मतदाता सूची के संशोधन की पारदर्शिता
जब से भारतीय चुनाव आयोग द्वारा देश भर में मतदाता सूची के अलग-अलग चरणों पर विशेष संशोधन (एस.आई.आर.) की प्रक्रिया शुरू की गई है, उसके बाद देश भर में इसकी व्यापक चर्चा बनी रही है। इसकी घोषणा के बाद कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में समय बहुत कम रह गया था, जिस कारण इस बेहद विशाल और जटिल कार्य को पूरा करने के लिए ज्यादा मुश्किलें भी पेश आईं और यह आधा-अधूरा भी रह गया। इस बात को लेकर चुनाव आयोग की कड़ी आलोचना भी हुई और उस पर सरकारी पक्ष लेने का भी आरोप लगता रहा। इस मामले संबंधी बड़ी संख्या में मामले आज भी अदालतों में चल रहे हैं। कई बड़ी विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने लगातार चुनाव आयोग को अपनी आलोचना का निशाना भी बनाए रखा है, जो अब तक भी जारी है, परन्तु इस सब कुछ के बावजूद चुनाव आयोग ने देश भर में अपना विशेष मतदाता सूची संशोधन का कार्यक्रम जारी रखा है।
कई राज्यों में लाखों की संख्या में सीमा पार से घुसपैठ करके आए व्यक्तियों को भी पहचान पाने का कार्य बेहद कठिन था। ऐसे राज्यों में मतदाताओं की पहचान करने में बहुत मुश्किलें भी पेश आईं। कई विपक्षी पार्टियों ने तो यह भी आरोप लगाए कि वहां लाखों की संख्या में जो वोट काटे गए हैं, उससे आयोग ने सरकार का पक्ष-पोषण किया है। पंजाब में भी यह कार्य बेहद कठिन था। इसलिए प्रत्येक पक्ष से सुचेत रहने की ज़रूरत थी। क्योंकि पिछले दशकों में प्रदेश में लाखों की संख्या में प्रवासी आते रहे हैं और ज्यादातर यहां बस भी गए हैं। इसी तरह लाखों की संख्या में लोग यहां से देश के अन्य राज्यों और दुनिया के ज्यादातर सभी देशों में भी पलायन कर चुके हैं। ऐसी स्थिति में यह काम और भी टेढ़ी खीर बनता दिखाई देता था। योग्य और उचित मतदाताओं की पहचान करना, मृतक और दोहरी वोटों को सूची से हटाना, स्थायी तौर पर प्रवास कर गए लोगों या परिवारों की गिनती करना भी मतदाता संशोधन के कार्यों में शामिल हैं। इसकी बड़ी ज़िम्मेदारी पंजाब के मुख्य चुनाव आयुक्त आनंदिता मित्रा पर थी, जिन्होंने अपनी टीम के साथ इस कार्य को सफल बनाने के लिए पूरी योजनाबंदी भी की और ज्यादातर सभी संबंधित पक्षों की भी इसमें भागीदार करवाई। इस प्रक्रिया में हज़ारों की संख्या में ज़िला और ब्लाक स्तर के कर्मचारी भी शामिल थे। कई ढंग-तरीकों से आम नागरिकों को भी इसमें शामिल किया गया और विशेष रूप से राजनीतिक पार्टियों की इसमें भागीदारी भी करवाई गई। यह प्रक्रिया शुरू करने से पहले नागरिकों को जागरूक करने के लिए समाचार पत्रों, रेडियो, सोशल मीडिया का सहारा लिया गया और स्थान-स्थान पर विशेष बूथ शिविर भी लगाए गए।
प्रदेश में 2 करोड़, 14 लाख से अधिक रजिस्टर्ड मतदाता थे, जिनकी पहचान के लिए 2003 की मतदाता सूची के अनुसार मैपिंग भी करवाई गई और मतदाताओं के लिए गणना फार्म भी बूथ स्तर के अधिकारियों ने मतदाताओं के दर्ज पते पर जाकर बांटे और उन्हें लगातार घरों में जाकर फार्म भरने और अन्य ज़रूरी दस्तावेज़ उपलब्ध करवाने के लिए याद भी करवाया जाता रहा। पहला चरण पूर्ण होने के बाद मुख्य अधिकारी की ओर से जो जानकारी दी गई है उसके अनुसार मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूचियों संबंधी सामने आए तथ्यों और आंकड़ों के अनुसार 5.74 लाख लोग मृतक पाए गए। 4.12 लाख लापता पाए गए और 1.19 लाख लोगों की दोहरी वोट बनी पाई गईं। मतदाता सूची को अंतिम रूप देने के लिए 13 अगस्त से 12 सितम्बर तक दावे और एतराज़ पेश करने के लिए समय निर्धारित किया गया है। जिनका निपटारा 8 अक्तूबर तक किया जाएगा और 12 अक्तूबर तक अंतिम सूची तैयार कर ली जाएगी। चुनाव आयोग की ओर से यह समूची प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी रखने का यत्न किया गया है। इससे प्रदेश के मतदाता की पहचान निश्चित की जा सकेगी। किसी भी चुनाव के लिए की गई ऐसी व्यवस्था जहां बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकती है, वहीं यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी और मज़बूत और विश्वसनीय बनाने में सहायक हो सकेगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

