कांग्रेस का चुनावी बिगुल

चाहे देर बाद ही सही आखिर कांग्रेस ने आगामी वर्ष के शुरू में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा दिया है। संगरूर में एक प्रभावशाली रैली में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की उपस्थिति ने कई संकेत दिए हैं। पिछली बार मालवा से कांग्रेस को कम समर्थन मिला था। इस क्षेत्र की अधिकतर सीटें आम आदमी पार्टी की झोली में पड़ी थीं, इस बार संगरूर से शुरू किए गए प्रचार अभियान  से यह संकेत ज़रूर मिलता है कि कांग्रेस प्रदेश के इस सबसे बड़े क्षेत्र की तरफ पूरा ध्यान देने का यत्न कर रही है। इससे बहुत समय पहले अन्य संबंधित पार्टियों ने अपना चुनाव अभियान शुरू कर दिया था।
आम आदमी पार्टी ने तो उम्मीदवारों की पहली सूची भी जारी कर दी है। भारतीय जनता पार्टी कई महीनों से चुनाव की तैयारियां करती आ रही है। उसने नशे के विरुद्ध पंजाब भर में मार्च भी निकाला था। चाहे विभिन्न अकाली दलों की नाव अभी तक किसी किनारे लगी तो दिखाई नहीं देती, परन्तु उनकी अपने-अपने स्तर पर सक्रियता जारी है। जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस अब तक अपनी आंतरिक कशमकश में ही फंसी रही है। नेतृत्व के सवाल पर इसके भीतर पड़ी दरार दिखाई देती रही है। चाहे सचिन पायलट को प्रदेश की ज़िम्मेदारी सौंपने से कुछ प्रभाव तो ज़रूर पड़ा है, परन्तु अभी तक राष्ट्रीय नेतृत्व पंजाब सहित चुनाव वाले राज्यों को दृष्टिविगत करके राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में ही अधिक उलझा रहा है। चाहे देर से ही सही परन्तु कांग्रेस के भीतर यह अहसास ज़रूर पैदा हुआ है कि प्रदेश में अपना प्रभाव बनाने के लिए गतिविधियां तो शुरू करनी ही पड़ेंगी। संगरूर की रैली में पंजाब भर के बड़े-छोटे नेता उपस्थित हुए, मेहनत से यहां जनसमूह भी कर लिया गया, मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने मंच पर सम्बोधित करते हुए जहां कई पक्षों से पंजाब सरकार की कारगुज़ारी की कड़ी आलोचना भी की, वहीं केन्द्र में शासन चला रही मोदी सरकार को भी पूरी तरह बेनकाब करने का यत्न किया। यहां भी राहुल ने वोट चोरी की बात की और मोदी सरकार की राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय नीतियों को भी उजागर किया और यहां तक कि उन्होंने प्रधानमंत्री को प्रत्यक्ष रूप से चुनौती देते हुए कहा कि वह आपसी बहस में 5 मिनट में ही उन्हें देश-द्रोही सिद्ध कर देंगे। ऐसी बातों का लोगों पर किस तरह का प्रभाव पड़ता है, इस संबंध में हम कुछ नहीं कह सकते, परन्तु यह ज़रूर महसूस करते हैं कि वरिष्ठ नेताओं को अपने भाषणों में परिपक्वता ज़रूर दिखानी चाहिए। जहां तक इस रैली में राहुल गांधी द्वारा नशे के मामले को मुख्य मुद्दा बनाने की बात है, इस मुद्दे को आम आदमी पार्टी ने भी और भाजपा ने भी केन्द्रीय मुद्दा बनाया हुआ है। जहां तक नशे के प्रचलन का संबंध है, यहां पिछले समय में तीन बार अकाली-भाजपा सरकारें बनीं। बार-बार कांग्रेसी भी सत्ता में आए और अब आम आदमी पार्टी यहां सत्तारूढ़ है, परन्तु तरह-तरह के नशों ने पंजाब को खोखला कर दिया है। इस नकारात्मक घटनाक्रम को खत्म करने के लिए एक दूसरे पर आरोप लगाने की बजाय गम्भीर योजनाबंदी की ज़रूरत होगी।
इस समय बात कांग्रेस की हो रही है, संगरूर में जनसमूह और नेताओं के भाषणों के बाद आगामी समय में यहां के स्थानीय कांग्रेसी नेता और पार्टी के दिल्ली के बॉस किस तरह चलते हैं, यह देखने वाली बात होगी। असली परीक्षा टिकटों के वितरण के समय होगी। उसके बाद ही यह पार्टी चुनावों के लिए कोई अच्छी योजनाबंदी करने में सामर्थ होगी। पार्टी द्वारा अब तक के इस दिशा में किए गए यत्न अच्छे हैं, परन्तु निकट भविष्य में इनके परिणाम ही इसकी मज़बूती या कमज़ोरी का कारण बनेंगे। कांग्रेस की इस बड़ी रैली से राजनीतिक माहौल के और गर्माने की संभावना बन गई है। नि:संदेह कुछ महीनों के बाद आए चुनाव परिणाम ही इस बेहद कमज़ोर हो चुके प्रदेश में एक ताकत पैदा करने में सामर्थ्य हो सकेंगे। 

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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