पूरे यूरोप के सामने चुनौतियां
फ्रांस दशकों तक आकर्षित करता रहा है। 1789 की क्रांति यूरोप की सीमाओं से दूर तक राजनीतिक चिंतन को बदल देने की क्षमता रखती थी। दो विश्व युद्धों के फलस्वरूप विनाशकारी पराजय के बावजूद मित्र देशों की सहायता से फ्रांस का डटे रहना प्रभावित करने की वजह था। फिर 1868 का साल आया, छात्रों और मज़दूरों के विरोध की ताकत ने चार्ल्स द गाल की सत्ता को विचलित कर दिया। जब हाल ही में यह सवाल उठाया गया कि क्या फ्रांस जल रहा है? तब ज़रूर 1944 के नाजी तूफान से पेरिस की मुक्ति का ख्याल एक बार ज़रूर आया होगा। फ्रांस फिर से परीक्षा के दौर में है, लेकिन इस बार स्थितियां कहीं ज्यादा विकट हैं। फ्रांस की ही बात नहीं, इस समय इटली, पुर्तगाल सहित यूरोप के अनेक हिस्सों में अलग-अलग ढंग से जो अशांति के समाचार आ रहे हैं, वे सोचने को मजबूर करने वाले हैं। सम्भव है कि असंतोष के कारण अलग-अलग रहे हों, लोकतंत्र में विरोध की गुंजाइश भी रहती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अवाम इतने असंतोष से क्यों लबालब भरा पड़ा है। यूरोप का राजनीतिक विश्वास डगमगा गया है। सरकारें अपने आवाम की अपेक्षा पर खरी नहीं उतर रहीं? क्या राजनीतिक दायित्व बदल गए हैं और ज़िम्मेदारियां इतनी बढ़ रही हैं कि संतुलन बनाना कठिन हो गया है?
तीसरी दुनिया के देशों के सामने यूरोप आज भी समृद्ध नज़र आता है। वहां के विश्वविद्यालय उत्कृष्ट हैं, उद्योग उन्नत हैं, लेकिन युवा वर्ग का सुरक्षित नौकरियां या रोज़गार का सवाल है, बच्चों के बेहतर भविष्य का सवाल है, परिवारों के खर्चा उठा सकने के सवाल हैं, बेघर लोगों के आवास का सवाल है, कितने ही ऐसे सवाल मिलकर विरोधाभास की स्थिति पैदा करते हैं। मुश्किलें जब सम्भलती नहीं तो विरोध के स्वर मज़बूत होने लगते हैं। आवास की कीमतें आसमान छू रही हों, युवा वर्ग का भविष्य धूमिल नज़र आ रहा हो तो मुश्किलें बढ़ जाती हैं।
फ्रांस में पैंशनभोगियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। मेडिकल सुविधा भी प्रोढ़ लोगों को अधिक चाहिए। एक लम्बे समय तक परिवार नियोजन की स्थिति रही। लोगों ने शादी ही नहीं की। व्यय की राशि में भरपूर वृद्धि होती रही। कमाई केवल युवा वर्ग से होनी थी जो जॉब कर सकें, उत्पादन में योगदान दे सकें। आय का ग्राफ ऊपर उठा सकें, वे कम होते हैं और दायित्व का भुगतान भारी मात्रा में होता गया। यह असंतुलन कहीं तो टूटना था। बुजुर्ग होती आबादी को भी कामगरों की ज़रूरत होती है। इस बीच माइग्रेशन ने लोगों को समाज में शामिल करने, सीमा प्रबंधन, स्थानीय-जन का विश्वास जीतना जैसे कठिन सवाल भी सामने आए हैं। ये सभी दबाव वर्तमान राजनीति के सामने बड़े सवाल हैं, जबकि अलग-अलग युद्धकों के प्रभाव भी अलग हैं। यूरोप में जो असंतोष व्यापक हो रहा है, उसकी वजह एक नहीं है। एक तरफ चुनौतीपूर्ण बाहरी परिस्थितियां प्रभावित कर रही हैं, दूसरी तरफ अंदरूनी चुनौतियां बराबर खड़ी हैं। संतुलन बैठाना इतना आसान रहा नहीं। रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव केवल वहीं तक सीमित नहीं हैं। यूरोप की तैयारियों की कमी खुलकर सामने आ गई। अनेक यूरोपीय सरकारें पहले अमरीका पर ही निर्भर रही हैं। यूरोप की सुरक्षा के लिए वही खड़ा रहा है, लेकिन अब उसकी बढ़ती अपेक्षाओं ने इस तर्क को मजबूत कर दिया है कि यूरोप को अपनी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठानी पड़ेगी। अमरीका पहले की तरह सहारा बना नहीं रह पाएगा। ऐसे में क्या केवल एकदम से रक्षा बजट बढ़ा देना काफी होगा?



