मध्यस्थता से विवादों का निपटारा बेहतरीन विकल्प

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सही ही कहा है कि हर विवाद का निस्तारण लंबी न्यायिक प्रक्रिया के ही तहत हो, यह ज़रूरी नहीं है। मध्यस्थता यानी की आपसी बातचीत-सहमति से भी विवादों का निपटारा किया जा सकता है। मध्यस्थता से विवादों का निपटारा हमारी सनातन परम्परा का हिस्सा रहा है। जयपुर में राजस्थान स्टेट लीगल सर्विसेज अॅथारिटी द्वारा आयोजित कामनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रैंस इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाती है कि विवादों के निस्तारण के लिए मध्यस्थता हमारी सनातन परम्परा रही है जिसे समय के साथ भुला दिया गया। दूसरी और मध्यस्थता से विवादों के निस्तारण की आवश्यकता लम्बे समय से महसूस की जाती रही है। न्यायालयों में वादों का जो अम्बार लगा हुआ है, उनमें मध्यस्थता के दायरे में आने वाले वादों की अच्छी खासी संख्या है और आपसी समझ से इनमें से अधिकांश वादों का निस्तारण आसानी से हो सकता है। संपत्ति को लेकर आपसी विवाद, पति-पत्नी के मनमुटाव, भरण-पोषण, पारिवारिक बंटवारें जैसे मामलों को मध्यस्थता के माध्यम से आसानी से निपटाया जा सकता है। इसके अलावा व्यापारिक विवाद खासतौर से लेन-देन, व्यापारिक समझौते के विवाद, कज़र् की वसूली, उपभोक्ता सेवाओं से संबंधित विवाद मोटर दुर्घटना, मोटर व्हीकल एक्ट आदि से संबंधित विवाद और नियोक्ताओं और कार्मिकों के बीच के विवाद और इसी तरह की श्रेणी के विवादों को आपसी समझौतों से आसानी से निपटाया जा सकता है। लोक अदालतों के माध्यम से ऐसे प्रयास किये भी जा रहे हैं तो दूसरी और मध्यस्थता से विवादों के निपटारों पर पहले भी ज़ोर दिया जाता रहा है। करीब पांच साल पहले फिक्की के एक समारोह में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश शरद अरविन्द बोबड़े ने अदालतों में मुकद्दमों के बोझ को कम करने के लिए संस्थागत मध्यस्थता की ज़रुरत जताई है।  इसमें कोई दो राय नहीं कि मुकद्दमों के बोझ तले दबी न्यायिक व्यवस्था को लेकर न्यायालय, सरकार, गैर-सरकारी संगठन और आमजन सभी गंभीर है। अनावश्यक पीएलआर दाखिल करने की प्रवृति पर सख्त संदेश देकर आए दिन लगने वाली पीएलआर पर कुछ हद तक अंकुश लगाने में सफल रहे हैं। लोक अदालतों के माध्यम से भी आपसी समझ से मुकद्दमों को कम करने के प्रयास जारी है। लोकअदालतों का आयोजन अब तो नियमित होने लगा है।  देश के न्यायालयों में लंबित मुकद्दमों के गणित को प्राप्त आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार 4.9 करोड़ न्यायिक प्रकरण देश की निचली एवं ज़िला अदालतों में ही लंबित चल रहे हैं। एक जानकारी के अनुसार देश की सर्वोच्च न्यायालय में ही 93 हज़ार दीवानी एवं फौजदारी मामले लंबित चल रहे हैं। राज्यों के उच्च न्यायालयों में करीब 64 लाख मामलें विचाराधीन है। इन आंकडों में कमी-पेशी हो सकती है, परन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि न्यायालयों में विचाराधीन वादों की संख्या करोड़ों में है। सर्वोच्च न्यायालय देश में लंबित मुकद्दमों के प्रति बेहद गंभीर है। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पुराने मामलों का प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण करने के निर्देश दिए हैं। सबसे खास बात यह है कि मध्यस्थता या आपसी सहमति से विवादों के निपटारें से केवल विवादों का निस्तारण ही नहीं होता अपितु आपसी सौहार्द भी बना रहता है। खासबात यह है कि वादी और प्रतिवादी विवादों को लंबा नहीं खींचना चाहता ऐसे में मध्यस्थता से विवादों का निपटारा बेहतरीन विकल्प ही माना जाना चाहिए।           -मो. 94142-40049

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