आगामी दो वर्ष कैसा रहेगा ट्रम्प का मिज़ाज, मध्यावधि चुनाव करेंगे तय

अमरीका में 3 नवम्बर, 2026 के मध्यावधि चुनावों के नतीजे भले ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कुर्सी का फैसला नहीं करेंगे, लेकिन यह ज़रूर तय करेंगे कि व्हाइट हाउस में बैठे इस ताकतवर राष्ट्रपति के अगले दो साल कितने अधिकारपूर्ण, कितने चुनौतीपूर्ण और कितने राजनीतिक दबावों से घिरे होंगे। अमरीकी मतदाताओं का फैसला ट्रम्प के बचे हुए कार्यकाल की दिशा ही नहीं, उनके मिज़ाज और कामकाज के तौर-तरीकों को भी प्रभावित करेगा। 
अमरीका में राष्ट्रपति का चुनाव चार साल के लिए होता है, जबकि कांग्रेस के दोनों सदनों, प्रतिनिधि सभा और सीनेट के सदस्यों का चुनाव अलग-अलग अवधि के लिए होता है। राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में होने वाले इन चुनावों को ही मध्यावधि चुनाव कहा जाता है। इस बार प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। फिलहाल रिपब्लिकन पार्टी को दोनों सदनों में बढ़त हासिल है। डेमोक्रेटिक पार्टी की कोशिश है कि वह कम से कम एक सदन में बहुमत हासिल करके ट्रम्प प्रशासन के सामने राजनीतिक और विधायी चुनौतियां खड़ी करे।
इन चुनावों का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि ट्रम्प की लोकप्रियता में गिरावट के संकेत मिल रहे हैं। अक्तूबर के अंत में आए रॉयटर्स-इप्सोस सर्वेक्षण में उनकी स्वीकृति दर 32 प्रतिशत दर्ज की गई थी। मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंता महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत, पेट्रोल और स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च रही है। आव्रजन नीति और ईरान के साथ युद्ध को लेकर भी अमरीकी समाज में असंतोष के संकेत मिले हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी को चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में बढ़त दिखाई दे रही है, लेकिन सीनेट का मुकाबला अपेक्षाकृत कठिन माना जा रहा है। लिहाजा वास्तविक तस्वीर तो मतगणना के बाद ही साफ होगी।
यदि डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रम्प के लिए अपने फैसलों को मनमाने ढंग से आगे बढ़ाना आसान नहीं रह जाएगा। प्रतिनिधि सभा की समितियों, बजट संबंधी प्रक्रियाओं और प्रशासनिक जांचों पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होगा। ट्रम्प प्रशासन के अधिकारियों को संसदीय सुनवाई और सवालों का सामना करना पड़ सकता है। उनके फैसलों की जांच, सरकारी खर्च पर निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही की मांग अधिक मुखर होगी। यदि डेमोक्रेट्स सीनेट में भी बढ़त बना लेते हैं, तो राष्ट्रपति की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ सकती हैं। महत्वपूर्ण नियुक्तियों, राजनयिक पदों और न्यायिक नियुक्तियों पर सहमति बनाना कठिन हो सकता है। हालांकि यह समझना ज़रूरी है कि कांग्रेस में बहुमत बदलने से राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियां समाप्त नहीं हो जातीं। ट्रम्प के पास वीटो का अधिकार तब भी रहेगा और विदेश नीति, टैरिफ तथा आव्रजन जैसे कई मामलों में उनके पास व्यापक कार्यकारी अधिकार भी बने रहेंगे।
