धर्म, लोकतंत्र और एसआईआर : भारत की मतदाता सूचियों की शुचिता की रक्षा
भारत की सभ्यतागत परम्परा में धर्म सार्वजनिक जीवन के केन्द्र में उत्तरदायित्व को स्थापित करता है। धार्मिक आचरण से आगे बढ़कर इसका अर्थ होता है-सदाचार, निष्पक्षता और यह चेतना कि व्यक्ति के आचरण का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है। संवैधानिक लोकतंत्र में यह समझ विधिसम्मत संस्थाओं के प्रति सम्मान, जागरूक भागीदारी और सहनागरिकों के प्रति जिम्मेदारी के रूप में अभिव्यक्त होती है। इसलिए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण-एसआईआर-का मूल्यांकन कानून, साक्ष्यों और प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों के आधार पर होना चाहिए। राजनीतिक विवाद अपने आप में उस प्रक्रिया को अवैध नहीं बना सकता, जिसका उद्देश्य मतदाता सूचियों की शुद्धता सुनिश्चित करना हो। एसआईआर के समर्थन में सबसे मजबूत कानूनी आधार सर्वोच्च न्यायालय का 27 मई 2026 का निर्णय है, जो एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एवं अन्य बनाम भारत निर्वाचन आयोग एवं अन्य मामले में दिया गया।
बिहार में चुनौती दिए गए एसआईआर की जांच करते हुए न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 324 के साथ पठित लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के अंतर्गत उसके कानूनी आधार को मान्यता दी। न्यायालय ने अपनाए गए उपायों को उनके उद्देश्य के अनुपात में पाया और मनमाने ढंग से नाम बाहर किए जाने के विरुद्ध प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों को स्वीकार किया। ये निष्कर्ष न्यायालय द्वारा जांचे गए बिहार एसआईआर को महत्वपूर्ण न्यायिक समर्थन प्रदान करते हैं। साथ ही, ये गहन पुनरीक्षण पर तथ्यपूर्ण चर्चा का आधार बनते हैं। सार्वजनिक विमर्श में इस न्यायिक मूल्यांकन को गंभीरता से लेना आवश्यक है। चुनावी प्रशासन पर कोई तर्क उस निर्णय की अनदेखी करके विश्वसनीय नहीं रह सकता, जिसने विवादित प्रक्रिया की वैधता पर सीधे विचार किया हो। गहन पुनरीक्षण वर्तमान निर्वाचन आयोग की देन नहीं है। आयोग के जून 2025 के आदेश में 1952-56 से लेकर 2004 तक विभिन्न वर्षों में देश के संपूर्ण अथवा कुछ हिस्सों में किए गए ऐसे पुनरीक्षणों का उल्लेख है।
इसकी प्रशासनिक आवश्यकता भी स्पष्ट है। मृत्यु, पलायन, निवास परिवर्तन, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकरण और नए पात्र नागरिकों के जुड़ने से मतदाताओं की संरचना निरंतर बदलती रहती है। मतदाता सूचियों में इन परिवर्तनों का प्रतिबिंब होना चाहिए। गलत मतदाता सूची लोकतंत्र को दोनों प्रकार से नुकसान पहुंचा सकती है—किसी पात्र नागरिक का नाम छूट सकता है अथवा ऐसा नाम बना रह सकता है जो अब कानूनी आवश्यकताएं पूरी नहीं करता। जिम्मेदार पुनरीक्षण को दोनों स्थितियों का समाधान करना चाहिए। चंडीगढ़ इसका उपयोगी उदाहरण है, बशर्ते आंकड़ों की तुलना का आधार स्पष्ट रखा जाए। पुनरीक्षण से पहले मतदाताओं की संख्या 5,16,427 थी। प्रारूप सूची में 4,50,282 मतदाता थे, जबकि 22 सितंबर 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची में 4,60,209 मतदाता दर्ज हुए। अंतिम संख्या प्रारूप सूची की तुलना में 9927 अर्थात लगभग 2.20 प्रतिशत अधिक थी। फिर भी यह पुनरीक्षण से पहले की संख्या से 56,218 कम रही।
