बेहद मुश्किल अभियान से दुश्मनों को भगा दिया था। कारगिल की यह गाथा भी पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत को लगातार चुनौती दिए जाने की एक कड़ी है।
पाकिस्तान में चाहे समय-समय चुनी हुई सरकारें भी बनी परन्तु उस समय भी यह पूरी तरह सेना के प्रभाव में ही विचरती रही है। एक तरह से देश के अस्तित्व में आने के बाद ज्यादातर समय यहां के लोग सैन्य शासन के साये में ही रहे। यही कारण है कि यह देश आज भी अनेक दुश्वारियों से जूझता दिखाई दे रहा है। इसकी आर्थिकता बुरी तरह से डावांडोल हो चुकी है। सेना के साथ-साथ अब अनेक तरह के आतंकी संगठनों ने यहां अपनी हिंसक कार्रवाईयां जारी रखी हुई हैं। देश के अंदर भी बड़ी टूट-फूट नज़र आ रही है। परन्तु समय-समय सैन्य शासकों ने अपनी निर्धारित नीति अनुसार भारत के साथ अपनी दुश्मनी की दास्तान को लगातार आगे बढ़ाया है। वर्ष 1999 की शुरुआत में नवाज़ शऱीफ के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत के साथ दोस्ती के लिए कदम आगे बढ़ाए थे। उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज़ शऱीफ के निमंत्रण पर बस के माध्यम से लाहौर की एतिहासिक यात्रा भी की थी, जिसकी दुनिया भर में बहुत चर्चा हुई थी। यहीं दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने लाहौर समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे यह महसूस होने लगा था कि यह दोनों पड़ोसी देश अब दोस्ती और सहयोग से आगे बढ़ेंगे परन्तु पाकिस्तानी सेना को ऐसा मंज़ूर नहीं था। तत्कालीन सैन्य प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने चुपचाप सर्दियों की आड़ में नियंत्रण रेखा पार करके कारगिल, द्रास, बटालिक, मश्कोह तथा काकसर की ऊंची पहाड़ियों पर कब्ज़ा कर लिया था। उसकी मुख्य मंशा श्रीनगर तथा लद्दाख को जोड़ने वाले राजमार्ग पर नज़र रखना तथा लद्दाख को कश्मीर से अलग कर देने की थी।
एक ओर निर्वाचित सरकारों द्वारा मित्रता का हाथ बढ़ाना तथा दूसरी ओर वहां के जरनैलों द्वारा की ऐसी कार्रवाई से पाकिस्तानी तथा भारतीय नेता बेहद हैरान और परेशान हो गए थे। 3 मई, 1999 को बंजू क्षेत्र के स्थानीय चरवाहों ने इस घुसपैठ की सूचना दी थी। 5 मई को कैप्टन सौरव कालिया का दल जांच के लिए रवाना हुआ था। इसी गतिविधि में ही 5 मई को पाकिस्तानी सैनिकों ने 5 भारतीय सैनिकों को मार दिया था। इस घटना को लेकर 10 मई को ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया गया था। दुश्मन सेना पहाड़ियों की चोटियों पर बैठी थी और लगातार गोलीबारी कर रही थी। बेहद ठंड, ऑक्सीजन की कमी और शुष्क पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण भारतीय सेना को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, परन्तु इस सब कुछ के बावजूद उसने इन सभी पहाड़ी चोटियों को कब्ज़ाधारियों से आज़ाद करवा लिया था। इस युद्ध में 527 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। कैप्टन विक्रम बत्रा, गे्रनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव तथा लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को बाद में अपने साथियों को साथ लेकर बहादुरी दिखाने के बदले ‘वीर चक्र’ भी दिए गए थे।
आज 27 वर्ष बाद भी पड़ोसी देश के साथ हालात उसी तरह के ही बने दिखाई दे रहे हैं। वैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध बनाने की इच्छा से अपने पहले शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को भी शामिल होने का निमंत्रण दिया था, इसके बाद श्री मोदी ने अचानक मित्रता की भावनाओं का प्रकटावा करते हुए लाहौर का दौरा भी किया था, परन्तु वहां की सेना और बेहद ताकतवर हुए आतंकवादी संगठनों ने समय-समय पर इन दोनों देशों की सरकारों द्वारा दिखाई गई मित्रता की भावना को सदा तार-तार किया है। लगातार चलती यह दुश्मनी की दास्तान दोनों देशों के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, जिसका प्रभाव इस क्षेत्र में रहते करोड़ों लोगों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में पड़ता है। कारगिल युद्ध को याद करते हुए एक बार फिर यह बात मन में उठती है कि शायद आगामी समय में दोनों देशों की यह दुश्मनी की दास्तान खत्म हो जाए, जिससे कि करोड़ों लोगों की नियति जुड़ी हुई है। दोनों देशों के लोग भी ऐसा ही चाहते हैं।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

