आरक्षण, वंशवाद और समानता का सवाल
देश में आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर उफान पर है। कहीं इसे सामाजिक न्याय का आधार बताया जा रहा है, तो कहीं इसे व्यवस्था में जड़ पकड़ चुकी वंशवादी और जातिवादी संरचना का जवाब। सच यह है कि यह बहस केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब शिक्षा, स्वास्थ्य, मीडिया, न्यायपालिका, प्रशासन, राजनीति, खेल, फिल्म और यहां तक कि धार्मिक-प्रशासनिक ढांचों तक फैल चुकी है। सवाल यह नहीं है कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं, असली सवाल यह है कि क्या देश के हर क्षेत्र में अवसर, योग्यता और हिस्सेदारी का सन्तुलन सचमुच है?
आलोचकों का कहना है कि यदि समाज के कुछ वर्गों को उनके ऐतिहासिक और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण आरक्षण दिया गया तो फिर उसी न्याय के सिद्धांत पर यह पूछा जाना चाहिए कि क्या निजी और सार्वजनिक जीवन के उन तमाम क्षेत्रों में भी समान अवसर मौजूद हैं, जहां वर्षों से एक ही तरह की पारिवारिक, जातीय और सामाजिक पकड़ बनी हुई है। मन्दिरों के प्रबन्धन से लेकर अदालतों की ऊंची पीठ तक, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से लेकर बड़े मीडिया घरानों और फिल्म उद्योग तक, वंशवाद की जड़ें कमज़ोर नहीं पड़ीं। अनेक पद ऐसे हैं, जहां योग्यता से अधिक नेटवर्क, पहचान और विरासत काम करती है। यही कारण है कि आरक्षण विरोध की आवाज़ अब केवल नाराज़गी नहीं, बल्कि एक बड़े असन्तोष का रूप लेने लगी है। यह असन्तोष इस प्रश्न पर केन्द्रित है कि यदि देश में ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का सिद्धांत वास्तविक लोकतंत्र का आधार है तो वह सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित क्यों रहे? यदि 10 प्रतिशत के लिए आर्थिक रूप से तय आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) जैसी व्यवस्था सम्भव है, यदि कई क्षेत्रों में परोक्ष या अपरोक्ष वंशवादी कोटा चलता है, तो फिर बाकी वंचित समाज के लिए भी पारदर्शी और समान अवसर क्यों नहीं?
लेकिन इस बहस को केवल प्रतिरोध की भाषा में नहीं, समाधान की भाषा में भी आगे बढ़ाना होगा। आरक्षण का मूल उद्देश्य सदियों से वंचित समुदायों को मुख्यधारा में लाना था। यह केवल आर्थिक गरीबी का नहीं, सामाजिक अपमान, छुआछूत, बहिष्कार और संरचनात्मक भेदभाव का प्रश्न भी रहा है। इसलिए आरक्षण को एक झटके में समाप्त करने की मांग, बिना सामाजिक समानता की ठोस नींव रखे, नये तनाव और नयी अन्यायपूर्ण स्थितियां पैदा कर सकती है। एक ओर वंशवाद और कृत्रिम विशेषाधिकारों पर चोट होनी चाहिए, दूसरी ओर सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक आवश्यकता को भी नहीं भुलाया जाना चाहिए। वास्तविक सुधार वहीं से शुरू होगा जहां शिक्षा की असमानता टूटेगी। आज अमीर और गरीब के बच्चों के लिए शिक्षा के मैदान बराबर नहीं हैं। एक ओर महंगे स्कूल, इंग्लिश मीडियम, निजी कोचिंग और संसाधनों की भरमार है। दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, पुरानी किताबें और असमान व्यवस्था। जब प्रारम्भिक शिक्षा ही असमान होगी, तब प्रतियोगिता कभी निष्पक्ष नहीं हो सकती। इसलिए ‘एक देश- एक किताब’ जैसी अवधारणा पर गम्भीर चर्चा होनी चाहिए। पाठ्यक्त्रम में समानता, शिक्षक की न्यूनतम विषयगत योग्यता और स्कूलों में समान शैक्षिक मानक अनिवार्य किए जाने चाहिए।
इसी तरह शिक्षकों की नियुक्ति भी केवल औपचारिकता न रहे। हिन्दी, अंग्रेज़ी, विज्ञान और अन्य विषयों के शिक्षक के लिए विषय-विशेष योग्यता अनिवार्य हो। एक ही शिक्षक से कई विषय पढ़वाना, विशेषकर छोटे स्कूलों में, बच्चों के भविष्य से समझौता है। यदि देश को प्रतिस्पर्धी, आत्मनिर्भर और ज्ञान-सम्पन्न बनाना है, तो प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक गुणवत्ता पर समान रूप से ध्यान देना होगा। कोचिंग उद्योग का वर्चस्व तभी टूटेगा, जब स्कूल स्वयं मज़बूत होंगे। एक और बड़ा मुद्दा है जन-प्रतिनिधियों और प्रशासकों की योग्यता। जब प्रशासनिक अधिकारियों के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) जैसी कठिन परीक्षा, प्रशिक्षण और उत्तरदायित्व तय हैं, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि विधायिका और कार्यपालिका के शीर्ष पदों पर बैठे जन-प्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता, संविधान की समझ, प्रशासनिक विवेक और पारदर्शी आचरण की कसौटी क्यों न हो। यह लोकतंत्र के खिलाफ नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मज़बूत करने वाली मांग है। जो लोग जनता के टैक्स से वेतन, भत्ते और पेंशन लेते हैं, उनसे बुनियादी योग्यता की अपेक्षा करना कोई असंवैधानिक विचार नहीं है।
साथ ही, आरक्षण और अवसरों के दुरुपयोग पर भी कड़ी निगरानी होनी चाहिए। जाति प्रमाण्-पत्रों, लाभार्थी सूची, नियुक्तियों और चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी रोकना सरकार की ज़िम्मेदारी है। अगर गलत तरीके से कोई लाभ उठा रहा है, तो उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। व्यवस्था की साख तभी बचेगी जब लाभ का हकदार वही होगा, जिसके लिए वह योजना बनी है। अन्तत: इस बहस को जाति-घृणा या वर्ग-विद्वेष में नहीं बदलना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए—एक ऐसा भारत, जहां जन्म के आधार पर न तो विशेषाधिकार मिले और न ही वंचना। न वंशवाद चले, न सिफारिश का बोलबाला हो, न ही हक अधिकारों से वंचित किया जाए। अगर देश को सचमुच ‘श्रेष्ठ भारत’ बनाना है, तो पहले शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, और राजनीति, हर जगह बराबरी की कसौटी लागू करनी होगी। जब अवसर समान होंगे, तब आरक्षण पर होने वाली बहस भी अधिक ईमानदार और अधिक सार्थक होगी। (एजेंसी)