इसका अर्थ यह है कि डेमोक्रेटिक बहुमत ट्रम्प की नीतियों पर अंकुश लगाने की कोशिश तो करेगा, लेकिन राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच टकराव भी बढ़ सकता है। बजट, सरकारी खर्च और कज़र् की सीमा जैसे मुद्दों पर 2027 में राजनीतिक गतिरोध की आशंका भी है। यह चुनाव ट्रम्प के राजनीतिक व्यवहार की भी परीक्षा है। उनकी पहचान एक ऐसे राष्ट्रपति की रही है, जो आलोचना का जवाब तीखे अंदाज़ में देते हैं, विरोधियों को निशाने पर लेते हैं और अपनी नीतियों पर सवाल उठाने वालों के प्रति उदार नहीं दिखते। चुनाव में झटका लगने की स्थिति में उनके सामने दो रास्ते होंगे। पहला यह कि वह जनता के संदेश को समझकर अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करें, महंगाई और रोज़गार जैसे घरेलू मुद्दों पर अधिक ध्यान दें तथा सहयोगी दलों और विपक्ष के साथ संवाद बढ़ाएं। दूसरा यह कि वह चुनावी पराजय को राजनीतिक विरोधियों की साज़िश बताकर और अधिक टकरावपूर्ण राजनीति का रास्ता अपनाएं। अमरीकी मतदाता अक्सर राष्ट्रपति के कामकाज पर बीच कार्यकाल में अपनी राय ज़ाहिर करते हैं। ट्रम्प का यह दूसरा और अंतिम राष्ट्रपति कार्यकाल है। उनके सामने दोबारा राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का सामान्य संवैधानिक विकल्प नहीं है।
अमरीका के चुनाव का परिणाम भारत के लिए महज एक विदेशी राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। भारत-अमरीका संबंध व्यापार, रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, शिक्षा और रणनीतिक सहयोग के व्यापक दायरे में फैले हैं। ट्रम्प के अगले दो वर्षों का राजनीतिक मिज़ाज इन सभी क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। सबसे पहला सवाल व्यापार और शुल्क का है। ट्रम्प की संरक्षणवादी आर्थिक नीति और आयात शुल्क लगाने की रणनीति ने भारतीय निर्यातकों के लिए अनिश्चितता पैदा की है। भारत और अमरीका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा सामने आने के बावजूद व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत पूरी नहीं हुई है। यदि डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस में मज़बूत होती है तो अमरीकी व्यापार नीति, टैरिफ और उनके आर्थिक प्रभावों पर अधिक संसदीय बहस हो सकती है। हालांकि इससे भारत पर लगाए गए शुल्क तत्काल समाप्त हो जाएंगे, ऐसा मानना भी जल्दबाजी होगी।
रक्षा सहयोग भारत-अमरीका संबंधों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सामरिक गतिविधियों के बीच दोनों देशों के लिए एक-दूसरे का सहयोग महत्वपूर्ण है। क्वॉड के माध्यम से भी भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया क्षेत्रीय स्थिरता के लिए काम कर रहे हैं। ट्रम्प की नीतियों में किसी भी तरह का बदलाव इस सहयोग की गति को प्रभावित कर सकता है। रूस के साथ भारत के संबंध भी इस समीकरण का हिस्सा हैं। भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों और सामरिक हितों को देखते हुए रूस के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। लेकिन ट्रम्प प्रशासन की रूस संबंधी नीति और प्रतिबंधों का दबाव भारत के सामने लगातार कूटनीतिक चुनौती पैदा कर सकता है। ईरान और पश्चिम एशिया के घटनाक्रम भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा तथा क्षेत्रीय हितों से सीधे-सीधे जुड़े हैं।
क्या अमरीकी लोगों को ऐसा राष्ट्रपति चाहिए जो अपनी नीतियों पर किसी तरह का समझौता न करे या जनता अब अधिक संतुलित और जवाबदेह नेतृत्व की अपेक्षा कर रही है? भारत के लिए भी यही समय अपनी कूटनीतिक परिपक्वता दिखाने का है। हमें न तो ट्रम्प की संभावित चुनावी हार से अत्यधिक उम्मीदें पालनी चाहिए और न ही उनकी पार्टी की जीत को अपनी विदेश नीति के लिए किसी चुनौती के रूप में देखना चाहिए। भारत-अमरीका संबंध किसी एक राष्ट्रपति या राजनीतिक दल के भरोसे नहीं चलने चाहिए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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