प्रकाशित विवरण के अनुसार प्रारूप और अंतिम प्रकाशन के बीच 15,117 नाम जोड़े गए और 5190 हटाए गए। इस दौरान सत्यापन, सुनवाई और जनसंपर्क की गतिविधियां भी हुईं। ये आंकड़े बताते हैं कि प्रक्रिया में नाम हटाने के साथ पात्र मतदाताओं को शामिल करना भी सम्मिलित था। हालांकि केवल इन आंकड़ों से प्रत्येक व्यक्तिगत निर्णय की शुद्धता सिद्ध नहीं होती। नोटिस, सत्यापन, उत्तर देने का सार्थक अवसर और कारणयुक्त निर्णय विश्वसनीय चुनावी प्रशासन के लिए आवश्यक हैं। निर्धारित आदेशों को चुनौती देने के लिए वैधानिक उपचार अतिरिक्त रास्ता प्रदान करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में बिहार की प्रक्रिया से संबंधित अपील व्यवस्था का भी उल्लेख है। प्रशासनिक त्रुटियों को तुरंत सुधारा जाना चाहिए। उनका सुधार प्रक्रिया को मजबूत करता है, क्योंकि इससे सिद्ध होता है कि सुरक्षा उपाय प्रभावी हैं। इसी प्रकार किसी एक प्रविष्टि से संबंधित आरोप को व्यापक संस्थागत विफलता का प्रमाण बताने से पहले उसके तथ्यों की जांच आवश्यक है।
विपक्ष की निगरानी अपरिहार्य है। राजनीतिक दलों को प्रक्रियाओं पर प्रश्न उठाने, कठिनाइयों की पहचान करने और गैर-कानूनी निर्णयों को चुनौती देने का अधिकार है। उनकी जिम्मेदारी प्रभावित नागरिकों को समाधान दिलाने में सहायता करना भी है। अगस्त 2025 में बिहार संबंधी सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को निर्देश दिया था कि वे अपने बूथ स्तरीय अभिकर्ताओं को आवश्यक प्रपत्रों और दस्तावेजों के संबंध में मतदाताओं की सहायता करने के निर्देश दें। इन माध्यमों से भागीदारी मतदाताओं की रक्षा का ठोस रास्ता प्रस्तुत करती है।
नाम बाहर किए जाने का आरोप लगाने वाले दलों को विवादित प्रविष्टियों की पहचान करनी चाहिए, अपने दावों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने चाहिएं और नागरिकों को सुधार प्रक्रिया अपनाने में सहायता देनी चाहिए। सार्वजनिक पैरवी तब अधिक उपयोगी होती है जब उसके साथ व्यावहारिक सहायता भी जुड़ी हो। यह अपेक्षा सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होती है। चुनावी शुद्धता संपूर्ण मतदाता समुदाय के हित में है। बयालीसवें संविधान संशोधन से जोड़ा गया अनुच्छेद 51क नागरिकों के कर्त्तव्यों को संवैधानिक अभिव्यक्ति देता है। इनमें संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान और जिज्ञासा एवं विवेकपूर्ण विचार की भावना विकसित करना शामिल है। ये जिम्मेदारियां लोकतांत्रिक नागरिकता को समृद्ध करती हैं। मतदाता बनने की पात्रता का निर्धारण कानून के अनुसार ही होना चाहिए। नागरिक अपनी प्रविष्टियां जांचकर, सही जानकारी देकर, विसंगतियों की सूचना देकर और राजनीतिक दावों को आगे प्रसारित करने से पहले परखकर योगदान दे सकते हैं। संस्थाओं को भी भागीदारी सुलभ बनानी चाहिए और अपने निर्णयों के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए।
यहीं धर्म एक मूल्यवान नागरिक सिद्धांत प्रस्तुत करता है-अधिकारों का प्रयोग जिम्मेदारी से करें, अधिकारिता का निर्वहन निष्पक्षता से करें और सार्वजनिक विमर्श में बौद्धिक ईमानदारी बनाए रखें। कानूनसम्मत, समावेशी व सावधानीपूर्वक संचालित एसआईआर दृढ़ समर्थन का अधिकारी है। इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध नेतृत्व भी समर्थन का पात्र है।
-एडवोकेट, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय,
एडीशनल एडवोकेट जनरल, हरियाणा सरकार



