पंजाब की कृषि पर एक नज़र

धान और बासमती की भरपूर फसल की कटाई, सम्भाल और मंडीकरण में चाहे किसान व्यस्त हैं, लेकिन साथ ही वे गेहूं भी बो रहे हैं। धान खरीफ की और गेहूं रबी की मुख्य फसल है। वे जानते हैं कि उत्पादन बढ़ाने में योग्य किस्मों की मुख्य भूमिका होती है। पूसा बासमती-1509, पूसा बासमती-1121 और पूसा बासमती-1401 के इस वर्ष मिल रहे दाम ने किसानों के चेहरों पर खुशी ला दी है। 
पूसा बासमती-1509 किस्म 4300 से 4500 रुपये, पूसा बासमती-1121 (निर्यात किस्म) 5500 रुपये तक और पूसा बासमती-1401 किस्म 5200 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक रही है। इन किस्मों का उत्पादन 18 से लेकर 27-28 क्विंटल प्रति एकड़ तक आ रहा है। उत्पादन और दाम के दृष्टिगत आगामी वर्ष धान और बासमती की काश्त का रकबा और बढ़ने की संभावना है। इस वर्ष 32.6 लाख हेक्टेयर रकबे में धान और 6.8 लाख हेक्टेयर में बासमती की काश्त हुई है। मंडियों में आवक बढ़ने से सरकार को सरकारी खरीद का लक्ष्य बार-बार बढ़ाना पड़ रहा है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. गुरजीत सिंह बराड़ के अनुसार इस साल धान का उत्पादन 220 लाख टन को पार कर जाएगा और बासमती का भी रिकॉर्ड उत्पादन होगा। 
विभिन्नता के लिए भी बासमती उभर कर ऊपर आ रही है। धान के मुकाबले इसकी पानी की ज़रूरत बहुत कम है। किसानों को धान का दाम एमएसपी पर 2461 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है। मक्का, जिसकी काश्त के लिए सरकार ज़ोर दे रही है, उसकी भी पानी की ज़रूरत धान से कोई ज़्यादा कम नहीं है। इसलिए मक्के की काश्त का रकबा बहुत कम बढ़ा है। कपास-नरमा की काश्त का रकबा तेज़ी से कम हुआ है। 2011-12 में यह 5.15 लाख हेक्टेयर था, जो अब कम होकर 1 लाख हेक्टेयर से भी कम हो गया है।
बासमती के अलावा पंजाब सरकार विभिन्नता के लिए सब्ज़ियों और फलों की काश्त बढ़ाने पर ज़ोर दे रही है। पीएयू में फलों की काश्त के लिए बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया गया है और यहां फलों और सब्ज़ियों के विशेषज्ञ डॉ. हरविंदर सिंह धालीवाल को वाइस चांसलर नियुक्त किया गया है। फलों व सब्ज़ियों के ज़रिये फसली विभिन्नता के अतिरिक्त रोज़गार के स्रोत भी बढ़ते हैं। फल और सब्ज़ियों की काश्त का रकबा बढ़ाने की गुंजाइश है। इसके लिए कोल्ड चेन की सुविधाएं बढ़ाने की ज़रूरत है। किसान प्रोसेसिंग और गुणवत्ता वाली सब्ज़ी पर आधारित उद्योग लगा सकते हैं। पॉली हाउस तकनीक से बेमौसमी सब्ज़ियां उगाकर ज़्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। पौध के ज़रिए सब्ज़ियां लगाकर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। फलों की काश्त का भी रकबा बढ़ाने की ज़रूरत है। आम की बौनी हाइब्रिड किस्में विकसित होने से इससे ज़्यादा मुनाफा लिया जा सकता है। पंजाब में तीन फसली चक्र का रूझान भी बढ़ रहा है जिससे किसानों को ज़्यादा मुनाफा होगा।
अब किसान गेहूं की बिजाई में व्यस्त हैं। अधिकतर ने पीएयू की पीबीडब्ल्यू-887, पीबीडब्ल्यू-872, पीबीडब्ल्यू-826, आईआईडब्ल्यूबीआर की डीबीडब्ल्यू-327, डीबीडब्ल्यू-371, डीबीडब्ल्यू-372 और आईएआरआई की एचडी-3386, एचडी-3471 आदि किस्मों को अधिक पसंद किया है। 
इस वर्ष खर्च कम करने के लिए कुछ किसान अपना बीज ही उपयोग कर रहे हैं। इससे बीज प्रतिस्थापन दर प्रभावित होगी जिसका प्रभाव उत्पादन पर भी पड़ेगा। निजी विक्रेताओं और संगठनों से पता चलता है कि पिछले वर्षों की तुलना में उनके बीजों की बिक्री इस वर्ष कम हुई है। कुछ किसान बीज उत्पादक और विक्रेता बन गए हैं और नई किस्मों के बीजों की तलाश कर रहे हैं जिनका परीक्षण भी नहीं हुआ और फसलों की किस्मों और मानकों को प्रमाणित करने वाली केंद्रीय समिति द्वारा भी जारी नहीं हुईं ताकि वे अन्य किसानों को इसका बीज पैदा करके महंगे दाम पर बेच कर मुनाफा कमा सकें। किसानों को समझना चाहिए कि जो किस्में जारी ही नहीं हुईं, वे प्रमाणित किस्मों की तुलना में अधिक लाभदायक कैसे हो सकती हैं।
गेहूं की काश्त लगभग 35 लाख हेक्टेयर रकबे में होगी। इसकी प्रत्येक छोटा-बड़ा किसान बिजाई करता है, परन्तु रबी में इसके जो इसके विकल्प हैं, उन्हें अपनाने के लिए किसान अभी आगे नहीं आए। विभिन्नता के पक्ष से पंजाब सरकार मूंगफली जैसी फसलों की काश्त के प्रयोग के बाद दूसरे राज्यों से बीज मंगवा कर किसानों को काश्त करने के लिए प्रेरित कर रह है। 
पंजाब सरकार कृषि मशीनरी जैसे हैप्पी सीडर और सुपर सीडर आदि पर सब्सिडी दे रही है ताकि फसलों के अवशेष को आग न लगाई जाए, लेकिन फिर भी कुछ ज़िलों में आग लगाई जा रही है। हालांकि विगत वर्षों के मुकाबले इन घटनाओं में काफी कमी आई है, क्योंकि किसान जान गए हैं कि पराली को खेत में जोतने से ज़मीन की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है। अब प्लांटों और उद्योगों में भी भारी मात्रा में पराली और अन्य अवशेष को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। 
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