क्या सरकार आन्दोलनकारियों की मांगों के प्रति गम्भीर रहेगी ?
छात्रों और युवाओं के आन्दोलन से घबरा कर केन्द्र सरकार ने तत्काल उनकी मांगें तो मान लीं, लेकिन लगता है कि उन मांगों पर पूरी तरह क्रियान्वयन करने का सरकार का इरादा नहीं है। अब कई तरह के किन्तु-परन्तु किए जा रहे हैं और दूसरी ओर कॉकरोच जनता पार्टी के नेता व अन्य छात्र नेता परेशान हैं कि अब क्या करें? असल में आन्दोलनकारियों की अनुभवहीनता का सरकार ने फायदा उठाया। इसलिए कांस्टीट्यूशन क्लब में दूसरी बार की वार्ता से पहले जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया और सरकार ने नीट-यूजी परीक्षा पेपर लीक के बाद जान गंवाने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवज़ा देने और प्रदर्शनकारियों पर किए मुकद्दमे रद्द करने की सहमति दी तो छात्र नेता खुश हो गए और उन्होंने प्रदर्शन खत्म करने का ऐलान कर दिया। उसके बाद 24 घंटे में सरकार ने जंतर-मंतर से इस ऐतिहासिक प्रदर्शन के नामोनिशान मिटा दिए, परन्तु अभी तक न तो मुआवज़ा देने के मामले में कोई पहल हुई है और न छात्रों पर से बिना शर्त मुकद्दमे वापस हुए हैं। इसके विपरीत सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई शर्त के बाद अब सरकार भी आनाकानी कर रही है। अभी 18 साल से कम उम्र के ऐसे प्रदर्शनकारियों की रिहाई हो रही है, जिन पर पहले से कोई मुकद्दमा नहीं है। सवाल है कि 18 साल से ऊपर के उन लोगों का क्या होगा, जिन पर पहले से कोई मुकद्दमा नहीं चल रहा है?
अब ई-20 पार्टी तैयार
सरकार अभी कॉकरोच जनता पार्टी के आन्दोलन से मिले ज़ख्मों को सहला ही रही है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ( ई-20 पेट्रोल) के खिलाफ आन्दोलन की तैयारी शुरू हो गई है। इसके लिए ई-20 पार्टी का गठन हो गया है। इस पार्टी को सोशल मीडिया में पर्याप्त समर्थन भी मिल रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी की तरह तो नहीं लेकिन एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की वजह से माइलेज और इंजन की परेशानी झेल रहे आम लोग इसके खिलाफ आवाज़ उठाने को तैयार हैं। बताया जा रहा है कि अगले महीने ई-20 पार्टी विरोध प्रदर्शन कर सकती है। हालांकि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन ने सरकार को आगाह कर दिया है। इसलिए संभव है कि उनको जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की इजाज़त नहीं मिले। लेकिन ई-20 पार्टी की पूरे देश में आन्दोलन की तैयारी है। आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल भी एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के खिलाफ सर्वाधिक मुखर होकर केन्द्र सरकार पर हमले कर रहे हैं। इस मुद्दे पर आन्दोलन सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है। पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में ऐसे अनेक लोग सामने आ रहे हैं, जो बता रहे हैं कि कैसे उनकी 20 लाख या 50 लाख या डेढ़ करोड़ की गाड़ी ई-20 पेट्रोल की वजह से खराब हो गई। यह आम लोगों से जुड़ा मामला है। इसीलिए सरकार अभी से डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। लोगों को समझाने से लेकर डराने तक के उपाय किए जा रहे हैं।
प्रधान ने जवाबदेही स्वीकार नहीं की
चाहे धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से आखिरकार इस्तीफा दिया, लेकिन उन्होंने इस्तीफा देश के युवाओं और प्रदर्शन कर रहे लोगों पर अहसान करने के अंदाज़ में दिया। उन्होंने किसी बात की जवाबदेही नहीं ली। प्रधानमंत्री को लिखा इस्तीफे का पत्र तो सामान्य फॉर्मेट में था, लेकिन ‘युवा साथियो’ के नाम दो पन्नों की चिट्ठी में उन्होंने बताया कि शिक्षा और युवाओं के मामले में उनका कितना बड़ा योगदान है। प्रधान ने इस्तीफा देने का कारण यह बताया कि छात्रों और युवाओं के आन्दोलन का दुरुपयोग हो सकता है। यानी आशंका है कि प्रदर्शन का बेजा इस्तेमाल कर अराजक गतिविधियों को अंज़ाम दिया जा सकता है। याद करें कि कैसे नवम्बर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस लिया था। उन तीन कानूनों के खिलाफ किसान एक साल से आन्दोलन कर रहे थे और करीब सात सौ लोग उसमें अपनी जान गंवा चुके थे। सरकार ने इसका कोई संज्ञान नहीं लिया था। लेकिन उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब का चुनाव नज़दीक आया तो प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय टीवी पर आकर देश को संबोधित किया और तीनों कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया। उस समय भी उन्होंने नहीं स्वीकार किया कि कानूनों में कोई कमी है। उन्होंने कहा कि तपस्या में कोई कमी रह गई होगी कि किसान समझ नहीं पाए। प्रधानमंत्री ने कहा कि तीनों कानून किसानों की भलाई के लिए थे, लेकिन किसानों को गुमराह किया जा रहा है जिसकी वजह से वे इसका विरोध कर रहे हैं।
क्या है जस्टिस यशवंत वर्मा की स्थिति?
