तीन उप-चुनावों में क्या लोकसभा-2029 की झलक है ?
हालांकि उपचुनावों से कोई दूरगामी भविष्यवाणी करना, अपने आपमें खतरनाक होता है लेकिन जिस तरह बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट से जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर भारी बहुमत से जीते हैं और मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा द्वारा अपनी सारी ताकत झोंक दिये जाने के बावजूद भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी 6016 मतों से हार गये हैं, उससे साफ पता लगता है कि फिलहाल देश के मतदाता भाजपा से खुश नहीं हैं। तीन से एक विधानसभा उपचुनाव में भाजपा केवल एक पर जीत दर्ज कर सकी है। इससे देश के सियासी माहौल का अनुमान लगाया जा सकता है। बांकीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा लगभग अजेय समझी जाती थी। यहां पिछले 9 बार से भाजपा नहीं हार रही थी। पिछले 5 बार से तो उसके मौजूदा अध्यक्ष नितिन नबीन लगातार जीत रहे थे और जनसुराज का आलम यह था कि बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में उसके सभी उम्मीदवारों की न सिर्फ हार हुई थी बल्कि 99 प्रतिशत से ज्यादा की जमानत जब्त हो गई थी लेकिन उसी बिहार में सिर्फ सवा साल बाद जनसुराज के मुखिया प्रशांत किशोर ने न सिर्फ इस बहुचर्चित मुकाबले में भाजपा के उम्मीदवार को शिकस्त दी बल्कि प्रशांत किशोर ने अपने दोनों प्रतिद्वंद्वियों द्वारा पाये साझा मतों से भी 5051 मत ज्यादा पाये।
भाजपा और राजद दोनों के उम्मीदवारों को मिलकर 59,100 वोट मिले, जिसमें भाजपा के उम्मीदवार को 44,827 और राष्ट्रीय जनदल के उम्मीदवार को सिर्फ 14,273 वोट मिले जबकि प्रशांत किशोर को अकेले 64,151 वोट मिले, जो कि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी से 19,324 ज्यादा थे। बांकीपुर में 1,30,313 वोट पड़े थे, जिसमें लगभग 50 प्रतिशत वोट अकेले प्रशांत किशोर को मिले, जो वर्तमान के सियासी माहौल की तस्दीक करता है कि किस तरह देश का सियासी माहौल बदला है। हालांकि इस सबके बावजूद ऐसी कोई भी भविष्यवाणी खतरे से भरी होगी, जिसमें हम यह मान लें कि साल 2029 के लोकसभा चुनावों की पटकथा लिखी जा चुकी है और वह भाजपा के पराजय की पटकथा है।
दरअसल भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां मतदाता किसी भी दल को स्थायी जनादेश नहीं देता। वह समय-समय पर सरकारों को संदेश भी देता है और चेतावनी भी। यही कारण है कि उपचुनावों को राजनीतिक दल केवल सीटों की संख्या के आधार पर नहीं देख सकते। मतदाताओं के मूड को समझने का माध्यम इसे मानते हैं और जो तात्कालिक तौर पर मतदाताओं के मूड का अंदाजा लगाया जा सकता है, वह बिल्कुल यही है कि फिलहाल तो देश के मतदाता भाजपा से नाराज़ लग रहे हैं और ऐसा होना स्वाभाविक है। पहले अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की धोखाधड़ी से लोग अवाक रह गये और फिर जिस तरह से केंद्र सरकार ने राजधानी दिल्ली में युवाओं के आंदोलन से क्रूरता के साथ निपटने की कोशिश की, वह कोशिश शायद करेले में नीम साबित हुई है। जिस जनसुराज पार्टी को बिहार के मतदाताओं ने पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान पूरी तरह से