उप-चुनाव के संकेत
देश के किसी भी राज्य में हुए कुछ उप-चुनाव से वहां की सरकार पर प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु अपने-अपने ढंग से ये उप-चुनाव कोई न कोई संदेश ज़रूर छोड़ जाते हैं। इसके साथ ही यह ज़मीनी हकीकत को भी दर्शाने का यत्न करते हैं। विगत दिवस देश के तीन राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात की विधानसभाओं की एक-एक सीट पर उप-चुनाव हुए। इनके परिणामों को सभी संबंधित राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने ढंग से लिया है। बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार है। यहां के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में जहां भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यू) ने मिलकर चुनाव लड़े थे, वहीं लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल पार्टी की हार हुई थी, परन्तु इस राज्य में उस समय प्रसिद्ध राजनीतिक सिद्धांतकार प्रशांत किशोर ने भी अपनी जन सुराज पार्टी बना कर विधानसभा चुनाव लड़े थे। उन्होंने कुछ वर्ष पहले ही अपनी यह पार्टी बनाई थी, परन्तु इन चुनावों में उनकी पार्टी की नमोशीजनक हार हुई थी।
प्रशांत किशोर ने अपनी जन सुराज पार्टी के नाम पर बिहार की सभी 238 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़े थे परन्तु इनमें वह 2 को छोड़ कर 236 सीटों पर अपनी पार्टी के उम्मीदवार की ज़मानत भी नहीं बचा सके थे, परन्तु अब बांकीपुर उप-चुनाव में वह स्वयं भारी अंतर से जीत गए हैं। बांकीपुर विधानसभा का अपने आप में इसलिए बड़ा महत्त्व है, क्योंकि यह सीट भाजपा के निर्वाचित नए अध्यक्ष नितिन नबीन के राज्यसभा में जाने के बाद रिक्त हुई थी। नितिन नबीन इस सीट से पहले 5 बार चुनाव जीते थे और उनसे पहले उनके पिता 4 बार बांकीपुर से विधायक बने थे। नि:संदेह इस एक सीट की हार से भी भाजपा को आघात पहुंचा है। प्रशांत किशोर ने अपने चुनाव प्रचार में बेरोज़गारी, गरीबी और लोगों की डावांडोल आर्थिकता को अपना केन्द्र बिन्दु बनाया था। बिहार में अभी तक भी जातिवाद का बोलबाला रहा है। प्रशांत किशोर ब्राह्मण हैं। वह बाकी स्वर्ण मतदाताओं को भी अपने साथ लेने में सफल हुए हैं। नितीश कुमार को मुख्यमंत्री के पद से हटाए जाने से बड़ी संख्या में कुर्मी मतदाता भी भाजपा से नाराज थे। मुस्लिम और यादव मतदाताओं ने तो अक्सर भाजपा को दृष्टिविगत ही किया है। प्रशांत की जीत के और स्थानीय कारण भी हो सकते हैं परन्तु भाजपा के लिए समूचे रूप में यह एक बड़ा झटका माना जाएगा। मध्य प्रदेश में भी भाजपा की सरकार है। यह प्रभाव बना रहा है कि उप-चुनाव अक्सर सत्तारूढ़ पार्टी ही जीतती है, परन्तु मध्य प्रदेश के दतिया उप-चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस ने अपनी जीत दर्ज करवाई है। गुजरात अभी भी भाजपा का मज़बूत किला माना जाता है। वहां मांजलपुर में भाजपा के उम्मीदवार का जीतना कोई बड़ी बात नहीं मानी जा सकती।
इन चुनावों से इन राज्यों की राजनीतिक हकीकत पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ा परन्तु यह भाजपा की कार्यशैली की ओर इशारा ज़रूर करती हैं। यह भाजपा के नेतृत्व के उस भ्रम को तोड़ने का प्रत्यक्ष प्रमाण ज़रूर है कि वह अपने तौर पर चाहे कोई भी कदम उठा ले उसे रोकने, टोकने और एतराज़ करने वाला कोई नहीं। इन चुनावों पर युवाओं के आन्दोलन और राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का प्रभाव भी ज़रूर दिखाई देता है। ये उप-चुनाव भाजपा को पुन: सोचने और अपनी नीतियों में बदलाव करने का संकेत ज़रूर करते हैं। इसलिए भी कि आगामी 6 महीने तक उत्तर प्रदेश के चुनाव भी नज़दीक ही दिखाई दे रहे हैं।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

