विद्यार्थी आंदोलन से हुए नुकसान को घटाने के लिए यत्न शुरू
अब आरएसएस के तीसरे नंबर के नेता अतुल लिमये ने लिखा है कि कॉकरोच आंदोलन राष्ट्र विरोधी था। लिमये का कहना काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ उनमें अपना भविष्य देखता है। वो भागवत के बाद के संघ में काफी अहम भूमिका निभा सकते हैं। अभी वो सर सहकार्यवाह हैं के. एस. सुदर्शन भी सर संघचालक बनने के पहले सर सहकार्यवाह ही थे। ऐसे में जब वो कहते हैं कि बच्चों का आंदोलन राष्ट्रविरोधी, संविधान विरोधी था और इसकी काट ढूंढनी चाहिये तो उनके बयान को हल्के में नहीं लेना चाहिये। सवाल यह है कि वो क्यों ऐसा कह रहे हैं। सौ साल पूरे करने वाला आरएसएस छात्र आंदोलन की छवि को क्यों खराब करना चाहता है और उससे डरा हुआ क्यों महसूस करता है?
कॉकरोच आंदोलन ने दरअसल प्रधानमंत्री मोदी को लेकर जो मिथ गढ़ा गया था, उसे छिन्न-भिन्न कर दिया है। वो छवि जो बहुत मेहनत से गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी बनाई थी वो खत्म हो गई है। वो हिंदू हृदय सम्राट थे। शहरी मध्य वर्ग के चहेते थे। उनमें एक मसीहा की तस्वीर को उकेरने की कोशिश की गई थी। वो सामान्य नेता नहीं है, ऐसा उनके लोग कहते थे। यह बताया गया कि आज़ादी के बाद इस देश में जो कुछ भी गड़बड़ हुआ है, वो उन सारी समस्याओं का समाधान हैं। वो देश के उद्धारक हैं। ये अकस्मात नहीं हैं कि 2014 से वो देश को ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनमें ‘दैवीय’ अंश हैं और नियति उनसे कुछ बड़ा करवाना चाहती है, इसीलिये उनका जन्म हुआ है। 2024 के चुनाव के समय मोदी ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि वो ‘नान बायोलॉजिकल’ हैं। यानी वो ईश्वरीय हैं। जैसा कई बाबा अपने को बताने की कोशिश करते हैं और उनके भक्तों की एक लंबी फौज होती है। लेकिन इस आंदोलन के दौरान बच्चों ने जिस तरह से उनका मजाक उड़ाया, मीम बनाये, रील बनायी उसने प्रधानमंत्री और उनके समर्थकों को अंदर से तोड़ दिया है, वो हतप्रभ हैं। वो सोच रहे हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है?
हालांकि इस दौरान कुछ बच्चों ने प्रधानमंत्री को गालियां भी दी हैं, भद्दी भाषा का भी इस्तेमाल किया गया। मैं ऐसे किसी भी तरह के गाली गलौच और भाषा का समर्थन नहीं करता लेकिन ये सोचने का वक्त है कि जो इस देश के युवाओं के पसंदीदा थे, जिनसे युवाओं को उम्मीदें थीं, वो क्यों इस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर रहे थे। ये समझना ज़रूरी है। जब एक मसीहा की तस्वीर टूटती है तो आवाज़ भले ही न हो, लेकिन लोगों की उम्मीदें टूटती हैं, वो पीड़ा की अनुभूति करते हैं। वो अपने को ठगा महसूस करते हैं। तस्वीर टूटने के साथ उनके अंदर भी कुछ टूटता है और फिर वो प्रतिक्रिया में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जो सामान्यत: वो नहीं करना चाहते। ये अच्छा है कि प्रधानमंत्री ने बच्चों को गाली देने की एवज़ में सज़ा नहीं दी, उन्हें माफ कर दिया। ये डैमेज कंट्रोल है। ये फिर से युवाओं का दिल जीतने की कोशिश है लेकिन ये काफी नहीं है। जो नुकसान होना था वो हो चुका है। उसकी भरपायी माफी से नहीं होगी। साथ ही ये खतरा भी है कि कहीं फिर कोई नया जंतर मंतर न बन जाये और अगर फिर बना तो ये मौजूदा सरकार के लिये जानलेवा साबित होगा। संघ परिवार इस कड़वी सचाई से परिचित है। लिमये का बयान और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का आह्वान इस सच्चाई की स्वीकारोक्ति है।
संघ परिवार इस बात को भी अच्छी तरह से जानता है कि प्रधानमंत्री मोदी की पहले की छवि को फिर से स्थापित करना लगभग असंभव है। एक बार जो तस्वीर या मूर्ति टूट जाती है, तो उसे जोड़ भले ही दिया जाये वो मुकम्मल नहीं होती, वो कामचलाऊ होती है। पहले वाली नैतिक आभा खत्म हो जाती है, वो दैवीय नहीं होती। उसमे ईश्वर का अंश खोजना लोग बंद कर देते हैं। इसलिये हमारे समाज में खंडित मूर्ति की पूजा नहीं होती। इस नुकसान की भरपाई के लिये ज़रूरी है कि आंदोलन की नैतिक आभा को खत्म किया जाये ताकि वो फिर से न उठ पाये। लिमये दरअसल उस नैरैटिव को और धार दे रहे हैं जो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद शुरू हआ था। बारह साल में पहली बार किसी आंदोलन के दबाव में मोदी सरकार के एक बेहद शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री का त्यागपत्र हुआ था। ये वो सरकार है जो दावा करती है कि वो किसी के दबाव में काम नहीं करती। आंदोलन को राष्ट्रविरोधी कहना, उस प्रकिया का हिस्सा है जिसे आंदोलन की ताकत से डरे हुये लोग खत्म करना चाहते हैं।