खारिज कर दिया था, उसी जनसुराज पार्टी को जिस तरह इन उपचुनावों में लोगों ने हाथोंहाथ लिया है, उससे भले यह तात्कालिक असर हो, लेकिन प्रशांत किशोर यानी पीके जिस तरह पिछले पांच सालों से लगातार बिहार में अपनी राजनीतिक जड़ें जमाने की कोशिश कर रहे हैं और बिहार के लोगों को जाति, धर्म और बाहुबलियों को वोट देने की जगह, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए मतदान करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, लगता है उसका असर होना शुरू हुआ है।
हालांकि नि:संदेह इस नतीजे में जंतर-मंतर आंदोलन की बड़ी भूमिका है। साथ ही यह तो माना ही जा सकता है कि भाजपा का यह भ्रम कि वह कुछ भी कर दे, लेकिन उसके प्रति लोगों का मोहभंग नहीं होगा, यह गलतफहमी दूर हो गई है। जिस तरह पिछले एक महीने से देश में भाजपा हर तरह की राजनीतिक आलोचना के केंद्र में थी, उससे यह समझना या अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि भाजपा भी यह जानती थी कि मतदाता काफी हद तक उससे नाराज़ हैं। इसलिए वह मतदाताओं की नाराजगी दूर करने के लिए कोई भी कसर छोड़ नहीं रखी थी। अपनी सारी चुनावी ताकत उसने इन तीन विधानसभा उपचुनावों में झोंक दी थी। एक-एक बूथ पर उसके दस-दस कार्यकर्ता मौजूद थे और बिहार हो या मध्य प्रदेश इन उपचुनावों में हर जगह उसने अपने नेताओं की फौज तो उतार ही रखी थी, चूंकि दोनों ही राज्यों में वह सत्ता में थी। इस तरह से प्रशासन का भी लाभ उसी को मिल रहा था। इसके बावजूद दोनों ही विधानसभा चुनावों में जैसे कि आशंका लग रही थी, भाजपा हार गई। इससे यह अनुमान लगाना निरानिर गलत नहीं है कि अगर भाजपाजल्द ही अपने कामकाज का पुनर्मूल्यांकन नहीं करती, तो लगातार चौथी बार केंद्र में सरकार बनाना फिलहाल तो नामुमकिन लगने लगा है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले एक दशक में भाजपा ने राष्ट्रीय राजनीति में वर्चस्व के सभी पारंपरिक मायने बदल दिये हैं। इस समय देश के ज्यादातर राज्यों में या तो उसकी निजी या उसके सहयोगियों के साथ सरकार है। हर राज्य में उसका संगठन बहुत मजबूत है। भाजपा के नेतृत्व की देश में स्वीकार्यता बढ़ी है और चुनावी मशीनरी भी उसकी अब तक की सबसे प्रभावी मानी जाती है लेकिन लोकतंत्र में अगर मतदाता का मन बदल जाए, तो यह सारी ताकतें फुस्स साबित होती हैं। जिस तरह से पिछले डेढ़ साल में देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और विदेशनीति संकट हर तरफ देखने को मिल रहा है, उससे भाजपा भले इंकार करे, लेकिन देश में मतदाताओं के बीच एक असंतोष है और यह इस देश के मतदाताओं का खामोश स्वभाव रहा है कि वह किसी भी पार्टी को जब उसे लगने लगे कि वह अजेय है, उसे अर्श से उठाकर सीधे फर्श पर ला देता है। वास्तव में किसी भी जीत-हार का एक बड़ा अंतर किसी राजनीतिक दल के जमीनी कार्यकर्ताओं से होता है। भाजपा के कार्यकर्ताओं में पिछले काफी दिनों से खासकर राम मंदिर चंदा घोटाले के बाद से बेहद असंतोष है। दतिया के उपचुनाव में तो भाजपा के हारे हुए उम्मीदवार आशुतोष तिवारी का साफ-साफ कहना है कि वह कांग्रेस से नहीं बल्कि अपने भाजपा के लोगों से ही हारे हैं।
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