कांग्रेस को महंगा पड़ेगा आंतरिक टकराव

पंजाब में अक्सर कांग्रेस का बोलबाला रहा है। 1947 से लेकर अब तक इसने प्रदेश में 13 बार शासन किया है। इस समय के दौरान इस पार्टी के एक दर्जन से भी अधिक मुख्यमंत्री बने हैं। इनमें प्रताप सिंह कैरों जैसे प्रभावशाली मुख्यमंत्री भी शामिल रहे हैं, जिनके कार्यों को अक्सर आज भी याद किया जाता है। ज्ञानी ज़ैल सिंह ने प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर देश के राष्ट्रपति बनने तक का स़फर किया है। बेअंत सिंह ने प्रदेश के बेहद चुनौतियों भरे समय में कमान सम्भाली और हालात का दृढ़ता के साथ सामना किया। देश की आज़ादी से पहले फुलकियां रियासतों में पटियाला का अधिक उभार था। इसी वंश के महाराजा अमरेन्द्र सिंह ने भी दो बार प्रदेश की कमान सम्भाली। इस समय में बनी सरकारों को अनेक चुनौतियों से गुज़रना पड़ा, परन्तु इसके बावजूद आज तक भी इस राष्ट्रीय पार्टी का प्रभाव प्रदेश में बना रहा है। नि:संदेह पार्टी के भीतर नेताओं के अनेक बार मतभेद भी उभरते रहे, जिनसे इस पार्टी का प्रभाव कम होता भी दिखाई दिया।
कैप्टन अमरेन्द्र सिंह वर्ष 2017 से 2021 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे परन्तु शासनकाल के अंतिम महीनों में नेताओं में ऐसी आंतरिक खींचतान शुरू हुई, जो पार्टी की आंतरिक लड़ाई में बदल गई। इसका नुकसान पार्टी को भुगतना पड़ा और वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी की सरकार को इस प्रकार भारी समर्थन मिला, जिसकी उस समय शायद इस पार्टी को भी उम्मीद नहीं थी। अब जब प्रदेश में कुछ महीनों के उपरांत चुनाव होने जा रहे हैं, एक तरह से चुनाव का बिगुल बज चुका है, तो सभी पार्टियों ने चुनाव मैदान में उतरने के लिए अपनी-अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। उन्होंने इसके लिए अपने राजनीतिक नश्तर भी तीखे कर लिए हैं, परन्तु इस समय प्रदेश कांग्रेस में जो आंतरिक विवाद पैदा हुआ है, उसने वर्ष 2021 में पार्टी और सरकार में दोफाड़ की याद ताज़ा करवा दी है। चाहे कांग्रेसी नेता अभी तक भी लगातार यह बयान देते आ रहे हैं कि पार्टी में सब कुछ ठीक है, परन्तु घटनाक्रम इन बयानों के अनुकूल दिखाई नहीं देता। अमरिन्द्र सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश का अध्यक्ष बनाए रखने के हाईकमान के फैसले संबंधी पार्टी के भीतर विरोध के स्वर ऊंचे स्वर में उठने शुरू हो गए हैं। चरनजीत सिंह चन्नी और सुखजिन्दर सिंह रंधावा सहित अन्य कई वरिष्ठ नेता हाईकमान के इस फैसले के विरोध में खड़े दिखाई देते हैं। आपसी एक स्वर बनाने के लिए दिल्ली में भी लगातार यत्न होते रहे परन्तु अभी तक इनका परिणाम सकारात्मक प्रतीत नहीं होता। एक बार फिर हाईकमान के निर्देश पर पंजाब मामलों के प्रमुख भूपेश बघेल को पंजाब भेजा गया है, जिन्होंने पार्टी को बूथ स्तर तक मज़बूत करने के लिए योजना बनाई है और अलग-अलग ज़िलों में इस संबंध में लामबंदी करने का अभियान भी चलाया है।
फतेहगढ़ साहिब से यह अभियान शुरू किया गया है। दूसरा पार्टी समारोह खरड़ में किया गया और तीसरा पटियाला में हुआ है, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष, ज़िला ब्लाक मंडल और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं की भागीदारी को सुनिश्चित बनाया गया था, परन्तु इन कार्यक्रमों में पूर्व मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी के अतिरिक्त पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुखजिन्दर सिंह रंधावा और अन्य वरिष्ठ नेता और कई विधायक भाग लेते दिखाई नहीं दिए। पटियाला में तो कांग्रेस के समारोह में चरनजीत सिंह चन्नी के पक्ष में और राजा वड़िंग के विरुद्ध सार्वजनिक रूप में नारे भी लगाए जाते रहे। इससे यह ज़रूर स्पष्ट होता है कि प्रदेश पार्टी में चल रहा टकराव अभी तक भी खत्म नहीं हुआ और जिस तरह का माहौल बनता जा रहा है, इसके शीघ्र खत्म होने की सम्भावनाएं भी नज़र नहीं आती। नि:संदेह पैदा हुई यह स्थिति पार्टी के लिए भारी नुक्सान वाली सिद्ध हो सकती है, जिसका आगामी समय में पार्टी को एक बार फिर खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।


—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

#कांग्रेस को महंगा पड़ेगा आंतरिक टकराव