रिश्तों की नहीं, आत्माओं की सबसे सुंदर डोर है मित्रता

भारत सहित कई देशों में 2 अगस्त को मनाया जा रहा ‘मित्रता दिवस’ केवल फ्रैंडशिप बैंड, शुभकामना संदेशों या उपहारों का उत्सव नहीं है बल्कि यह उस अमूल्य मानवीय संबंध का पर्व है, जो रक्त संबंधों से नहीं बल्कि विश्वास, निस्वार्थ समर्पण, आत्मीयता, संवेदना और अटूट भरोसे से निर्मित होता है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और उसके जीवन की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक सच्चा मित्र होता है। परिवार हमें जन्म से मिलता है किंतु मित्र वह संबंध है, जिसे हम स्वयं चुनते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति ने मित्रता को सदैव जीवन का अमूल्य धन, धर्म और मानवता का आधार माना है। 
आज जब तकनीक ने दुनिया को पहले से अधिक जोड़ दिया है लेकिन भावनात्मक दूरियां भी बढ़ा दी हैं, तब मित्रता दिवस हमें स्मरण कराता है कि जीवन की वास्तविक संपत्ति वे लोग हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के हमारे सुख-दु:ख में साथ खड़े रहते हैं।
मित्रता दिवस को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती है क्योंकि इसे दो अलग-अलग तिथियों पर मनाया जाता है। 30 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित ‘अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस’ मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य विश्व में शांति, सद्भाव, सहिष्णुता और विभिन्न देशों एवं संस्कृतियों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को प्रोत्साहित करना है। इसकी प्रेरणा 1958 में पैराग्वे के चिकित्सक डा. रामोन आर्टेमियो ब्राचो द्वारा आरंभ किए गए वैश्विक मित्रता आंदोलन से मिली थी। बाद में वर्ष 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे आधिकारिक मान्यता प्रदान की। इसके विपरीत, अगस्त के पहले रविवार को मनाया जाने वाला ‘मित्रता दिवस’ सामाजिक परंपरा के रूप में विकसित हुआ, जिसकी शुरुआत 20वीं शताब्दी में अमरीका में ग्रीटिंग कार्ड उद्योग और सामाजिक अभियानों के माध्यम से हुई। समय के साथ यह परम्परा भारत, नेपाल, बांग्लादेश, मलेशिया सहित अनेक देशों में लोकप्रिय हो गई। आज के समय में इस दिवस का वास्तविक उद्देश्य बाहरी औपचारिकताओं से कहीं अधिक गहरा है, यह विश्वास, अपनत्व और आत्मीय संबंधों का उत्सव है।
भारतीय संस्कृति में मित्रता केवल सामाजिक व्यवहार नहीं, आध्यात्मिक और नैतिक मूल्य है। हमारे धर्मग्रंथों, महाकाव्यों और लोक परंपराओं में मित्र को ऐसा शुभचिंतक माना गया है, जो कठिन समय में साथ छोड़े बिना सत्य का मार्ग दिखाए। संस्कृत में कहा गया है ‘आपद्गतम् न जहाति मित्रम्।’ अर्थात् जो विपत्ति में साथ न छोड़े, वही सच्चा मित्र है। यह केवल एक सूक्ति नहीं, भारतीय जीवन-दर्शन का सार है। यहां मित्रता अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। अपेक्षा नहीं, समर्पण है। स्वार्थ नहीं, निस्वार्थ सहयोग है। भारतीय इतिहास और पौराणिक परंपरा में मित्रता के अनेक आदर्श उदाहरण मिलते हैं किंतु श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता सर्वाधिक प्रेरणादायी मानी जाती है। दोनों ने गुरुकुल में साथ शिक्षा प्राप्त की किंतु जीवन की परिस्थितियां उन्हें अलग-अलग दिशाओं में ले गई। श्रीकृष्ण द्वारका के सम्राट बने जबकि सुदामा अत्यंत निर्धन ब्राह्मण के रूप में जीवन व्यतीत करने लगे। वर्षों बाद जब निर्धनता से विवश होकर सुदामा अपने बालसखा से मिलने द्वारका पहुंचे, तब श्रीकृष्ण ने राजसी वैभव और साम्राज्य की मर्यादाओं से ऊपर उठकर जिस आत्मीयता से उनका स्वागत किया, वह मित्रता की सर्वोच्च मिसाल बन गया।
कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं सुदामा के चरण धोए, उन्हें सिंहासन पर बैठाया और उनके द्वारा लाए गए साधारण चिवड़े को प्रेमपूर्वक ग्रहण किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सुदामा ने अपनी गरीबी का उल्लेख तक नहीं किया और श्रीकृष्ण ने बिना कुछ कहे ही उनके जीवन की सभी कठिनाईयों को दूर कर दिया। यह प्रसंग हमें सीख देता है कि सच्ची मित्रता में न धन का महत्व होता है, न पद का और न सामाजिक प्रतिष्ठा का। वहां केवल प्रेम, सम्मान व आत्मीयता का स्थान होता है। इसी प्रकार महाभारत में श्रीकृष्ण और अर्जुन की मित्रता केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं बल्कि जीवन-दर्शन का आदर्श है। कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में जब अर्जुन मोह और संशय से ग्रस्त हो जाते हैं, तब श्रीकृष्ण मित्र के रूप में उन्हें केवल सांत्वना नहीं देते बल्कि भगवद्गीता का अमर ज्ञान देकर कर्तव्य, धर्म और जीवन के उद्देश्य का बोध कराते हैं। इससे स्पष्ट है कि सच्चा मित्र वह नहीं, जो केवल हमारी बातों से सहमत हो बल्कि वह है, जो आवश्यकता पड़ने पर सही दिशा दिखाने का साहस भी रखता हो।
रामायण में भगवान श्रीराम और निषादराज गुह की मित्रता सामाजिक समरसता और समानता का उत्कृष्ट उदाहरण है। एक ओर अयोध्या के राजकुमार श्रीराम हैं और दूसरी ओर वनवासी निषादराज, किंतु दोनों के संबंधों में न जाति का भेद है, न सामाजिक स्थिति का अंतर। इसी प्रकार श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता विश्वास, सहयोग और साझा उद्देश्य की शक्ति को प्रदर्शित करती है। ये उदाहरण बताते हैं कि भारतीय संस्कृति में मित्रता किसी वर्ग, जाति, संपत्ति या पद की मोहताज नहीं रही। भारतीय लोकजीवन में भी मित्रता को परिवार के समान सम्मान मिला है। 
मित्रता दिवस का महत्व केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं है, यह समाज में सहिष्णुता, समानता, सहयोग और मानवीय मूल्यों को भी सुदृढ़ बनाता है। विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और देशों के लोग जब मित्रता के सूत्र में बंधते हैं, तब पूर्वाग्रह और भेदभाव स्वत: कम होने लगते हैं। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र ने मित्रता को वैश्विक शांति की आधारशिला माना है। आज प्रतिस्पर्धा, व्यस्तता और डिजिटल जीवनशैली के कारण मानवीय रिश्तों में दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में मित्रता दिवस याद दिलाता है कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल धनए पद या प्रसिद्धि नहीं, वे संबंध हैं, जो कठिन समय में भी अडिग रहते हैं। सच्चा मित्र वही है, जो आपकी सफलता में सबसे अधिक प्रसन्न हो, आपकी असफलता में आपका मनोबल बढ़ाए, आपकी गलतियों पर आपको सही सलाह दे और संघर्ष के समय सबसे पहले आपके साथ खड़ा दिखाई दे। मित्रता मानव जीवन को केवल सुखद नहीं बनाती, उसे नैतिक, संवेदनशील और मानवीय भी बनाती है। यदि हम अपने जीवन में श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी निस्वार्थ मित्रता, श्रीकृष्ण और अर्जुन जैसी मार्गदर्शक मित्रता तथा श्रीराम और निषादराज जैसी समानता पर आधारित मित्रता का आदर्श अपनाएं तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन अधिक समृद्ध होगा बल्कि समाज भी अधिक संवेदनशील और सौहार्दपूर्ण बनेगा। यही मित्रता दिवस का वास्तविक संदेश है और यही भारतीय संस्कृति की वह शाश्वत सीख है, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्ग आलोकित करती रहेगी।

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