क्या ट्रम्प की हार का भारत-अमरीका संबंधों पर प्रभाव पड़ेगा ?

अमरीका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्ज़ में 6 दिसम्बर, 2019 को डेमोक्रेटिक सदस्य प्रमिला जयापाल ने दोनों राजनीतिक दलों द्वारा समर्थित प्रस्ताव रखा, जिसमें भारत से आग्रह किया गया था कि जम्मू-कश्मीर में संचार पाबंदियां जल्द से जल्द हटायी जायें और सभी नागरिकों के लिए धार्मिक आज़ादी सुनिश्चित की जाये। भारत के आंतरिक मामलों में यह हस्तक्षेप नई दिल्ली को पसंद नहीं आयी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमरीका के कांग्रेस नेताओं से कैपिटल हिल पर अपनी निर्धारित बैठक रद्द कर दी, क्योंकि आयोजकों ने अमरीकी दल से जयापाल को हटाने से इंकार कर दिया था। जयापाल कट्टर प्रगतिशील हैं और वह नियमित भारत सरकार को ‘मानवाधिकार’ व ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ को घेरने का प्रयास करती रही हैं। अमरीका के मध्यावधि चुनाव में नीली सुनामी की वजह से डेमोक्रेटिक पार्टी ने दोनों सीनेट व हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्ज़ पर ऐतिहासिक नियंत्रण हासिल किया है और जयापाल व अन्य अनेक लोकतांत्रिक समाजवादियों ने डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए उन जगहों पर भी शानदार जीत दर्ज की है, जो दशकों से रिपब्लिकन पार्टी के मज़बूत लाल गढ़ बने हुए थे। 
दरअसल, यह सिर्फ डेमोक्रेटिक सुनामी नहीं है। यह अमरीका के वामपंथी इतिहास में सबसे बड़ा भूकम्प है, जिसे अधिकतर समीक्षक जाने या अनजाने में अनदेखा करने का प्रयास कर रहे हैं। अच्छी मात्रा में फेडरल व स्टेट स्तर पर प्रगतिशील नेताओं ने जीत दर्ज की है, जोकि अरबपतियों पर अधिक कर लगाने, सभी को मेडीकेयर उपलब्ध कराने, श्रमिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखने और इज़राइल के नस्लवाद, कब्ज़े व नरसंहार में अमरीकी सहयोग पर विराम लगाने के पक्ष में हैं। इन मुद्दों के अतिरिक्त इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ईरान पर थोपा गया बेमतलब का युद्ध भी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी की हार का बड़ा कारण रहा, जैसा कि उप-राष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा। युद्ध व टैरिफ की वजह से जो मंहगाई बढ़ी, उससे ट्रम्प ने बुज़ुर्ग श्वेतों व ग्रामीण मतदाताओं के अपने वफादार आधार को खोया। फिर मतदाता ट्रम्प की मनमानी व तानाशाही पर भी लगाम कसना चाहते थे। ट्रम्प के करीबियों में भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा रहा। 
हालांकि ट्रम्प के कार्यकाल में अभी दो वर्ष शेष हैं, लेकिन यह वास्तव में ट्रम्प व उनकी बेतुकी नीतियों की ही हार है। ट्रम्प ने कहा था कि मतदाता बैलेट पेपर पर प्रत्याशी को नहीं बल्कि उन्हें देखें। ट्रम्प ने अपने जितने भी करीबियों के लिए जमकर प्रचार किया, उन सभी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। 
अमरीकी कांग्रेस में जो नियंत्रण परिवर्तन हुआ है, वह वाशिंगटन के लिए महत्वपूर्ण पल है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि जयापाल व अन्य प्रगतिशीलों के बावजूद उसका प्रभाव भारत-अमरीकी संबंधों पर विघटनकारी की बजाय फिलहाल गूढ़ अधिक होगा। हालांकि ईरान ने जलजमरूमध्य में चीन, इराक व कतर के साथ भारत के व्यापारिक जहाज़ों पर से भी पाबंदी हटा ली है, लेकिन नई दिल्ली को सतर्क रहना चाहिए कि पश्चिम एशिया टकराव में अतिरिक्त जटिलता न आये। चूंकि विदेश नीति की कमान अब भी ट्रम्प के ही पास है, इसलिए अनुमान यह है कि मिडटर्म्स की शर्मनाक हार से उबरने के लिए ट्रम्प भारत से व्यापार समझौता जल्द करने का का प्रयास करेंगे, खासकर इसलिए भी कि रूस, चीन व ईरान के विरुद्ध उनकी विदेश नीति बुरी तरह से असफल रही है। ट्रम्प को भारत के साथ व्यापार समझौते के मोर्चे पर जल्द एक जीत चाहिए। 
जीत से ज्यादा हम हार से सीखते हैं। ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को यह बात जल्द समझ आ जानी चाहिए। 1974 के वाटरगेट चुनाव के बाद किसी भी मुख्य पार्टी के लिए मध्यावधि में यह सबसे निराशाजनक हार है। रिपब्लिकन कुलीनों को जानना चाहिए कि उनकी पार्टी को मागा-स्टाइल प्रोपेगंडा पॉलिटिक्स से छुटकारा पाने की ज़रूरत है। मसलन, हिस्पैनिक डेमोक्रेट्स के पास ट्रम्प के अवैध अप्रवासी क्रैकडाउन की वजह से वापस लौटे। वह युद्ध के भी खिलाफ थे और चाहते थे कि उनकी आर्थिक स्थिति में तेज़ी से सुधार आये। इन दोनों ही मोर्चों पर ट्रम्प नाकाम रहे। हिस्पैनिक वोटर्स, अनेक अश्वेत, नये व युवा कामकाजी वर्ग के मतदाता उनका साथ छोड़ गये। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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