यह लाख टके का सवाल है कि दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजे गए जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है? सवाल यह भी है कि उनके खिलाफ लंबित महाभियोग के मामले की क्या स्थिति है? जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से होली के दिन कथित रूप से जले हुए नोट बरामद होने की घटना को डेढ़ साल हो गया, लेकिन यह पता ही नहीं चल रहा है कि इस मामले में क्या होना है? सुप्रीम कोर्ट ने घटना के तुरंत बाद एक समिति बना कर जांच कराई थी, जिसने कहा था कि नोट उनके घर से बरामद हुए थे। उसके बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों ने उनकी नियुक्ति का विरोध किया। उन्हें बिना कोई काम दिए अदालत में रखा गया। इधर संसद में महाभियोग का प्रस्ताव स्वीकार कर जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट के हिसाब से स्पीकर ने जांच समिति भी बना दी। कुछ दिन पहले जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा भी दे दिया। सवाल है कि क्या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है? एक रिपोर्ट के मुताबिक इलाहाबाद हाईकोर्ट और भारत सरकार के न्याय विभाग के रिकॉर्ड में वे आज भी जज हैं। अगर ऐसा है तो इसका अर्थ है कि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है। इसीलिए सवाल है कि क्या वह महाभियोग के ज़रिए हटाए जाएंगे? यह भी सवाल है कि अगर इस्तीफा स्वीकार हो जाएगा तो क्या महाभियोग की प्रक्रिया समाप्त कर दी जाएगी?
सीपीएम ने ढूंढा हार का कारण
केरल में लगातार 10 साल शासन करने के बाद सीपीएम के नेतृत्व वाला गठबंधन एलडीएफ इस साल मई के चुनाव में हार गया था। उसके बाद से पार्टी में इस बात को लेकर मंथन चल रहा था कि सब कुछ ठीक था तो पार्टी क्यों हार गई? अब हार के कारणों की रिपोर्ट आ गई है। बताया जा रहा है कि सीपीएम ने विधानसभा चुनाव हारने के कारण तलाश लिए हैं। सीपीएम का मानना है कि विजयन के चेहरे पर प्रचार केंद्रित करना चुनाव हारने का एक बड़ा कारण था। इसके अलावा विजयन की नरम हिंदुत्व की नीति भी हार का कारण बनी। गौरतलब है कि केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर हमेशा दो सत्ता केन्द्र रहे हैं। प्रकाश करात एक स्थायी केंद्र थे, जो अब भी हैं। विजयन को उनका करीबी माना जाता है। केन्द्र में सीताराम येचुरी के कमज़ोर होने और फिर उनके निधन के बाद करात खेमा बहुत मज़बूत हुआ। उधर केरल में भी विजयन के मुख्यमंत्री बनने के बाद से करात खेमे की पकड़ सत्ता और संगठन दोनों पर हो गई। इसीलिए प्रचार के केन्द्र में विजयन को रखा गया। यह भी एक तथ्य है कि केरल और पश्चिम बंगाल दोनों जगह सीपीएम हिन्दुओं के वोट मिलते रहे हैं। इसी सोच में विजयन ने केरल में हिन्दू वोटों की ज्यादा आस लगा ली। वह केंद्र की नीतियों का समर्थन करने लगे और एज़ावा नेता नतेशन के साथ घूमने लगे। इससे मुस्लिम और ईसाई दोनों सीपीएम से दूर हुए और दूसरी ओर हिन्दू वोट का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ चला गया।





