न्यायिक प्रक्रिया पर निरन्तर बढ़ता वादों का बोझ
सर्वोच्च न्यायालय ने विगत दिनों अपने एक फैसले के ज़रिये अदालतों पर बढ़ते वादों के बोझ और इस कारण न्याय मिलने में होने वाली देरी को लेकर एक नई बहस की खिड़की खोल दी है। सर्वोच्च अदालत ने इस दौरान इलाहाबाद उच्च अदालत के अन्तर्गत हत्या के एक मामले में आरोपित एक व्यक्ति की दण्ड के विरुद्ध याचिका को निरन्तर चालीस वर्ष तक अनिर्णित लटकाये रखे जाने पर न केवल गहन चिन्ता प्रकट की है, अपितु इसे न्याय मिलने से इन्कार जैसी क्रिया करार दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च अदालत को इस मामले का अगले तीन मास तक निपटारा किये जाने का निर्देश देते हुए कहा कि न्याय मिलने में देरी का मतलब न्याय न मिलना ही होता है। इस एक घटना ने देश भर की अदालतों में लम्बित पड़े लाखों मामलों की पीड़ा की ओर न्यायिक प्रक्रिया का ध्यान एक बार फिर आकृष्ट किया है। सर्वोच्च अदालत ने बड़े स्पष्ट रूप में कहा है कि विभिन्न अदालतों में लम्बित पड़े मामलों के शीघ्रीय समाधान हेतु नव-आचार-व्यवहार की आवश्यकता पहले से बढ़ी है। सर्वोच्च अदालत ने इसे एक असाधारण स्थिति जैसा करार दिया है। सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लम्बित मामलों की संख्या बढ़ने पर भी विशेष रूप से चिन्ता व्यक्त की।
इधर स्वयं इलाहाबाद उच्च न्यायालय का एक ताज़ा-तरीन फैसला जहां न्यायिक प्रक्रिया को लेकर आस का दीपक जलाते प्रतीत होता है, वहीं यह फैसला इस बात का द्योतक भी है कि अदालतों में फैसलों में देरी होने की व्यथा-गाथा सचमुच बेहद लम्बी है। उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में चेतावनी दी है कि भविष्य में यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक अवैध रूप में हिरासत में रखा जाता है, तो उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत मुआविज़ा देना होगा। अदालत ने ऐसे मामलों में तत्काल जमानत पर रिहाई का आदेश भी दिया। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत का यह विचार भी आशा जगाने के लिए काफी है कि अदालतें आम लोगों की तकलीफों से वाकिफ हों, और उनके करीब तक पहुंचने को यकीनी बनाएं।
प्रस्तुत मामला वर्ष 1983 में एक व्यक्ति को अपने भाई की हत्या के अपराध में 1985 में आजीवन कारावास का दण्ड दिये जाने से जुड़ा है। अभियुक्त ने इस सज़ा के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपीलीय याचिका दायर की थी किन्तु निरन्तर 41 वर्ष तक यह याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फाईलों में दबी रही और अभियुक्त जिसकी उम्र फैसला होने के समय 28 वर्ष थी, अपनी अपील का फैसला आने तक 72 वर्ष का बूढ़ा हो चुका है। इस याचिका को उच्च अदालत ने अब जाकर इसी वर्ष 9 फरवरी को खारिज किया जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस आपराधिक याचिका पर तीन महीने के भीतर अन्तिम सुनवाई हेतु इसे सूचिबद्ध किये जाने का निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि वह किसी खास न्यायालय या न्यायाधीश की ओर इंगित नहीं कर रहे अपितु यह व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया में सुधार का एक आवश्यक केन्द्र-बिन्दु है। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने इलाहाबाद उच्च अदालत के रजिस्ट्रार से अदालती दस्तावेज भंडार में 30 वर्ष से अधिक समय से लटकते चले आ रहे वादों की पूरी सूची भी तलब कर ली है। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय से लम्बी अवधि से लम्बित चले आ रहे मामलों में देरी के कारणों की भी सूची मांगी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को नितांत त्रुटि-रहित बनाने हेतु देश भर से वरिष्ठ वकीलों से सुझाव भी मांगे हैं। एक वरिष्ठ वकील का यह सुझाव काबिल-ए-़गौर प्रतीत होता है कि 30 वर्ष पुरानी सभी अभियोजन याचिकाओं को एकबारगी खारिज कर दिया जाए। इससे अदालतों पर लम्बित वादों का बोझ नि:संदेह कम होगा। हम समझते हैं कि अदालतों पर बोझ का जिन्न तो वास्तव में चिरकाल अर्थात दशकों से मंडरा रहा है। आवश्यकता आज इस बात की है कि इस जिन्न को काबू करके बोतल में बन्द किया जाए। तथापि, यह काम विधि पालिका और न्याय पालिका के आपसी और निकट तालमेल और सामंजस्य से ही सम्भव हो सकता है। हम समझते हैं कि यह काम जितनी शीघ्र और जितनी सूझ-बूझ से होगा, उतना ही यह देश और न्यायिक व्यवस्था के लिए अच्छा होगा।



