खाड़ी के तेल उत्पादक देशों को होर्मुज के विकल्प की तलाश

अमरीका-ईरान तनाव स्थायी होते देख पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक देशों ने होर्मुज के विकल्प की तलाश तेज़ कर दी है। रियाद से लेकर अबूधाबी और बगदाद तक, खाड़ी देशों की सरकारों ने यह समझ लिया है कि ईरान का ‘होर्मुज को बंद करने का कार्ड’ उनकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए स्थायी खतरा है। ‘वार-रिस्क बीमा प्रीमियम’ आठ गुना बढ़ने के साथ उत्पादन में 12 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक की कटौती की नौबत आ गई। ऐसे में फारस की खाड़ी से दुनिया तक तेल और गैस पहुंचाने वाली इस जलडमरूमध्य की संकरी पट्टी पर अत्यधिक निर्भरता उत्पादक और उपभोक्ता दोनों तरह के देशों को असहनीय होने से पहले उनमें पाइपलाइनों, सी-कॉरिडोर, रेलवे और नए एक्सपोर्ट टर्मिनल्स का एक नया बुनियादी ढांचागत तंत्र विकसित करने की अभूतपूर्व होड़ शुरू होना स्वाभाविक है। बेशक, खाड़ी के तेल उत्पादकों के लिए अगली रणनीतिक लड़ाई होर्मुज पर नियंत्रण की नहीं, उससे बच निकलने के रास्तों की है। इसीलिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इराक मौजूदा पाइपलाइनों की क्षमता बढ़ाने से लेकर नए निर्यात टर्मिनल, रेल और जमीनी कॉरिडोर विकसित करने में जुटे हैं। सऊदी अरब का दावा है कि 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट ‘पेट्रोलाइन’ जो उसके पूर्वी तेल क्षेत्रों को लाल सागर के यानबू से जोड़ती है, उसकी क्षमता को उसने सात मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचा दिया है। हालांकि इसका एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी तट की रिफाइनरियों में जाता है। अब इसमें उसकी तेल कंपनी आरामको एक से दो मिलियन बैरल प्रतिदिन अतिरिक्त क्षमता जोड़ने पर विचार कर रही है।
यूएई के पास अबूधाबी से फुजैराह तक जो पाइपलाइन दो मिलियन बैरल प्रतिदिन की क्षमता की है, उसके समानांतर उससे कुछ ज्यादा क्षमता वाली पाइपलाइन को 2027 तक चालू करने की योजना है। फुजैराह की खासियत है कि वह होर्मुज के बाहर ओमान की खाड़ी में है। इराक के सरकारी राजस्व का अधिकांश हिस्सा तेल से आता है, इसलिए वह किर्कुक से तुर्की के जेहान तक उत्तरी मार्ग को मज़बूत करने, सीरिया के बनियास तक पुराने कॉरिडोर को पुनर्जीवित करने और जॉर्डन के अकाबा तक रास्ता बनाने जैसी योजनाओं पर जुट गया है। इसी महीने इराकी तेल को ट्रकों के जरिए सीरिया के बनियास तक पहुंचाकर वहां से अमरीका सहित दूसरे बाज़ारों में भेजना शुरू भी हुआ है। इराक द्वारा ट्रकों के ज़रिए जॉर्डन या सीरिया तक तेल भेजने के प्रयास अत्यंत महंगे, धीमे और असुरक्षित हैं। कारगर विकल्प न होते हुए भी यह भविष्य की दिशा बताता है।
ज़ाहिर है इन प्रयासों से होर्मुज भविष्य में अप्रासंगिक नहीं होने वाला, न तो उसका भूगोल बदला जा सकता है और न इतनी विशाल ऊर्जा मात्रा को रातोंरात दूसरे रास्तों पर डाला जा सकता है। मगर यह तय है कि अब उसकी ‘अनिवार्यता’ घटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। युद्ध से पहले तकरीबन 20 मिलियन बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद प्रतिदिन इस रास्ते से गुज़रते थे। यह वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग तीस फीसदी है। इसके अतिरिक्त, दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत लिक्विफ ाइड नेचुरल गैस विशेषकर कतर से, इसी