बच्चें के चरित्र निर्माण के लिए अभिभावक व शिक्षण संस्थान उत्तरदायी

पूरे देश में, देश की संसद में, राजनीतिक दलों में एक ही चर्चा है—नीट परीक्षा का पेपर लीक क्यों हुआ? इसके लिए संसद में सख्त कानून भी पास हो गया, परन्तु जो चर्चा नहीं हो सकी, वह यह थी कि स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक हो रही नकल, और कि इसे कैसे रोका जाए। नकल संभवत: अधिकतर माता-पिता की जानकारी में और बहुत-से शिक्षण संस्थानों में अध्यापकों की सहमति से चलती है। क्या कोई विश्वास करेगा कि एक बार जो टीम परीक्षाओं में फ्लाइंग स्क्वाड बन कर आती है, उसने ही केंद्र के अधीक्षक को एक छोटी सी पर्ची दी, जिस पर उन बच्चों नाम और रोल नम्बर लिखे थे जिनकी मदद करनी है। यह तो अच्छा हुआ कि परीक्षा अधीक्षक की रीढ़ की हड्डी मज़बूत थी और उसने स्पष्ट इन्कार कर दिया कि नकल नहीं करवाई जाएगी। दुर्भाग्य यह है कि जिनका काम नकल कराने वालों पर नकेल कसना है, वही नकल को बढ़ावा देते हैं।
मैंने कालेज प्राध्यापक रहते हुए वर्षों तक परीक्षा करवाई—सुपरवाइजर के नाते भी और सेंटर सुपरिंटेंडेंट के नाते भी। मेरा कटु अनुभव है कि जब यह निर्देश हो कि अमुक विभाग के विद्यार्थियों को नकल करने से न रोका जाए, उनके लिए अलग कमरा और विरोध करने पर अलग सुपरवाइजर तैनात कर दिया जाए तो आप क्या करेंगे। एक अत्यंत दुखद प्रसंग अभी 2026 में मेरी जानकारी में आया। एक महिला मुझे मिली। मेरे साथ वह ड्यूटी करना चाहती थी। जब उसकी शिक्षा दीक्षा का पूछा तो उसने ग्रेजुएट होने की बात कही। आप भी चौंक जाएंगे, जब यह पूछा गया कि बीए किन विषयों के साथ पास की है तो उत्तर मिला, नहीं जानती। बस हमें तो कापी देकर लिखा देते थे। उसे यह भी नहीं पता था कि इतिहास या राजनीति शास्त्र। यह सच्ची घटनाएं हैं, आप बीती हैं, जग बीती नहीं।
सरकारें अगर सच बोलें तो अधिकतर शिक्षा अधिकारी यह जानते हैं कि किस किस स्कूल में योजनाबद्ध ढंग से दाखिला और नकल के साथ ही परीक्षा में उत्तीर्ण या अच्छे अंकों में उत्तीर्ण करवाने की गारंटी दी जाती है। यहां कुछ घटनाओं का वर्णन करके पूरे देश के बुद्धिजीवियों को, शिक्षा शास्त्रियों को, मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री का पद संभाल रहे महानुभावों को मेरा यह कहना है कि ज़रा यह विचार करें कि बच्चे नकल क्यों करते हैं। नकल क्यों करवाई जाती है। मैं यह मानती हूं कि जिनको नकल करवा कर परीक्षा उत्तीर्ण करवाई जाती है, उनको हम जीवन भर के लिए अपंग कर देते हैं। बैसाखियों पर चलने के लिए तैयार करते हैं। आखिर प्रथम श्रेणी से ही और अब तो प्रथम से भी दो वर्ष पहले कुछ भी नाम दे दो—एलकेजी, यूकेजी। वहीं से दाखिले के लिए डोनेशन अर्थात जब्री दान लेने-देने का क्रम शुरू हो जाता है। बड़े-बड़े स्कूलों में मोटी रकम देकर दाखिला मिलता है और ऐसे भी शहरों में स्कूल हैं, जहां हर वर्ष बच्चे की पढ़ाई पर लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। अब जब शैक्षिक जीवन का प्रारंभ ही रिश्वत के नाम पर दान के साथ होता है तो बच्चे जो धीरे-धीरे बड़े होंगे, वे समझ जाएंगे कि रुपया ही सबका भइया है और किसी भी स्कूल कालेज में चरित्र निर्माण के लिए कोई विशेष तो क्या, साधारण ध्यान भी नहीं दिया जाता। हम बड़े प्रसन्न हो सकते हैं कि हमारे बच्चे विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करके देश विदेश में छा गए हैं, परन्तु क्या कोई संस्था गर्वपूर्ण विश्वास के साथ यह कह सकती है कि जो बच्चे उनके शिक्षण संस्थान से शिक्षित होकर गए, वे ज़िंदगी में कभी रिश्वत नहीं लेंगे। अपना कर्त्तव्य पूरी तरह निभाएंगे। व्यापार करेंगे तो सभी व्यापारिक कसौटियों पर ईमानदारी से पूरा उतरेंगे। क्या वे नशों से दूर रहेंगे और कभी भी देश या विदेश में रहते हुए अपने राष्ट्र के प्रति अपशब्द बोलना तो दूर, किसी का बोला हुआ अपशब्द सहन भी नहीं करेंगे?
स्वतंत्रता के पश्चात और स्वतंत्रता से पहले जो स्कूल बच्चों को आज़ादी का पाठ पढ़ाने के लिए, लड़कियों को शिक्षा देने के लिए प्रारंभ किए गए थे, उनमें आधुनिक विषय तो नहीं थे, लेकिन सबसे ज़रूरी जो था वह नैतिक शिक्षा थी। आज नैतिक शिक्षा का नाम लेते ही कुछ राजनीतिक दलों को साम्प्रदायिकता की बदबू आने लगती है। जिस देश के नेता वंदे मातरम् का भी विरोध करते हैं, जिस गीत के साथ हमारे बंग भंग आन्दोलन ने साम्राज्यवादियों पर विजय पाई और जिस वंदे मातरम् को गाते हुए हमारे देश के असंख्य युवक-युवतियां शहीद हो गए, फांसी के फंदे पर चढ़ गए, उस वंदे मातरम् से ही विरोध रखने वाले नेता देश की नई पीढ़ी का क्या चरित्र बना सकेंगे? उनके सामने क्या आदर्श रख सकेंगे? जिनको अच्छे संस्कार मिलते हैं, अच्छी शिक्षा मिलती है, वे आगे चल कर उन्नति करते हैं। अच्छी शिक्षा का अर्थ नई दुनिया के नए विषयों के साथ प्रगति तो है ही, अपनी जड़ों से जुड़े रहना भी होता है।

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