आस्था का अनूठा केन्द्र है कोलकाता का दक्षिणेश्वर काली मंदिर
यूं तो पूरा भारत ही श्रद्धा और आस्था का मुख्य केन्द्र रहा है मगर पश्चिम बंगाल का दक्षिणेश्वर काली मंदिर अपने आप में आस्था का एक अनूठा केंद्र है। मां काली के दर्शन मात्र से ही यहां चित्त को असीम शांति मिलती है। पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में हुगली नदी के तट पर स्थित मां काली का दक्षिणेश्वर मंदिर अपने आप में एक अद्भुत स्थल है जहां श्रद्धा और आस्था की गंगा दिन-रात बहती है और इसी गंगा में डुबकियां लगाने पहुंचते हैं विश्व भर से श्रद्धालु। कहा जाता है कि यह रामकृष्ण परमहंस की तपोभूमि है। इसी मंदिर में विराजमान मां काली ने उन्हें रामकृष्ण परमहंस बना दिया। काली की साधना के बल पर वे भक्ति के चरमोत्कर्ष तक पहुंचे और विश्व भर में उनकी पहचान बनी।
नरेन्द्र को भी स्वामी विवेकानंद बनाने का श्रेय भी इसी माता को जाता है। यहां आकर नरेन्द्र ने मां काली के दर्शन किये और उनकी भक्ति में ऐसे रमे कि स्वामी विवेकानंद बन गए एवं पूरे विश्व में प्रसिद्ध हुए। दक्षिणेश्वर मंदिर की ही शक्ति है कि उन्होंने अमरीका जाकर भारतीय संस्कृति का परचम लहरा दिया। उनके आख्यान को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।
कैसे हुआ मंदिर का निर्माण : बात 1847 की है जब भारत में अंग्रेजों की हुकूमत थी। उसी समय पश्चिम बंगाल की एक अमीर विधवा रासमणि ने हुगली नदी के तट पर मां काली के इस मंदिर का निर्माण कराया। दरअसल पहले पश्चिम बंगाल से लोग तीर्थयात्रा के लिए वाराणसी जाया करते थे। रासमणि उस समय अपनी उम्र के चौथे प्रहर पर थीं, इसलिए उनके मन में भी तीर्थ यात्रा की इच्छा हुई तो उन्होंने वाराणसी से तीर्थ यात्रा प्रारम्भ करने का निश्चय किया। उस समय अमीर लोग नाव से कोलकाता से वाराणसी जाते थे क्योंकि कोलकाता व वाराणसी के बीच रेल सेवा शुरू नहीं हुई थी। रासमणि ने भी नाव से जाने का फैसला किया। बताया जाता है कि रासमणि के साथ पूरा काफिला तीर्थयात्रा के लिए निकलने को तैयार था लेकिन यात्रा से पहले एक ऐसा वाकया हुआ कि रासमणि को अपनी तीर्थयात्रा छोड़नी पड़ी।
कहा जाता है कि तीर्थयात्रा पर जाने से पहले रात को जब रासमणि अपने शयन-कक्ष में सो रहीं थीं तो उनके स्वप्न में मां काली प्रकट हुईं और कहा कि वाराणसी जाने की कोई आवश्यकता नहीं। आप कोलकाता में ही गंगा नदी के किनारे मेरी प्रतिमा स्थापित कीजिए और मंदिर बनवाइए। इस मंदिर में मैं स्वयं विराजमान रहूंगी और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करुंगी। सुबह उठकर रासमणि ने वाराणसी जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया और गंगा के किनारे मां काली की मूर्ति स्थापित करने के लिए जगह की तलाश शुरू कर दी। जल्दी ही जगह खरीद ली गई और मां काली की भव्य मूर्ति स्थापित की गई। 25 एकड़ जमीन पर मंदिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ और आठ वर्षों में मंदिर बनकर तैयार हो गया।
