बेरहम सिस्टम और कितनों की जान लेगा ?
21 ज़िन्दगियां और एक सवाल, जिसका जवाब नहीं मिला जो कागज़ से गुज़र कर पूरी व्यवस्था से था, लेकिन विद्यार्थियों से मांगा गया, जबकि कठघरे में सभी, विशेषकर सरकार, विपक्ष और शिक्षा नीति निर्माता थे।
लज्जाजनक बात : कोई भी परीक्षा होती है, तो देश छात्र-छात्राओं को एक ही संदेश देता है—‘मेहनत करो, ईमानदारी से परीक्षा दो, तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है।’ लेकिन 2026 में उन्होंने पहली बार एक अलग सवाल पूछा—क्या हमारी मेहनत सच में सफल हुई थी क्योंकि सिर्फ एक प्रश्न-पत्र लीक नहीं हुआ था, उस दिन लाखों का भरोसा टूटा था। जांच, गिरफ्तारियां, परीक्षा रद्द, दोबारा हुई, विरोध प्रदर्शन, संसदीय बहस, शिक्षा मंत्री इस्तीफा, नया कानून और देश आगे बढ़ गया...लेकिन कुछ घर ऐसे थे, जहां समय वहीं रुक गया। ऋ तिक मिश्रा, अंशिका पांडे, समीक्षा दीपक पवार, अंकिता सांग, सना और न जाने कितने ऐसे नाम, जो शायद कभी इतिहास की किताबों में बड़े अक्षरों में नहीं लिखे जाएंगे। उनके सपने दफ्न हुए। कुछ घरों में आज भी किताबें वहीं खुली पड़ी हैं, उन्हें पढ़ने वाले लौटकर नहीं आए। तैयारी में परिवार का संघर्ष, पिता की जमा पूंजी, मां की अधूरी इच्छाएं, बेची ज़मीन, लिया कज़र्, छूटे त्योहार, रुकी हुई खुशियां और एक उम्मीद कि ‘इस बार सब ठीक हो जाएगा,’ लेकिन कुछ नहीं बदलता। बच्चों को बताया कि डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनना है, लेकिन नहीं सिखाया कि मंज़िल थोड़ी देर से मिले, तो ज़िन्दगी वहीं खत्म नहीं होती। एक पिता ने कहा, ‘उसे किसी ने नहीं मारा...परीक्षा के डर ने मार दिया।’ बच्चों को रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूटते देख रहे थे। सबसे बड़ा सवाल कि क्या ज़िम्मेदार सिर्फ वह है जिसने प्रश्न-पत्र लीक किया? क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल नहीं है? अगर भविष्य इसी परीक्षा पर निर्भर है...यह भी पूछा जाना चाहिए था कि बच्चे मानसिक रूप से दोबारा परीक्षा देने की स्थिति में हैं भी! अपराध होने के बाद जागना कुंभकर्णी नींद है। हर बार सज़ा की बात पहले, सुरक्षा पीछे चली जाती है।
सिंगापुर में परीक्षा प्रक्रिया में एक मछली सिस्टम को गंदा नहीं कर सकती। जापान में हर स्तर पर जवाबदेही तय होती है। दक्षिण कोरिया में प्रवेश परीक्षा का राष्ट्रीय महत्व और गलती की संभावना कतई नहीं। फिनलैंड की ताकत उसकी परीक्षा प्रणाली और संस्थानों पर भरोसा और छात्र निश्चिंत कि प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष है। ब्रिटेन में परीक्षा बोर्ड सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करते हैं। अमरीका सहित कोई भी विकसित देश इसे हल्के में नहीं लेता। तकनीक बदलती है, तो सुरक्षा भी। एक देश में तो परीक्षा की तैयारी ऐसे होती है जैसे देश का बजट बनता है। कुछ माह तक इससे जुड़ा व्यक्ति न घर जा सकता है, न किसी से बाहर बात कर सकता है और परिणाम आने तक वहीं रहता है।
सवाल कि भारत इन देशों जैसा क्यों नहीं है जबकि डिजिटल पेमेंट, अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक में हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं तो इसमें पीछे क्यों? बैंकिंग सिस्टम में कुछ सैकेंड करोड़ों के लेन-देन में धोखाधड़ी पहचानने के लिए काफी है, साइबर हमलों का अनुमान, ट्रैफिक नियंत्रण, भूकम्प और मौसम की सटीक भविष्यवाणी या कोई अन्य जानकारी प्राप्त करने में समर्थ हो रहे हैं, लेकिन वही तकनीक प्रश्न-पत्रों की सुरक्षा नहीं कर सकती, जिन पर करोड़ों छात्रों का भविष्य निर्भर है। वही सवाल—नए कानून में सज़ा का रोडमैप तो है, लेकिन रोकथाम नहीं करता। स्पेशल टास्क फोर्स का काम अपराध होने के बाद शुरू होगा या परीक्षा से पहले सुरक्षा की कमज़ोरियों की पहचान होगी और संभावित जोखिमों का आकलन, ताकि प्रश्न-पत्र तक अनधिकृत पहुंच न हो सके। अगर नहीं तो क्या हम फिर वही गलती दोहराने की तैयारी कर रहे हैं, क्योंकि भरोसा कानून से नहीं, व्यवस्था से बनता है और व्यवस्था तब मज़बूत होती है, जब अपराधी से पहले कमज़ोरी पकड़ी जाए।
बच्चों को दोष देना बंद करें : बच्चे व्यवस्था के बीच नहीं बड़े होते, घरों में होते हैं, स्कूलों, शिक्षकों, कोचिंग संस्थानों और फिर समाज की उम्मीदों के साथ बड़े होते हैं। यही वजह है कि इस कहानी में हम सभी हैं, लेकिन अगर हम पूरी ज़िम्मेदारी सरकार पर डाल दें, तो सबसे कठिन सच से बचना होगा। माता-पिता को क्या ज़रूरत है कि वे अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ बच्चों पर डालें और शिक्षा संस्थान अपने नतीजे को बेहतर बनाने के लिए उन पर दबाव डालें। दुर्भाग्य से आज बोझ किताबों का नहीं, दूसरों के सपने पूरे करने का है और यही उनकी हीनता और अनजान भय से ग्रस्त रहना है। प्रतियोगिता का माहौल ऐसा कि एक रैंक, एक नंबर और एक सीट ही पहचान है। विज्ञापनों और होर्डिंग्स पर टॉपर्स की तस्वीरें, लेकिन क्या उनके लिए जगह है, जो पूरी मेहनत के बाद भी सफल नहीं हुए और पोस्टर पर यह लिखा गया—अगर इस बार नहीं हुआ... तो भी तुम असफल नहीं हो। यही वह खामोशी है, जिस पर बात होना बाकी है। क्लर्क पैदा करने वाली शिक्षा नीति पर कोई बहस क्यों नहीं करता, जो एक आत्मविश्वासी युवा पीढ़ी पैदा करने में विफल रहती है?
प्रश्न उठना चाहिए : ऐसी शिक्षा नीति क्यों बनी जो विद्यार्थी की वर्षों की मेहनत का आकलन करने के बजाय कुछ घंटों की परीक्षा से उसका भविष्य तय कर देती है। ऐसे हज़ारों उदाहरण है कि परीक्षा से पहले गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया, दुर्घटना के कारण या साधन न होने से समय पर केंद्र न पहुंच पाए और अवसाद (डिप्रेशन) में चले गए और आत्महत्या कर ली। हज़ारों परिवार बच्चों को टूटते हुए देखते हैं और हाथ मलते रह जाते हैं।



