प्रशंसनीय आदेश
किसी भी देश में लोगों को सुरक्षा प्रदान करने और अमन-कानून की स्थिति को बनाए रखने में पुलिस की विशेष भूमिका होती है। लोकतांत्रिक देशों में तो पुलिस से अमन-कानून बनाए रखने के अतिरिक्त नागरिकों की बेहतरी के लिए और भी कई तरह की ज़िम्मेदारियां निभाने की उम्मीद की जाती है। कई पश्चिमी देशों में नागरिक किसी भी तरह की समस्या होने या यहां तक किसी शहर में रास्ता भूल जाने पर भी निकट के पुलिस स्टेशन पहुंच जाते हैं और पुलिस की ओर से ऐसे नागरिकों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाया जाता है। विशेष रूप से विकसित देशों में पुलिस को लोगों की रक्षा और दोस्त माना जाता है। निर्भय होकर नागरिक चाहे वह महिला हो या पुरुष पुलिस स्टेशनों में जाते और आवश्यक सेवाएं प्राप्त करते हैं।
दूसरी तरफ यदि अपने देश भारत की बात करें तो 76 वर्ष के लोकतांत्रिक अमल के बाद भी अभी पुलिस का लोगों की रक्षक या दोस्त होने वाली छवि नहीं बनी। लोग ज़रूरत पड़ने पर विवशता के कारण पुलिस से सेवाएं तो लेते हैं, परन्तु उन पर पूरी तरह विश्वास नहीं करते। विशेष रूप से महिलाएं किसी समस्या के हल के लिए पुलिस से सम्पर्क करने या पुलिस स्टेशन जाने से बेहद संकोच करती हैं। लोगों के पुलिस के प्रति संदेह निरर्थक नहीं हैं। यह अक्सर देखा जाता है कि पुलिस सत्तारूढ़ पार्टी से संबंधित लोगों या समाज में विशेष रुतबा रखने वाले लोगों का पक्ष अधिक लेती है और पीड़ित आम व्यक्ति को उनसे ज्यादातर न्याय नहीं मिलता। भ्रष्टाचार के भी अक्सर ही पुलिस पर आरोप लगते रहते हैं। दूसरी बात यह भी है कि सत्तारूढ़ पार्टियां समय-समय पर होने वाले आन्दोलनों को कुचलने और अपने राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए भी पुलिस का अंधाधुंध इस्तेमाल करती हैं। आन्दोलनकारियों से मारपीट करने और उन पर झूठे मामले दर्ज करना भी पुलिस का आम व्यवहार रहता है।
इसकी पुष्टि इन तथ्यों से भी होती है कि राष्ट्रीय और विभिन्न राज्यों के मानवाधिकार आयोग के पास भी सबसे अधिक शिकायतें पुलिस के विरुद्ध ही पहुंचती हैं। हमारे देश की अदालतें भी इन हकीकत से भली-भांति अवगत हैं। उनकी ओर से विभिन्न मामलों की सुनवाई करते हुए पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के अत्याचारों का समय-समय पर गम्भीरता से संज्ञान भी लिया जाता है और पुलिस को सख्ती से मानवीय ढंग से काम करने के लिए कहा जाता है।
कुछ दशक पहले देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस के कामकाज संबंधी एक फैसला देते हुए राज्यों को आदेश दिए थे कि पुलिस को ब्रिटिशकाल के समय बनाए गए पुलिस एक्ट 1861 के अनुसार न चलाया जाए, अपितु स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश की ज़रूरतों के दृष्टिगत केन्द्र और राज्यों स्तर पर नए पुलिस एक्ट बनाए जाएं। इसे मुख्य रखते हुए ज्यादातर सभी राज्यों ने नए पुलिस एक्ट तो ज़रूर बनाए परन्तु सत्तारूढ़ शासकों ने और ऊंचे रुतबे वाले लोगों ने पुलिस से अपने हितों के अनुसार काम लेने के अमल नहीं छोड़े। शायद इसी प्रचलन के दृष्टिगत देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस के लोगों को हिरासत में लेने या गिरफ्तार करने संबंधी अधिकारों की एक बार फिर से व्याख्या की है। सर्वोच्च न्यायालय ने त्रिपुरा से संबंधित एन.डी.पी.एस. एक्ट की धाराओं के तहत गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों को त्रिपुरा के उच्च न्यायालय द्वारा ज़मानत देने से इनकार किए जाने संबंधी एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्तियों को 24 घंटे के भीतर-भीतर मैजिस्ट्रेट के समक्ष ज़रूर पेश किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि 24 घंटे की यह अवधि उस समय से शुरू होनी चाहिए, जब पुलिस संबंधित व्यक्तियों को हिरासत में लेती है न कि जब उनकी गिरफ्तारी डालती है। आम तौर पर होता यह है कि पुलिस किसी व्यक्ति को संदेह के आधार पर किसी मामले में पहले हिरासत में ले लेती है और कई दिनों तक उसे ़गैर-कानूनी ढंग से हिरासत में रख कर उससे पूछताछ करने के नाम पर उससे मारपीट करती है और फिर कई दिनों बाद उसकी गिरफ्तारी डाली जाती है। फिर इसके 24 घंटे बाद उसे अदालत में पेश किया जाता है। पुलिस की यह आम जानी जाती कार्यशैली है, इसके दृष्टिगत ही सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा है कि हिरासत और गिरफ्तारी में अंतर नहीं किया जा सकता। बिना गिरफ्तारी डाले हिरासत में रखना संविधान की धारा 22 (2) का उल्लंघन है। अदालत ने यह भी कहा है कि उसका हमेशा यत्न रहता है कि व्यक्तियों से हिरासत में होने वाली हिंसा को खत्म किया जाए।
हम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गईं उक्त टिप्पणियों को मानवाधिकारों के पक्ष से बेहद महत्त्वपूर्ण समझते हैं। देश की विभिन्न राज्यों की अदालतों को भी सर्वोच्च न्यायालय की इस भावना को समझना चाहिए और पुलिस को भी इसकी रोशनी में अपनी कार्यशैली में उचित बदलाव करना चाहिए, ताकि देश में पुलिस की छवि सुधर सके और लोग विकसित देशों की तरह ही पुलिस को अपनी दोस्त मानने के लिए उत्साहित हों।