रास्ते से होकर वैश्विक बाज़ारों तक पहुंचती है। वर्तमान और प्रस्तावित परियोजनाएं मिलकर भविष्य में हर रोज़ ज्यादा से ज्यादा दस मिलियन बैरल तेल को वैकल्पिक रास्तों पर मोड़ सकती हैं, गैस के मामले में तो यह उपाय बिल्कुल विफल है। इसलिए ये प्रयास होर्मुज से गुज़रने वाले सामान्य प्रवाह का पूर्ण विकल्प नहीं है। फिर पाइपलाइन जितना तेल बाहर निकालेगी, उसके लिए दूसरी ओर पर्याप्त भंडारण, टर्मिनल और टैंकर-लोडिंग क्षमता भी चाहिए। इराक-सीरिया जैसे सीमा-पार कॉरिडोर में राजनीतिक स्थिरता, सुरक्षा, अरबों डॉलर की पूंजी और वर्षों का निर्माण समय अलग चुनौती है।
इस तरह एक चोक प्वाइंट की निर्भरता को दूसरे चोक प्वाइंट में बदल देना ऊर्जा सुरक्षा नहीं है। इसीलिए पाइपलाइन के साथ नया ‘सी कॉरिडोर’ मॉडल ज्यादा महत्वपूर्ण है। भविष्य का खाड़ी ऊर्जा नक्शा फारस की खाड़ी के भीतर से सीधे जहाज़ भेजने के बजाय तेल को पहले जमीन से फुजैराह, यानबू, सोहार, अकाबा, जेहान अथवा बनियास जैसे होर्मुज-बाहरी बंदरगाहों तक पहुंचाने और वहां से समुद्र में उतारने का हो सकता है। इससे एक मार्ग बंद होने पर दूसरा उपलब्ध रहेगा। यह ‘होर्मुज का विकल्प’ कम और ऊर्जा-मार्गों का विविधीकरण अधिक है। सवाल यह है कि इन गतिविधियों में अपनी ज़रूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल और 50 फीसदी प्राकृतिक गैस आयात करने वाले भारत का नफा-नुकसान क्या है? 
ओमान की खाड़ी माने फुजैराह या सोहार भारत के पश्चिमी तट यथा जामनगर, मुंद्रा, मंगलौर के बेहद करीब है। होर्मुज के अंदर जाने की बजाय फुजैराह या सोहार से तेल लोड करने पर भारतीय जहाज़ों को 2 से 3 दिन की यात्रा कम करनी पड़ेगी, जिससे ‘टन-माइल’ लागत और समुद्री भाड़े में बचत होगी। आपूर्ति के अनेक रास्ते युद्ध-जोखिम प्रीमियम, टैंकरों की कमी और अचानक आयात रुकने की आशंका घटा देंगे। खाड़ी में पाइपलाइन, पोर्ट विस्तार, इत्तिहाद रेल, हफीत रेल और लॉजिस्टिक्स पार्क्स के निर्माण में अरबों डॉलर का निवेश हो रहा है। भारत के पास निर्माण व प्रबंधन अनुबंध हासिल करने का यह अवसर है। लेकिन लाभ अपने साथ लागत भी लाता है। यानबू से भारतीय बंदरगाहों तक तेल को बाब-अल-मंदेब से गुजरना पड़े या अफ्रीका का लंबा चक्कर लगाना पड़े तो परिवहन महंगा होगा। इराकी तेल यदि भू-मध्य सागर पहुंच कर फिर भारत आए तो उसकी समुद्री यात्रा बसरा से भारत आने की तुलना में लंबी और महंगी होगी। 
भारत के आयात का लगभग 60 प्रतिशत खाड़ी देशों से आता है, जो ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से होकर गुजरता है। खाड़ी के वैकल्पिक कॉरिडोर भारत के लिए लाभकारी होंगे, क्योंकि सऊदी और यूएई का तेल होर्मुज बंद होने पर भी फुजैराह अथवा यानबू से उपलब्ध रहेगा। 
भारत की बड़ी चिंता केवल कच्चा तेल नहीं, एलएनजी भी है। कतर की एलएनजी के लिए कोई पाइपलाइन बाईपास मौजूद न होने से होर्मुज में किसी भी दीर्घकालिक रुकावट से भारतीय ऊर्जा क्षेत्र तक असर पहुंचा सकता है। भारत को संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह और सऊदी अरब के यानबू के नए एक्सपोर्ट टर्मिनल्स में भंडारण क्षमता किराये या लीज़ पर लेने हेतु द्विपक्षीय समझौते अभी करने चाहिए। दीर्घकालिक रूप से खाड़ी के इस नए लॉजिस्टिक्स ढांचे से भारत की ऊर्जा सुरक्षा अधिक सुदृढ़, बहुआयामी और सुरक्षित बन सकती है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#खाड़ी के तेल उत्पादक देशों को होर्मुज के विकल्प की तलाश