गम्भीर बीमारियों का कारण बन रहे मिलावटी खाद्य पदार्थ
खाद्य पदार्थों में मिलावट आज एक बहुत ही गंभीर सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्या बन चुकी है। आज के समय में अधिक लाभ कमाने के लालच में भोजन में हानिकारक एवं निम्न गुणवत्ता वाले पदार्थ मिलाए जा रहे हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर गम्भीर दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं। मिलावटी खाद्य पदार्थ कैंसर, हृदय रोग, किडनी की बीमारी तथा अन्य कई तरह की गम्भीर बीमारियों का कारण बन रहे हैं। इसलिए शुद्ध भोजन केवल उपभोक्ता का अधिकार ही नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है।
आज हमारे देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट एक विकराल समस्या बन गई है। इससे न केवल शुद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण वस्तुओं का संकट पैदा हो गया है, बल्कि लोग अनेक स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं से भी जूझ रहे हैं। यह बहुत ही दुखद है कि केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम दावों के बावजूद मुनाफाखोरी के इस अवैध कारोबार पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के ताज़ा आंकड़े भी यही संकेत देते हैं कि मिलावटी खाद्य पदार्थों का बाज़ार लगातार फल-फूल रहा है। बहरहाल, यदि हम यहां पर आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2025-26 में देशभर में पांच लाख से अधिक खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया। इस दौरान दो लाख से अधिक खाद्य नमूने लिए गए, जिनमें से लगभग 40 हज़ार नमूने गैर-मानक पाए गए। इनमें सबसे अधिक लगभग 20 हज़ार नमूने उत्तर प्रदेश के थे। हालांकि अन्य राज्यों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। अक्सर देखा जाता है कि जब भी खाद्य पदार्थों के नमूनों की जांच होती है, उनमें से बड़ी संख्या में मिलावट या गुणवत्ता संबंधी खामियां सामने आती हैं।
खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामलों में बांग्लादेश को सबसे कठोर कानून वाले देशों में माना जाता है। वहां की कुछ कानूनी व्यवस्थाओं के अनुसार यदि खाद्य मिलावट के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए या अत्यंत गम्भीर जनहानि हो, तो दोषी को आजीवन कारावास तथा कुछ विशेष परिस्थितियों में मृत्युदंड तक का प्रावधान है। हालांकि मृत्युदंड केवल अत्यंत गम्भीर मामलों में ही लागू किया जाता है और इसका प्रयोग अत्यंत दुर्लभ है।
भारत में खाद्य मिलावट के मामलों पर मुख्य रूप से खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम-2006 लागू होता है। इस कानून के अंतर्गत मिलावट की गम्भीरता के आधार पर दोषी पर भारी आर्थिक दंड, कारावास अथवा दोनों का प्रावधान है। यदि मिलावटी खाद्य पदार्थ के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो दोषी को आजीवन कारावास तथा कम से कम 10 लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा दी जा सकती है। वहीं कम गम्भीर मामलों में जुर्माना तथा 6 माह से लेकर 6 वर्ष तक के कारावास का भी प्रावधान है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनका सख्त और प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है।
यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि आखिर कठोर कानूनी प्रावधानों के बावजूद खाद्य पदार्थों में मिलावट का अवैध कारोबार लगातार क्यों बढ़ रहा है? जिस सरकारी तंत्र पर खाद्य पदार्थों की नियमित जांच और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की ज़िम्मेदारी है, क्या वह अपना दायित्व पूरी ईमानदारी से निभा रहा है? जो मामले दर्ज होते हैं, उनमें भी यदि दोषियों को सज़ा मिलने की दर बेहद कम रहती है, तो यह चिंता का विषय है। कई बार संबंधित विभागों के कुछ कर्मियों की कथित साठगांठ के कारण मिलावट करने वाले बच निकलते हैं। यही कारण है कि इस अवैध कारोबार में संलिप्त लोगों के मन से कानून का भय समाप्त होता जा रहा है।
इस गम्भीर समस्या से निपटने के लिए सरकार को खाद्य पदार्थों की निगरानी और जांच व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी तथा प्रभावी बनाना होगा। जांच करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए तथा मिलावटखोरों को संरक्षण देने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही आम नागरिकों को भी जागरूक होकर केवल विश्वसनीय एवं प्रमाणित स्थानों से ही खाद्य सामग्री खरीदनी चाहिए और संदिग्ध वस्तुओं की शिकायत संबंधित अधिकारियों तक पहुंचानी चाहिए। वास्तव में, सच तो यह है कि मिलावट केवल कानून का ही उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के साथ किया जाने वाला गम्भीर अपराध है। सरकार, प्रशासन और समाज—तीनों के संयुक्त प्रयासों से ही इस बुराई पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। स्वस्थ समाज की आधारशिला शुद्ध भोजन है, इसलिए मिलावट के विरुद्ध जनजागरण और कठोर कार्रवाई समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। (एजेंसी)