प्रधान के इस्तीफे के बाद से सरकार के सुर धीरे धीरे बदले। पहले कहा गया कि ये आंदोलन राजनीति से प्रेरित है। विपक्षी दल खासकर कांग्रेस, आंदोलन की आड़ में अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। वो प्रधानमंत्री की छवि को धूमिल करना चाहती है। लेकिन जैसे ही छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज का सवाल उठा, पैलेट गन के इस्तेमाल की बात सामने आयी और उससे जोड़कर गृहमंत्री का इस्तीफा मांगा गया, वैसे ही सरकार और संघ परिवार की तरफ से हमले तेज और तीखे हो गये क्योंकि वो जानते हैं कि आंदोलन के मुंह खून लग चुका है। उसने एक मंत्री का विकेट गिरा दिया है, अब वो खूंखार हो गया है ऐसे में अगर आंदोलन को बढ़ने दिया गया तो वो सरकार को भी लील जायेगा। लिहाजा सरकार के अस्तित्व और संघ परिवार की साख को बचाने के लिये ये ज़रूरी हो गया कि आंदोलन की साख को खत्म किया जाये। और इस राह में ज्यादा दिन बचाव की मुद्रा में रहने से नुकसान होता, लिहाज़ा आक्रामक रुख अख्तियार किया गया। सरकार व पार्टी के स्तर पर कहा जाने लगा कि पैलेट गन का इस्तेमाल ही नहीं हुआ। अदालत को जांच करने दीजिये। प्रधानमंत्री को गाली देने को बड़े मुद्दे के तौर पर पेश किया गया। पुलिस वालों के परिवार से प्रैस कांफ्रैंस करवाई गई और ये आरोप लगवाया गया कि आंदोलन हिंसक था। वो असामाजिक तत्वों के हाथ में चला गया था। ये बात लिमये भी अपने भाषण में रेखांकित कर रहे हैं। पुलिस पर हमले की तस्वीरों को जारी करवाया गया और चहेते टीवी चैनलों पर ये बहस करवायी गई कि पुलिस वालों पर हमला क्यों किया गया, क्या वो इंसान नहीं हैं। यानी ये बताने का प्रयास हो रहा है कि लाठीचार्ज लाज़िमी हो गया था, क्योंकि छात्र हिंसक हो रहे थे। इस तरह से छात्रों पर बर्बरता के आरोप को खत्म किया जाने लगा। जानबूझकर 20 मार्च को संसद मार्च की कुछ चुनिंदा तस्वीरों और विडियो को सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर जारी किया गया जिससे ये नैरेटिव बने कि अगर लाठीचार्ज नहीं किया गया होता तो छात्र संसद में घुस गये होते और ये बताया जाने लगा कि ये सब लेफ्ट के इशारे पर हो रहा था। उनकी मंशा दरअसल देश में अराजकता फैलाने की थी, भारत को श्रीलंका और बांग्लादेश बनाने की थी और इसकी इजाज़त कैसे दी जा सकता थी। ये सब एक बड़ी साजिश का हिस्सा था। दरअसल ऐसा है नहीं। अगर ऐसा होता तो फिर सरकार को तीन सवालों के जवाब देने चाहियें।
एक, अगर वाकई में आंदोलन देश विरोधी और किसी बड़ी साजिश का हिस्सा था, तो फिर सरकार ने क्यों कॉकरोचों के सामने सरेंडर किया? क्यों अपने मंत्री को हटाया? क्या मोदी सरकार देश विरोधी, राष्ट्र विरोधी ताकतों के सामने झुक गई? यानी मोदी सरकार कमज़ोर सरकार है।
दो, अगर वाकई में कॉकरोच आंदोलन अराजकतावादियों के हाथ में चला गया था तो गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में इस बाबत बयान क्यों नहीं दिया? अमित शाह को संसद के माध्यम से देश को बताना चाहिये कि देश के खिलाफ कौन लोग साजिश कर रहे थे, किस विदेशी ताकत के इशारे पर इतनी बड़ी साजिश रची गई?
तीन, सरकार के तर्क में अगर सच्चाई होती तो अब तक बड़े पैमाने पर असामाजिक तत्वों, अराजकतावादियों, आंदोलन में शामिल अपराधियों, देशद्रोहियों को गिरफ्तार किया गया होता। धरपकड़ चल रही होती। लेकिन ऐसा तो कुछ हो नहीं रहा है। क्यों? फिर, दिल्ली पुलिस के रहते ये लोग आंदोलन में क्यों और कैसे शामिल हो गये? पूरे आंदोलन के दौरान पुलिस ने ऐसे एक भी शख्स की गिरफ्तारी नहीं की है और न ही आंदोलन खत्म होने के एक सप्ताह के बाद भी यानी सारे आरोप झूठे हैं। साफ है सरकार को लग गया है कि उसके अपने वैचारिक समर्थन वर्ग में भी कॉकरोच घुस गये हैं। ये सरकार के लिये किसी भी राजनीतिक दल से कहीं ज्यादा खतरनाक बात है। इस पर अगर लगाम नहीं लगी तो फिर प्रधानमंत्री मोदी व अमित शाह को नुकसान तो होगा ही, जो काफी हो चुका है, आरएसएस भी नहीं बच पायेगा और विचारधारा पर ग्रहण लग जायेगा। लिमये इस बात को समझ कर बोल रहे हैं। काश वो समझते कि ऐसे मामलों में ज़िद और अहंकार काम नहीं करते, नकारात्मक प्रचार कारगर नहीं होते, बच्चों से खुल कर बातचीत अधिक प्रभावी होती। प्रायश्चित करते तो बेहतर होता।



