नमोशीजनक हार
अमरीका में मध्यकालीन चुनावों का बहुत ही दिलचस्पी के साथ इंतजार किया जा रहा था। अब इसके परिणाम लगभग वही आए हैं, जिनकी उम्मीद की जा रही थी और बहुसंख्या में अमरीका और दुनिया के अन्य लोग भी ऐसा ही चाहते थे। चुनावों से पहले भी वहां विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षण करवाए गए, जिनसे यही प्रभाव मिलता था कि लोग अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कामकाज से असंतुष्ट हैं। ‘एसोसिएटड प्रैस’ के एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 10 में से 6 मतदाता ट्रम्प के कामकाज को उचित नहीं मानते थे। लगभग 70 प्रतिशत यह चाहते थे कि संसद को राष्ट्रपति की नीतियों को अनुशासन में लाना चाहिए और उन्हें संतुलित रखने का यत्न भी करना चाहिए। ट्रम्प देश के हितों से पहले अपने हितों को अधिक प्राथमिकता देते रहे हैं। सीनेट के परिणाम भी लगभग ऐसे ही आए हैं।
अमरीकी लोकतांत्रिक प्रणाली में भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली से अंतर है। यहां राष्ट्रपति स्वतंत्र रूप से चुने जाते हैं। उनके पद का अमरीकी संसद से सीधा कोई संबंध नहीं होता। यहां की संसद के दो सदन होते हैं, एक को ‘हाऊस ऑफ रिप्रीजैंटेटिव’ और दूसरे का नाम ‘सीनेट’ है। ‘हाऊस ऑफ रिप्रीज़ैंटेटिव’ के लिए राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों से चुनाव होते हैं। इसके कुल 435 सदस्य हैं और सीनेट में एक राज्य से दो सीनेटर चुने जाते हैं। अमरीका में 50 राज्य हैं। इसलिए सीनेट के कुल सदस्यों की संख्या भी 100 ही होती है। राष्ट्रपति आम चुनावों द्वारा प्रत्यक्ष रूप में 4 वर्ष के लिए जाना जाता है। यहां 2 वर्ष बाद संसद के मध्यकालीन चुनाव होते हैं। चुने हुए सदस्य इन दोनों सदनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प रिपब्लिकन पार्टी से संबंधित हैं। चुनावों से पहले दोनों ही सदनों में रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों का बहुमत था। चाहे इनका आपसी अंतर बहुत कम था। इस बार प्रतिनिधि सभा (हाऊस ऑफ रिप्रीजैंटेटिव) की 435 और सीनेट की 100 में से 35 सीटों के लिए चुनाव हुए थे। चाहे इन चुनावों का राष्ट्रपति प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा नहीं होते, परन्तु इन मध्यकालीन चुनावों को आम रूप से राष्ट्रपति की कार्यशैली के साथ ही जोड़ कर देखा जाता है। इन चुनावों में टैरिफ, ईरान युद्ध और महंगाई मुख्य मुद्दा थे।
विपक्षी डैमोक्रेटिक ने ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को हरा कर उनकी नीतियों के विरोध पर अपनी मोहर लगाई है। इससे पहले भी ट्रम्प जनवरी, 2017 में 4 वर्ष के लिए राष्ट्रपति चुने गए थे, परन्तु उस समय भी उनकी असंतुलित और मनमज़र्ी की नीतियों के कारण उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था। यहां तक कि वर्ष 2019 और 2021 में उन पर महाभियोग के तहत मुकद्दमे भी चले थे। अमरीका में राष्ट्रपति पर ऐसे मुकद्दमे चलने की वहां के सैकड़ों वर्षों के लोकतांत्रिक इतिहास में बहुत कम उदाहरण हैं। उस समय उन्हें इन मामलों से राहत ज़रूर मिल गई थी, परन्तु एक अंतराल के बाद उनका पुन: राष्ट्रपति चुना जाना ज़रूर आश्चर्यजनक था, परन्तु दो वर्षों में ही लोगों का मोह उनसे भंग हो गया प्रतीत होता है। इन परिणामों से चाहे ट्रम्प अगले दो वर्षों के लिए राष्ट्रपति तो बने रहेंगे परन्तु सीनेट और प्रतिनिधि सभा में उनकी पार्टी की सीटें कम होने से उनकी शक्तियां भी कम हो जाएंगी। उनकी आर्थिक नीतियों पर एक तरह से लगाम लग जाएगी, क्योंकि उनकी ओर से किए गए प्रत्येक वित्तीय फैसले की दोनों सदनों, अभिप्राय कांग्रेस से स्वीकृति लेनी पड़ेगी, जो इस हालत में बेहद कठिन होगी।
नई कांग्रेस जनवरी महीने से काम सम्भालेगी। उसके बाद ट्रम्प के पिछले दो वर्षों के शासन को भी आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाएगा। यहां तक कि उनकी ओर से विभिन्न पदों के लिए किए गए चयन पर भी सवाल उठाये जा सकते हैं। बराक ओबामा जो अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति हैं, के काम की अब तक प्रशंसा की जाती रही है। उन्होंने भी अपनी डैमोक्रेटिक पार्टी की ओर से ट्रम्प की नीतियों पर सवाल उठाए थे। ओबामा ने इस जनादेश के बाद कहा है कि विभाजित करने वाली राजनीति हार गई है और जोड़ने वाले जीते हैं। कम से कम ट्रम्प अब अगले दो वर्ष सहमति से ही फैसले ले सकेंगे।
अमरीका आज एक महा-शक्ति है। इसके फैसलों का विश्व भर पर प्रभाव पड़ता है। टैरिफ के मामलों पर ट्रम्प ने विश्व भर के देशों को चिंता में डाले रखा है। ईरान के साथ छेड़े युद्ध में उन्होंने ईरान सहित मध्यपूर्व का ही नहीं, अपितु विश्व भर का और अपने देश का भी भारी नुकसान किया है। इस कारण जहां तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, वहीं व्यापक स्तर पर महंगाई भी बढ़ी है। अमरीका पर भी इसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है। एक बार तो ट्रम्प की पार्टी की इस हार ने विश्व भर को राहत दी है। चाहे वह अभी अपने पद पर बने रहेंगे, परन्तु उनकी शक्तियों के कम होने से इसे नमोशीजनक हार ही कहा जाएगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

