‘हम किसी से कम नहीं’-बेटियों ने एक बार फिर चमकाया नाम

कुछ दिन पहले हर किसी की ज़ुबान पर एशियाई खेलों की चर्चा थी। ये खेलें जापान में हो रही थीं। भारत ने कुल 85 पदक जीत कर इन खेलों में चौथा स्थान प्राप्त किया था।
आज हम बात करेंगे इस उपलब्धि में भारत की बेटियों के योगदान की, जिन्होंने अपनी मेहनत, हिम्मत और दृढ़ संकल्प से भारत को पदक सूचि में बढ़िया रैंक प्राप्त करवाया। भारतीय महिला खिलाड़ियों ने एशियाई खेलों में 38 पदक जीते जिनमें 11 स्वर्ण, 11 रजत और 16 कांस्य के थे यानि कि 61 प्रतिशत से अधिक का योगदान भारत की बेटियों का रहा।
जो खिलाड़ी शारीरिक तौर पर किसी न किसी कारण से असमर्थ होते हैं, उनके लिए अलग खेल मुकाबले करवाए जाते हैं जिनको पैरा-एशियाई खेल कहते हैं। इस खिलाड़ियों को भी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता है। उनको ज़िंदगी में निराशा का सामना नहीं करना पड़ता। पैरा-एशियाई खेलों में भी हमारी बेटियों ने कमाल कर दिया। 50 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर एथलैटिक्स, राईफल, तीरंदाज़ी आदि में हमारी बेटियों ने स्वर्ण, रजत के पदक जिताकर अपना ही नहीं, पूरे देश का सिर ऊंचा किया है। हमारी बेटियों ने लगभग 20 स्वर्ण, 17 रजत और 10 कांस्य के पदक जीते।
यह इसलिए बहुत खुशी की बात है क्योंकि इस आंकडे से स्पष्ट होता है कि लोग अब बेटियों को भी मौका देने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे। वे बेटों की तरह ही बेटियों के खेलों के प्रति सपने साकार करने की हर कोशिश करते हैं।
महिला हॉकी टीम ने 44 वर्ष बाद और महिला क्रिकेट टीम ने भी स्वर्ण पदक जीत कर सभी भारतीयों को बहुत गर्व महसूस करवाया। इसके अलावा अन्य खेलों जैसे तीरंदाज़ी, निशानेबाज़ी, मुक्केबाज़ी एथलैटिक्स आदि में अपनी प्रतिभा देश के सामने उजागर की।
भारत की बेटियों ने फिर साबित कर दिया है कि उनको मौका, उत्साह और सहयोग मिले तो वे अपनी प्रतिभा दिखाने में पीछे नहीं हटतीं और दुनिया के हर मंच पर अपना लोहा मनवा सकती हैं।
वास्तव में आज की पीढ़ी के तेज़ी से भागते दिमाग को मोबाइल लैपटॉप और फास्ट फूड से निकालकर किसी रचनात्मक और कलात्मक काम में लगाना बहुत ज़रूरी है। उनकी ऊर्जा को कलात्मकता की ओर लगाना समय की ज़रूरत बन गया है। खेलें व्यायाम का सबसे अच्छा तरीका भी हैं।
ये अच्छी सेहत देने के साथ-साथ आत्म-विश्वास, अनुशासन, समय पर अभ्यास और भोजन करना, हार को स्वीकार करना सिखाती हैं। ये सिखाती हैं कि हार अंत नहीं, नई शुरुआत है। इसके साथ एक टीम की तरह काम करने जैसी सब खूबियां शख्सियत में पनपती हैं। जीत और हार दोनों ज़िंदगी के ज़रूरी सबक सिखाती हैं और जीत हार से अहम चीज़ होती है, भाग लेना जो अनुशासन, ज़िम्मेदारी और मिलकर जुझना सिखाता है। मैदान में लिया गया फैसला ज़िंदगी में नेतृत्व करना भी सिखाता है। 
आधुनिक नौजवान पीढ़ी को यदि सही समय पर सही दिशा मिल जाए तो उनका भविष्य संवर सकता है और वर्तमान खुशहाल हो सकता है। 
गलत संगत, गलत दिशा, गलत काम में पड़ने से खेलें बचाती हैं।
अब समय पहले से बहुत बदल रहा है। माता-पिता अपने बच्चों के खेलों के प्रति शौक को, उनकी हिस्सेदारी को पूरा करने के लिए बहुत मेहनत कराते हैं चाहे उनको कज़र् लेना पड़े या ज़मीन गिरवी रखनी पड़े।
उभरते खिलाड़ियों को दरपेश चुनौतियों को दूर करना सरकारों की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है खासतौर पर लड़कियों के मामले में। कई खिलाड़ियों में बहुत सामर्थ्य और प्रतिभा होती है परन्तु साधनों की कमी होने के कारण वे पीछे हट जाते हैं। उनका हाथ पकड़ने में सरकारों को, संस्थाओं को पीछे नहीं हटना चाहिए। स्कूलों, कालेजों, ज़िला स्तर पर करवाए जाते मुकाबले इस प्रतिभा को पहचानने के लिए मौका देते हैं जो कि बेटियों के लिए भविष्य में आगे बढ़ने के काम आता है।
अपने देश के लिए पदक जीतने वाले खिलाड़ियों और बेटियों को पैसों के रूप में इनाम देना और सरकारी नौकरी देने से उनको और अच्छे प्रदर्शन करने का प्रोत्साहन मिलता है। अंत: खेलें आज कल अच्छा करियर भी हैं।
इन उपलब्धियों के पीछे वर्षों की मेहनत, लगन, अनेक कुर्बानियां होती हैं। खासतौर पर लड़कियों को अपनी मंज़िल तक पहुंचने के लिए कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। समाज की पुरानी सोच और साधनों की कमी जैसी चुनौतियों से भी जूझना पड़ता है।
यह बेटियों की जीत और समाज की बदलती सोच की जीत है। हमें अपनी बेटियों की उपलब्धियों पर गर्व करना चाहिए और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। आज की यह विजेता बेटियां कल के भारत की नई तस्वीर हैं, जहां बेटियों को बोझ नहीं, घर की शान समझा जाता है।
यदि परिवार और समाज उनके सपनों को उड़ान दें, उनको उड़ने के लिए पंख दें, फिर बेटियों की छलांग आसमान में सुनहरे इतिहास बनाने के निशान ज़रूर छोड़ेगी।
जब कोई नौजवान देश के लिए पदक जीतता है, देश का तिरंगा लेकर खड़ा होता है तो पूरा देश गर्व महसूस करता है। 
ज़रूरी है घर से इसकी शुरुआत करें। स्कूल, कालेज और राष्ट्रीय स्तर पर हर कोई सहयोग करे ताकि हमारा नौजवान वर्ग खेलों जैसे निर्माणाधीन काम में पड़ कर अपने शहर, अपने प्रदेश और देश का नाम रौशन करे। नौजवानों के लिए अंत में एक संदेश : 
मोबाइल छोड़ो, मैदान पकड़ो
खेलोगे तो ही खिलोगे।

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