नवम्बर ’84 के घटनाक्रम संबंधी ‘सच एवं सुलह-सफाई आयोग’ बने
कत्ल-ओ-़गारत है बरपा कैसी मेरे शहर में,
यूं कभी खून का बाज़ार नहीं देखा है।
जब मैंने पहली बार फरहाद अहमद ़िफगार का यह शे’अर पढ़ा था तो मेरे दिमाग में 1984 का सिख कत्लेआम घूम गया था। आज फिर जब इस संबंध में लिखने लगा तो यह शे’अर याद आ गया। सचमुच 1984 में दिल्ली तथा अन्य कई शहरों में खून के बाज़ार ही लग गए थे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही 3325 सिखों की हत्या कर दी गई थी। महिलाओं से दुर्व्यवहार किया गया, हज़ारों घर जलाए गए, गुरुद्वारे जलाए गए, परिवारों के परिवार तबाह कर दिए गए। हालात ये थे कि प्रत्येक सिख को गुरु नानक साहिब का बाबर के हमले के समय ज़ुल्म के खिलाफ परमात्मा को दिया गया उपालम्भ
ऐती मार पई करलाणे,
तैं की दरदु ना आया। (आसा म: 1, अंग : 360)
याद आ गया था।
नि:संदेह यह सच है कि भाजपा द्वारा 1 नवम्बर की ‘इंडिया’ गठबंधन की दिल्ली रैली पर आपत्ति उठाने के लिए इसे सिख कत्लेआम से जोड़ना बहुत सीमा तक राजनीति से प्रेरित है, क्योंकि पंजाब विधानसभा के चुनाव निकट हैं, परन्तु फिर भी यह एक अच्छी बात है कि इससे एक बार फिर यह कत्लेआम और अन्याय इस तरह देश एवं दुनिया में चर्चा का विषय बना गया है। भाजपा ने चंडीगढ़ में इस बारे ‘84 के ज़ख्म’ नामक विचार-चर्चा भी करवाई है। हालांकि यह सौ प्रतिशत सच है कि अधिकतर कांग्रेसी नेताओं ने ही इस कत्लेआम में खुल कर हिस्सा लिया था, परन्तु इसमें कुछ आर.एस.एस. के लोग भी आरोपियों के रूप में पहचाने गए थे। 42 वर्ष व्यतीत होने के बाद भी सिखों को न्याय नहीं मिला। और तो और, पूरी सच्चाई आज तक सामने नहीं आई। चाहे इसकी जांच के लिए 10 से अधिक आयोग एवं समितियां भी गठित की गईं। 650 मामलों में से सिर्फ 30 से 40 मामलों में ही सज़ाएं हुई हैं। लगभग 4000 हत्याओं में से सिर्फ 13 के भी फैसले हुए। ज़्यादातर मामले गवाहों के न होने एवं अन्य तकनीकी कारणों से बंद कर दिए गए। आरोप लगते हैं कि कई मामलों में हमारे अपने नेता और वकील भी मिलीभगत कर गए। दोषी पुलिस अधिकारियों को आम तौर पर कोई सज़ा नहीं मिली। नरेन्द्र मोदी सरकार को भी 12 वर्ष हो गए हैं। बेशक कुछ मामलों में न्याय मिला है, कुछ काम हुआ है, इसके लिए धन्यवाद। परन्तु यह सचमुच अपर्याप्त है। अब तो बहुत-से दोषी इस दुनिया से भी रुखस्त हो चुके हैं, गवाहियां गायब हैं। इसलिए अब तो एक ही रास्ता शेष दिखाई देता है कि दक्षिण अफ्रीका की भांति सिख कत्लेआम बारे में केन्द्र सरकार द्वारा एक निष्पक्ष ‘ट्रुथ एंड रिकंसीलिएशन कमिशन’ स्थापित किया जाए। यह ट्रुथ कमिशन सज़ा नहीं अपितु सच्चाई सामने लाने, दोषियों को बेनकाब करने तथा माफ करने के साथ-साथ पीड़ितों को उचित मुआवज़ा देने का काम करे। नि:संदेह सज़ा बिना न्याय अधूरा माना जाता है, परन्तु अब सज़ा किसे दोगे? इसलिए अच्छा होगा कि भारत सरकार एक ‘ट्रुथ कमिशन’ बनाए ताकि सच्चाई सामने आ सके और पीड़ितों को उचित मुआवज़ा तथा मानसिक रूप से भी शांति मिल सके, परन्तु इसके लिए ज़रूरी है कि हम बोलें, अकेले सिख नहीं, पंजाब तथा देश का प्रत्येक न्याय-पसंद व्यक्ति बोले ताकि हमारी आहों और चीखों का कुछ तो दिखाई दे।
ऐ ज़ुल्म के मारो लब खोलो, चुप रहने वालो चुप कब तक,
कुछ हश्र तो उनसे उठेगा कुछ दूर तो नाले जाएंगे।
(़फैज़ अहमद ़फैज़)
(हश्र : कयामत, नाले : चीख पुकार)
राहुल गांधी का पंजाब दौरा
राहुल गांधी ने भी पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए कांगे्रसी तैयारी का बिगुल बजा दिया है। उन्होंने इस अवसर पर 5 सूत्रीय एजेंडा भी पेश किया है, जिसमें कानून व्यवस्था एवं गैंगस्टरों के हमले, नशे की समस्या, किसानों को एमएसपी, उद्योग एवं रोज़गार के अतिरिक्त सरकार दिल्ली से नहीं, पंजाब से चलाने की बात की है, परन्तु उनका अधिक ज़ोर ‘आप’ पर हमला करने पर लगा हुआ था। नि:संदेह उन्होंने केन्द्र सरकार तथा भाजपा पर भी हमले किए, परन्तु उनका मुख्य लक्ष्य मुख्यमंत्री भगवंत मान, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह की छवि को धूमिल करने का दिखाई दिया। राहुल