अब तो भाजपा के लिए भी गले की फांस बन गये हैं ज्ञानेश कुमार

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की लामबंदी अब केवल कांग्रेस या राहुल गांधी के राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रह गई है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर), मतदाताओं के नाम हटाए जाने, चुनाव आयोग के कामकाज में कथित एकतरफा फैसलों और आयोग के भीतर असहमति के आरोपों ने इस विवाद को संस्थागत विश्वसनीयता का प्रश्न बना दिया है। सितंबर में सामने आयी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से दस महीनों में कम से कम 14 बार दर्ज कराई गई आपत्तियों का उल्लेख इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण मोड़ था। इससे विपक्ष को यह कहने का अवसर मिला कि मामला केवल राजनीतिक विरोध का नहीं बल्कि चुनाव आयोग के भीतर भी निर्णय प्रक्रिया को लेकर मतभेदों का है। 
इसके बाद विपक्ष का निशाना पूरी संस्था के बजाय सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त पर केंद्रित हो गया। 1 नवम्बर 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली और इससे पहले 19 विपक्षी दलों की ओर से किया गया प्रतीकात्मक सार्वजनिक महाभियोग इसी रणनीति का हिस्से थे। विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उन्हें पद से हटाने की मांग को राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान में बदलने की कोशिश की। इस परिस्थिति में सरकार की मुश्किल यह है कि वह ज्ञानेश कुमार का बचाव जितनी आक्रामकता से करती है, उतना ही आम नागरिक के मन में यह सवाल उठने की गुंजाइश बढ़ती है कि आखिर उनके बचाव की इतनी ज़रूरत क्यों महसूस की जा रही है? राजनीति में हमेशा आरोपों से ज्यादा महत्वपूर्ण कभी-कभी उन आरोपों पर सत्ता की प्रतिक्रिया हो जाती है। जब कोई सरकार किसी व्यक्ति के पक्ष में असाधारण रूप से खड़ी दिखाई देती है, तो उसके पीछे के कारणों को लेकर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। 
राहुल गांधी के लिए यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने इसे किसी चुनावी हार-जीत या किसी एक राज्य की मतदाता सूची तक सीमित नहीं रखा है। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में मतदाता का वोट ही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति है और यदि मतदाता सूची की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाए तो पूरी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। 1 नवंबर 2026 की रैली में राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि उनके बिना नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री और अमित शाह गृहमंत्री नहीं बन पाते। यह राजनीतिक वक्तव्य अपने आपमें तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है, क्योंकि ज्ञानेश कुमार ने फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला था, जबकि लोकसभा चुनाव 2024 में हो चुके थे। लेकिन राहुल का व्यापक राजनीतिक संदेश चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता पर केंद्रित है। राहुल गांधी के लिए असली उपलब्धि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं बल्कि जनता के बीच यह धारणा मजबूत करना है कि चुनाव आयोग पर सत्ता का प्रभाव है और विपक्ष के सवालों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। यदि यह धारणा व्यापक होती है तो उसका राजनीतिक लाभ कांग्रेस और विपक्ष को मिल सकता है, भले ही उनके तमाम आरोप अदालत या किसी स्वतंत्र जांच में साबित न हों।
भाजपा के लिए समस्या यह है कि ज्ञानेश कुमार को बचाने और उनसे दूरी बनाने, दोनों के अपने राजनीतिक जोखिम हैं। यदि सरकार उनके बचाव में पूरी ताकत लगाती है तो विपक्ष को यह कहने का अवसर मिलता है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता से ज्यादा महत्वपूर्ण सरकार के लिए अपने पसंदीदा अधिकारी को बचाना है। इससे चुनाव आयोग और सरकार के बीच संस्थागत दूरी का सिद्धांत कमजोर दिखाई दे सकता है। दूसरी ओर, यदि सरकार किसी तरह ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देने के लिए राजी कर लेती है, तो राहुल गांधी इसे अपनी राजनीतिक लड़ाई की जीत के रूप में पेश करेंगे। वह कहेंगे कि जिन आरोपों को सरकार और भाजपा लगातार खारिज करती रही, उनके दबाव में अंतत: मुख्य चुनाव आयुक्त को पद छोड़ना पड़ा। इससे राहुल को केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध अभियान की सफलता नहीं बल्कि सरकार को पीछे हटाने वाले विपक्षी नेता की छवि गढ़ने का अवसर मिलेगा।
इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त कोई सामान्य सरकारी पदाधिकारी नहीं हैं, जिन्हें सरकार अपनी इच्छा से हटा सके। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने जैसी है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश आवश्यक है। कहने का मतलब यह है कि सरकार के सामने उन्हें सीधे बर्खास्त करने का विकल्प नहीं है। स्वैच्छिक इस्तीफा एक अलग परिस्थिति होगी, लेकिन यदि ऐसा होता है तो उसके पीछे राजनीतिक दबाव की कहानी भी खड़ी हो सकती है। इसलिए सरकार के लिए यह मामला केवल राजनीतिक प्रबंधन का नहीं बल्कि संवैधानिक मर्यादा और संस्थागत स्वायत्तता का भी है। भाजपा की राजनीतिक ताकत का एक बड़ा आधार यह रहा है कि वह विपक्ष के आरोपों को अक्सर राजनीतिक हताशा और चुनावी पराजय की प्रतिक्रिया बताकर खारिज करती रही है लेकिन ज्ञानेश कुमार का विवाद इस स्थापित रणनीति के लिए कुछ अलग तरह की चुनौती पेश कर रहा है।
यदि देश के नागरिकों के बीच यह धारणा मजबूत होती है कि चुनाव आयोग सरकार के प्रभाव में काम कर रहा है तो इसका नुकसान केवल कांग्रेस या विपक्ष को नहीं, अंतत: लोकतांत्रिक व्यवस्था को होगा। यही वजह है कि भाजपा को ज्ञानेश कुमार के व्यक्तित्व की तुलना में उस राजनीतिक संदेश की ज्यादा चिंता करनी चाहिए जो उनके बचाव या उनके संभावित इस्तीफे से पैदा होगा। हालांकि विपक्ष के लिए भी यह लड़ाई आसान नहीं है। किसी संवैधानिक पदाधिकारी पर गंभीर आरोप लगाना और उन्हें प्रमाणों के आधार पर सिद्ध करना अलग-अलग बातें हैं। विपक्ष को केवल रैलियों, नारों और राजनीतिक प्रस्तावों से आगे बढ़कर अपने आरोपों के दस्तावेजी प्रमाण सार्वजनिक करने होंगे। दिल्ली की रैली में हजारों लोगों की मौजूदगी ने विपक्ष की एकजुटता का संकेत जरूर दिया, लेकिन उसे देशव्यापी जनमत का निर्णायक प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी। 
इस पूरे घटनाक्रम में केन्द्र सरकार के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता यह होगा कि वह ज्ञानेश कुमार के बचाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के बजाय चुनाव आयोग की विश्वसनीयता बहाल करने पर ध्यान दे। मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर उठे सवालों का पारदर्शी जवाब, आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया की स्पष्टता, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण और ज़रूरत पड़ने पर स्वतंत्र जांच की व्यवस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। सरकार को यह समझना होगा कि किसी व्यक्ति के पद पर बने रहने से ज्यादा महत्वपूर्ण उस संस्था पर जनता का भरोसा है जिसका वह नेतृत्व कर रहा है।              -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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