भाईचारक साझ की भावना

केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने ‘राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) कानून 2026’ दोनों सदनों में पारित करवा लिया है। ऐसा उस समय किया गया, जब सप्ताह भर से संसद की कार्यवाही वाद-विवाद की भेंट चढ़ी हुई थी। विपक्षी पार्टियों के ज्यादातर सांसद सदन से ़गैर-हाज़िर थे तो पेश किए गए इस विधेयक को जल्दबाज़ी में पारित करवा लिया गया। चाहे लोकसभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राये ने कहा कि यह सिर्फ एक संसदीय संशोधन नहीं, अपितु भारत की सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता संग्राम के सम्मान में देश की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। वर्ष 1971 में राष्ट्रीय गान जन-गण-मन को कानूनी धारा में बदला गया था। अब वंदे मातरम् को भी ऐसी कानूनी मान्यता दे दी गई है।
जहां तक इस राष्ट्रीय गीत का संबंध है, इसका अपना महत्त्व है। किसी समय यह आज़ादी के लिए जूझ रहे ज्यादातर भारतीयों का लोकप्रिय गीत था। बंगाल के प्रसिद्ध लेखक और कवि बंकिम चंद्र चटर्जी ने वर्ष 1875 में इस गीत की रचना की थी, जो उनके प्रसिद्ध नावल ‘आनंदमठ’ का एक हिस्सा था। इसमें मातृ-भूमि को देवी काली के रूप में दर्शाया गया है। आज़ादी के संघर्ष में जैसे-जैसे यह गीत व्यापक स्तर पर गाया जाता रहा था, वैसे-वैसे ही इसके साथ कई तरह के विवाद भी पैदा हो गए थे। इस गीत के मूल  रूप में 6 छंद हैं। पिछले छंदों में देवी दुर्गा और लक्ष्मी की प्रशंसा की गई है और उनके प्रति श्रद्धा दर्शाने वाले धार्मिक भाव हैं। उस समय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान मुस्लिम भाईचारे द्वारा इसका लगातार विरोध भी होता रहा है, क्योंकि मुसलमान भाईचारा धार्मिक रूप से अल्ला के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता की पूजा में विश्वास नहीं रखता। इसलिए वर्ष 1950 में राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत संबंधी व्यापक चर्चा होती रही। उस समय देश के प्रमुख नेताओं और ज्यादातर संविधान निर्माताओं ने जहां इस गीत की पृष्ठ भूमि के महत्त्व को स्वीकार किया, वहीं इस संबंधी उठते रहे लगातार विवाद को भी समझ कर इस गीत के छ: छंदों में से पहले 2 छंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाने के लिए मान्यता प्रदान कर दी थी। इस चयन के प्रति रबिन्द्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी सहमति प्रकट की थी, परन्तु राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पहले जनसंघ और बाद में बनी भाजपा हमेशा ही इस बात की समर्थक रही थी कि इस राष्ट्रीय गीत को समूचे रूप में ही गाया जाना चाहिए। वह इसके 2 छंदों के गायन की स्वीकृति देने के पीछे कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति को ज़िम्मेदारी ठहराती रही है और इस गीत को पूर्ण रूप में गाने को राष्ट्रीय गौरव भी कहती रही है। संघ ने 1950 में वंदे मातरम् गीत पूरा गाये जाने संबंधी निर्णय ले लिया था, फिर उसने और भाजपा ने इसे अपने पहले निर्धारित एजेंडे का एक हिस्सा बना कर इस पूरे गीत को कानूनी मान्यता देने के लिए यत्न शुरू कर दिए। अब जब पूरे देश में भाजपा शिखर पर है तो इसमें वह सफल हो गई और उसने वंदे मातरम् को ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत और विकसित भारत’ के संकल्प का प्रतीक करार देते हुए इसे कानूनी मान्यता प्रदान कर दी है। इस पर संसद में पैदा हुए अनिश्चित हालात के कारण पूरी चर्चा नहीं हो सकी परन्तु दक्षिण की तमिलनाडु की द्रविड मुनेत्र कड़गम की सांसद कनिमोझी ने लोकसभा में इस विधेयक के विरुद्ध सख्त विरोध दर्ज करवाया और यह आरोप लगाया कि सरकार इसके ज़रिये हिन्दुत्व के एजेंडे को राष्ट्रीयता के रूप में पेश कर रही है। उसने यह भी कहा कि यह देश के नागरिकों के विरुद्ध है। इस तरह राष्ट्रवाद थोपा नहीं जा सकता और यह देश के संघीय ढांचे और धर्म-निरपेक्षता की भावना के भी विरुद्ध है।
नि:संदेह भारतीय जनता पार्टी को देशवासियों ने बड़ा सम्मान देकर अपने सिर पर बैठाया है। इस तरह उसकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उसे यह सुनिश्चित बनाना चाहिए कि देश में भाईचारक साझ बनी रहे, यहां साम्प्रदायिकता को हवा देने वाली भावनाओं को मान्यता न दी जाए और संविधान की धर्म-निरपेक्षता की भावना का सम्मान किया जाए, इस तरह ही हमारा यह देश सही अर्थ में विकास के मार्ग पर चल सकेगा। हम पूरे विश्व के अन्य देशों के मुकाबले में अपने संविधान की भावना पर गर्व करते रहे हैं। पिछले 76 वर्ष से इसी भावना ने ही देश के अलग-अलग सम्प्रदायों और भाईचारे को एक साझ की शक्ति प्रदान की है। ऐसी साझ को बरकरार रखने का यत्न करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी भावना से ही देश की सरकारों को मज़बूती मिलेगी और देश के सम्मान में वृद्धि होगी। आज हमारी सरकारों को ऐसे गम्भीर और भावपूर्ण मामलों के प्रति सचेत होकर चलने की ज़रूरत होगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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