उठती आग की लपटें
यह बात बेहद चिन्ताजनक और दु:खद है कि पिछले दशकों से तत्कालीन सरकारों के अधिक से अधिक यत्नों, किए गए प्रबंधों और संबंधित तंत्र पर प्रत्येक वर्ष करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद गेहूं की नाड़ और धान की पराली को खेतों में ही जलाने का सिलसिला लगातार जारी है। समूचे रूप में अनुशासन की कमी ने अब तक प्रत्येक पक्ष से जहां प्रदेश का भारी नुकसान किया है, वहीं इस कारण ज़मीन की गुणवत्ता भी लगातार कम होती जा रही है। पंजाब कृषि प्रधान प्रदेश रहा है, यदि सरकारें, समाज और संबंधित पक्ष लगातार इसी तरह अनदेखा करती रहीं तो भूमिगत पानी के खत्म होते जाने के साथ-साथ शीघ्र ही उपजाऊ ज़मीन के बंजर बनने की संभावनाएं भी बनती दिखाई देती हैं। यदि समाज के प्रत्येक क्षेत्र में इसी तरह अनुशासनहीनता बनी रही तो प्रदेश का भविष्य शीघ्र धूमिल ही नहीं, अपितु अंधकारमय हो जाएगा।
यदि इसके पड़ोसी प्रदेश हरियाणा की बात करें तो जिस तरह आज यह प्रत्येक पक्ष से आगे बढ़ता जा रहा है उसके दृष्टिगत वह दिन दूर नहीं, जब दौड़ में पंजाब न केवल अब की तरह पिछड़ जाएगा, अपितु यह थक-हार कर ही बैठ जाएगा। पहले ही बेरोज़गारी के शिकार लाखों युवाओं को सम्भाल पाना कठिन हो जाएगा। आज यदि लूटपाट और डकैतियों का प्रचलन बढ़ रहा है, उसका बड़ा कारण बड़ी से बड़ी होती बेरोज़गारों की संख्या है। बात प्रदूषण की है तो इसका असर दिल्ली तक पहुंच रहा है। सीमा से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित पाकिस्तान का प्रसिद्ध शहर लाहौर भी आज अति प्रदूषित शहर माना जा रहा है। इसका एक कारण यह भी है कि खेतों में लगाई जाती आग से उठता धुआं न सीमा देखता है और न ही कंडियाली तार उसे रोक सकती है। खेतों में पराली जलाने का आंकड़ा 1612 को पार कर चुका है। एक नवम्बर तक यहां कुल 32.83 लाख हैक्टेयर धान के रकबे से 76 प्रतिशत हिस्से की कटाई पूरी हो चुकी है। इसके साथ ही आगज़नी की घटनाएं लगातार बढ़नी शुरू हो गई हैं। चाहे पिछले वर्षों के मुकाबले अब तक इन मामलों में कमी आई है, परन्तु 31 अक्तूबर को एक दिन में ही 292 खेत सुलगे हैं। सरकार द्वारा लगातार इस मामले पर कड़ी पहरेदारी भी की जा रही है। पराली जलाने के विरुद्ध अब तक 518 मामले दर्ज किए गए हैं। 26 लाख से अधिक के जुर्माने लगाए गए हैं, जिनमें 13 लाख से अधिक की वसूली हो चुकी है। इसके साथ ही धारा 223 के तहत लगभग 400 एफ.आई.आरज़ भी दर्ज की गई हैं और 400 से अधिक किसानों के ज़मीनी रिकार्ड में रैड एंट्रियां भी दर्ज की गई हैं, जिससे किसान को बैंक से ऋण लेने में परेशानी पेश आती है, कृषि सुविधाओं का लाभ भी रुक सकता है और ज़मीन के लेन-देन की प्रक्रिया पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
आश्चर्य इस बात का होता है कि लाख सरकारी यत्नों के बावजूद यह नकारात्मक सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। जहां पंजाब में अब तक यह आंकड़ा इस महीने 3 नवम्बर तक 1612 पार कर गया है, इसके मुकाबले में हरियाणा में 2 नवम्बर तक इस संबंध में मात्र 44 मामले ही सामने आए हैं, जबकि पिछले वर्ष 2025 में भी सिर्फ 122 मामले ही सामने आए थे। ऐसी स्थिति जहां सभी के लिए बड़ी चिन्ताजनक बात है, वहीं इससे पंजाब के भविष्य पर भी बड़ा प्रश्न-चिन्ह लगा हुआ दिखाई देता है, जिसे हम बेहद पीड़ादायक समझते हैं। सरकारों को ही नहीं पंजाब के लोगों, विशेष रूप से किसानों को भी इस संबंध में गम्भीरता से सोचने की ज़रूरत है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