जान बाजार की महारानी रासमणि स्वयं भी माता की अनन्य भक्त थीं। मंदिर जब बनकर तैयार हुआ तो इसकी छटा देखते ही बन रही थी। सन् 1855 में ही मंदिर बना। मंदिर बनने के बाद पुजारी की तलाश शुरू हुई लेकिन कोई भी पुजारी इस मंदिर में पूजा करवाने को तैयार नहीं हुए क्योंकि उनका मानना था रासमणि उच्च कुल से नहीं थीं। निम्न कुल से होने कारण कोई भी पुजारी पूजा-पाठ करवाने को तैयार नहीं हुए। चूंकि बंगाल में उस समय जाति-पाति की प्रथा पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। बड़ी विकट परिस्थिति थी। आखिरकार रामकृष्ण नामक एक पुजारी ने अपनी स्वीकृति दे दी और पूजा पाठ करवाने लगे। रूढ़िवादी स्वभाव के लोगों ने इस पर आवाज भी उठाई मगर रामकृष्ण ने मंदिर नहीं छोड़ा। देखते ही देखते मंदिर की प्रसिद्धि देश-विदेशों में फैलती गई और पूजा-रचना हेतु श्रद्धालु यहां पहुंचने लगे। यहीं रहकर रामकृष्ण ने सिद्धि प्राप्त की और रामकृष्ण परमहंस बने।
मंदिर की विशेषता : मां काली के इस मंदिर की बहुत सारी विशेषताएं हैं। बंगाल में हुगली नदी के नाम से जानी जाने वाली गंगा नदी की कलकल बहती धाराओं के किनारे स्थित इस मंदिर की छटा देखते ही बनती है। इस मंदिर में चांदी से बनाये गए हजार पंखुड़ियों वाले कमल के फूल पर मां काली शस्त्रों के साथ भगवान् शिव के ऊपर खड़ी हैं। 46 फुट चौड़ा और 100 फुट ऊंची इस प्रतिमा के दर्शन मात्रा से ही चित्त को शांति मिलती है। काली मां का यह मंदिर नवरत्न की तरह निर्मित है।
इस मंदिर में कुल बारह गुम्बद हैं तथा विशाल मंदिर परिसर में भगवान शिव के भी बारह मंदिर बनवाए गए हैं। मंदिर के चारों ओर बने शिव मंदिर की छटा भी निराली है। मां काली के दर्शन के बाद श्रद्धालु शिव की भी पूजा करते हैं। मां काली का मंदिर विशाल इमारत के रूप में एक चबूतरे पर स्थित है। इस मंदिर में सीढ़ियों के माध्यम से प्रवेश किया जाता है। दक्षिण दिशा में बना यह मंदिर तीन मंजिला है। ऊपर के दो मंजिलों पर 9 गुम्बद सामान रूप से फैले हुए हैं। गुम्बद की छत पर सुन्दर आकृतियां बनी हैं। मंदिर के आसपास भक्तगण बैठे रहते हैं।
दक्षिणेश्वर मंदिर के समीप ही रामकृष्ण परमहंस का कमरा भी है। इस कमरे में उनका पलंग एवं दूसरे सामान सुरक्षित रखे हुए हैं। काली मंदिर के बाहर रामकृष्ण परमहंस की धर्मपत्नी शारदा देवी तथा रासमणि का समाधि स्थल भी है। साथ ही वह वट-वृक्ष भी खड़ा है। जिसके नीचे बैठकर रामकृष्ण परमहंस ने सिद्धि प्राप्त की थी। काली मंदिर के ठीक सामने नट-मंदिर भी है। उत्तर दिशा में रामकृष्ण परमहंस का दालान है। चांदनी स्नान घाट के चारों ओर शिव के मंदिर हैं। यह मंदिर पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, लिहाजा सालों भर पर्यटकों और श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
कैसे पहुंचें : वायुमार्ग, रेलमार्ग एवं सड़कमार्ग से कोलकाता पहुंचा जा सकता है। कोलकाता में मुख्य रूप से दो रेलवे स्टेशन हैं-सियालदह एवं हावड़ा। दोनों स्टेशन देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़े हुए हैं। वायु सेवा के माध्यम से भी कोलकाता सभी शहरों से जुड़ा हुआ है। सड़क मार्ग से भी कोलकाता आसानी से पहुंच जा सकता है। कोलकाता में हर जगह से मेट्रो रेल, बस, ट्राम, साइकिल रिक्शा आदि उपलब्ध हैं। इन माध्यमों से आसानी से दक्षिणेश्वर काली मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। (उर्वशी)




