गाली गलौच का राजतिलक
आज जबकि यहां जीवन एक गाली-सा हो गया है, इस जीवन को जीते हुए गालियों की अर्थवत्ता पर गम्भीर चर्चा होती देख कर मन विद्वान हो जाने को चाहने लगता है। इस बार बात तो तब चौंक कर शुरू हुई थी जब न्यायक्षेत्र की एक वरिष्ठ टिप्पणी में कहा गया कि ‘किसी को गाली देना कोई अपराध नहीं, अगर वह सार्वजनिक रूप से किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती।’ बात सोचने वाली थी कि लो गालियों की सत्ता की स्वीकृति भी शुरू हो गई।
वैसे तो सदियों से गालियों के प्रभाव की चर्चा सुनते आये हैं। गालियों के भी कई रूप होते हैं। आप हर कदम पर जीवन की विसंगतियां झेलते हुए अगर अपने मन में इसे गाली देते हैं, तो यह कोई गाली नहीं, रोज का व्यवहार है। समस्या तब शुरू होती है जब कोई ऊंची आवाज़ में मुखर हो कर किसी को कोई गाली दे।
इतिहास साक्षी है जब द्रौपदी ने दुर्योधन को ‘अन्धे का पुत्र अंधा’ कह दिया तो, तो यह उसको इतना बुरा लगा कि महाभारत हो गया था। जब जरासंध ने भगवान कृष्ण को अपनी सुरक्षित सीमा से अधिक गालियां दे दीं, तो उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया था।
़खैर आजकल भी चुनावी और राजनीतिक मंचों से एक दूसरे को गाली देने की परम्परा है। इसे वाकचातुरी या संभाषण कला कह दिया जाता है। अत: किसी कृष्ण का कोई सुदर्शन चक्र नहीं चलता। हां मानहानि का आरोप लगा कर आप अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं, जहां यह तारीख पर तारीख के चक्र में उलझ सकती है। निर्वाचित प्रतिनिधि संसद या विधानसभा में एक दूसरे के लिए गाली गलौच का प्रदर्शन करते हुए अपनी मौलिकता दिखा सकते हैं। इस पर कोई कानूनी पचड़ा नहीं हो सकता। हां अधिक से अधिक इसे असंसदीय कह कर रिकार्ड से निकाल दिया जाता है, या इसके फलस्वरूप उसका सत्र हंगामे की भेंट होकर स्थगित हो जाता है।
इतिहास साक्षी है कि संसद या विधानसभा का जब भी कोई नया सत्र शुरू होने वाला होता है, तो स्पीकर सब दलों की एक सर्व सहमत मीटिंग अवश्य करते हैं कि इस बार मुद्दों पर गम्भीर चर्चा होगी, सार्थक परिणाम निकलेंगे, लेकिन फिर वही इतिहास साक्षी है कि परिणाम यही निकलता है कि संसदीय या असंसदीय गाली गलौच के साथ पूरा सत्र हंगामे की भेंट हो गया है, और सत्ता पक्ष को अपने बहुमत के बल पर बिना चर्चा के विधेयक पास करवाने पड़ते हैं। सत्रावसान के समय परिणाम यही निकलता है कि सब अपेक्षित विधेयक पास हो गये, लेकिन बिना चर्चा के। यूं लोकतंत्र का काम चलता है, और विधेयक जन-कल्याण के लिए पारित होकर कानून बन जाते हैं।
इस गाली गलौच में भाषा के संस्कार का बड़ा महत्त्व होता है। ज्यों-ज्यों देश में पुस्तक संस्कृति की मौत हो गई, और बन्दों का भाषा और व्याकरण का ज्ञान लुप्त हो गया है। गालियों ने तो भाषा के स्तर पर अभूतपूर्व तरक्की कर ली है। अब इनमें खिचड़ी भाषा का इस्तेमाल कर उन्हें और भी तीखा कर लिया गया है और जब इनका वार पक्ष-प्रतिपक्ष पर किया जाता है तो आदमी तिलमिला उठता है और सोचता है संस्कृति में गंगा-यमुना संस्कृति का मेल तो सही था, यह गालियों की भाषा में तो बड़ा मारक हो गया।
अब देखिये न उपेक्षा करने के भाव से एक न्यायपीठ ने नौजवानों के एक दल की लतरानियों को उपेक्षित कर ‘कॉकरोच’ कह दिया। इसी नाम का एक दल बना कर हज़ारों नौजवान जंतर-मंतर पर इकट्ठा होकर बैठ गये, तब इनके प्रदर्शन से दिल्ली दरबार हिल गया और शिक्षा मंत्री तक को इस्तीफा देना पड़ा।
लेकिन असल राजनीति तो इस्तीफे के बाद शुरू हुई। आंदोलन में जो गालियां दी गईं, उनका राजनीति के शिखर पुरुषों ने बहुत बुरा मनाया। ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात’ कह कर उन्होंने उन्हें माफ तो कर दिया, लेकिन जब कानून ने कहा कि वह तो अपनी राह पकड़ेगा तो उसे छकाने के लिए जंतर-मंतर में फिर मजमेबाज़ इकट्ठे होने लगे, एक नया गाली पुराण लेकर।
असल में युग बदल गया है। इस बदलते युग की भाषा से पुराने लोगों को बदहज़मी होने लगी है, लेकिन भाषा है कि बदलने से बाज़ ही नहीं आती। यह भाषा पुस्तकों के भण्डार से नहीं मिलती ओ.टी.टी. की धुरंधर फिल्मों से अवतरित होती है। अपने भदेसपन में यह और भी मौलिक और कांटे की हो जाती है। सभ्य प्रासादों में भद्रजन तिलमिला उठते हैं, और उनसे क्षमा मांगने की उम्मीद करने लगते हैं।
बस झगड़ा यहीं से शुरू होता है। नया युग है न। आजकल कोई किसी से क्षमा नहीं मांगता। हां, अपना बड़प्पन दिखाने के लिए क्षमा करने के लिए अवश्य तैयार रहता है। तभी तो आजकल क्षमा करने की प्रक्रिया और पुलिसिया बैंत बरसाने के उद्यम का चोली-दामन का साथ हो गया है। बस आज का युग तो यूं ही बदल गया है। बीते कल के लोगों को समझ नहीं आता तो हम क्या करें।