ने अपनी रैली संगरूर जो इस समय आम आदमी पार्टी का गढ़ माना जाता है, में करके यह संकेत दिया है कि उनके पहले निशाने पर ‘आप’ ही रहेगी। इस अवसर पर सिद्धू मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह को मंच पर लाकर श्री गांधी ने अमन-कानून एवं गैंगस्टरवाद को भी प्रमुख मुद्दा बनाने का यत्न किया है। उनका यह कहना वास्तव में बेहद प्रभावित करता है कि जब मैंने (राहुल ने) सबसे पहले पंजाब के युवाओं के नशे में लिप्त होने की बात उठाई थी तो कहा गया था कि यह पंजाब को बदनाम करने का यत्न है, परन्तु समय ने इसे सच सिद्ध किया है। राहुल ने सबसे बड़ा हमला मुख्यमंत्री मान पर किया और उनकी छवि को धूमिल करने का प्रयास शायद इसलिए भी किया है, क्योंकि आम आदमी पार्टी के पास पंजाब में भीड़ को इकट्ठा करने की सामर्थ्य वाला एकमात्र नेता भगवंत मान ही है। उन्होंने मान पर असफल एवं कमज़ोर नेता होने के आरोप लगाए, क्योंकि उनके अनुसार वह दिल्ली के इशारे पर ही काम करते हैं। यहां राहुल ने तीसरी बार फिर प्रधानमंत्री मोदी को खुली और सीधी बहस की चुनौती दी। समझा जाता है कि ऐसा करके राहुल अपना कद प्रधानमंत्री के समान करना चाहते हैं। याद रहे, जब 2009 के चुनावों के समय लाल कृष्ण अडवानी ने तथा 2013 में नरेन्द्र मोदी ने डा. मनमोहन सिंह को सीधी बहस की चुनौती दी थी तो 2009 में मनमोहन सिंह ने कहा था कि ऐसा करके अडवानी स्वयं को वैकल्पिक प्रधानमंत्री के रूप में पेश करना चाहते हैं और मैं उन्हें इसका अवसर क्यों दूं? इसलिए समझा जा सकता है कि 2014 में प्रधानमंत्री को स्वयं सीधी बहस की चुनौती देने वाले श्री मोदी भी राहुल की चुनौती स्वीकार नहीं करेंगे। वैसे अच्छा होता यदि श्री राहुल गांधी पंजाब की रैली में भाजपा के सिख विरोधी होने के आरोपों के जवाब में एक बार फिर खुल कर 1984 के सिख कत्लेआम पर अफसोस व्यक्त कर देते।
उनको क्या फिक्र कि मैं पार लगा या डूबा,
बहस करते रहे साहिल पे जो तूफानों की।
(अहमद नसीम कासमी)
ट्रम्प के अहंकार की हार
आप को आजिज़ी जिताएगी
वो तक्कबुर में हार जाएंगे। (ऱुखसार)
(आजिज़ी : नर्माई, बेवसी, तकब्बुर : अहंकार)
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी नीतियों को मध्यावधि चुनाव में एक परीक्षण की तरह पेश किया था, परन्तु परिणाम उनके बिल्कुल विपरीत आए हैं। ट्रम्प की पार्टी सीनेट, हाऊस आफ रिप्रीज़ैंटेटिव तथा गवर्नरों के चुनाव में भी डेमोक्रेट्स से हारी है। यह हार ट्रम्प की नीतियों और उनके अहंकार की है। आश्चर्य है कि ट्रम्प का यह अहंकार अभी भी कायम है। चाहे वह इस हार को ईरान युद्ध से जोड़ते हैं, परन्तु साथ ही यह भी कहते हैं कि यदि बैलेट पैपर पर वह (उनकी तस्वीर) होते तो बेमिसाल जीत मिलती। इसमें कोई संदेह नहीं कि अमरीका का ईरान से न जीतना और लम्बे समय तक युद्ध में फंस जाना, अमरीका की अपने मित्र देशों के प्रति बदली नीतियां और सबसे अधिक महंगाई की मार ही हार के बड़े कारण हैं, परन्तु इस हार को और बड़ा करने में भारतीय, पंजाबी और सिख मतदाताओं ने भी अपनी भूमिका निभाई है। एक सर्वेक्षण के अनुसार सिर्फ 19 प्रतिशत भारतीय अमरीकी मतदाताओं ने ही ट्रम्प की पार्टी को समर्थन दिया। ट्रम्प की एचबी-वीज़ा, इमीग्रेशन में बे-इन्तिहा सख्ती और भारतीय लोगों एवं अन्य अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण नीतियां भी भारतीय समुदाय को ट्रम्प की पार्टी से दूर करने का कारण बनीं। अमरीका में भारतीय अमरीकी आबादी लगभग 54 लाख है, जिसमें कैलिफोर्निया में 10 लाख से अधिक, टैक्सास में 7 लाख, न्यूजर्सी में 4.5 लाख, न्यूयार्क में 4 लाख, इलीनोइस में लगभग 3 लाख और वर्जीनिया, जार्जिया, पेन्सल्वीनिया, वाशिंगटन, मिशीगन आदि में लगभग 2-2 लाख भारतीय हैं। सिख और पंजाबी सबसे अधिक कैलिफोर्निया में रहते हैं। ट्रम्प की पार्टी इनमें से लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्रों में हारी है।
मिजाज़ में था तकब्बुर तो हरकतों में गरूर,
फिर ऐसे श़ख्स को हम भी सलाम क्या करते।
(रईस सिद्धीकी)
-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000



