लोगों को नहीं मिल रहा जन औषधि योजना का लाभ
केन्द्र सरकार द्वारा 2015-16 में शुरू की गयी प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (पीएमबीजेपी) के तहत जन औषधि योजना लागू की और उसके बाद चालू कर दी अपने नारे ‘सभी के लिए सस्ती दवा’ की मार्केटिंग। लेकिन ज़मीनी स्तर पर दवा कंपनियों और अस्पतालों को बहुत ज़्यादा और अवहनीय कीमतें वसूलने से नहीं रोका जा सका, जिसे सर्वोच्च न्यायलयकी एक पीठ ने ज़बरदस्ती वसूली और लूट कहा। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता वाली पीठ ने 27 अक्तूबर, 2026 को केन्द्र की दवा मूल्य नीति और एनपीपीए के कामकाज पर सवाल उठाए और दवा की खरीद की कीमतों और मरीज़ों से मांगी गई रकम के बीच चौंकाने वाले अंतर को सामने लाया गया।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कैंसर इंजेक्शन के कुछ उदाहरणों पर सवाल उठाए, जो एक डिस्ट्रीब्यूटर को लगभग 11, 000 रुपये में मिल रहा था, लेकिन एक अस्पताल ने उसके लिए 1.30 लाख रुपये लिए। कोर्ट ने एक सलाइनड्रिप लाइन पर भी सवाल उठाया, जो कथित तौर पर 15 रुपये में खरीदी गई थी, लेकिन उसका बिल 250 रुपये आया। जस्टिस संदीप मेहता ने पूछा, ‘क्या आप कृपा करके इस लूट का कोई कारण बता सकते हैं?’ ये कोई मामूली बातें नहीं थीं। ये उन लोगों के शोषण के बारे में सवाल थे जिनके पास अक्सर उन्हें दी गई दवाएं खरीदने के अलावा कोई सही विकल्प नहीं होता। इस कार्रवाई ने एक असहज सच्चाई को सामने लाया कि भारत के दवा-कीमत प्रणाली ने मरीज़ों को शोषणकारी कीमतों और लाभ मार्जिन से ठीक से नहीं बचाया है।
एक सरकार जो सस्ती दवाओं का दावा करती है, जबकि मरीज़ों को दवाओं की आसमान छूती कीमतें चुकानी पड़ती है। कम कीमत वाली दवा की दुकानें खोलना शोषण करने वाले दवा बाजार को नियंत्रित करने का विकल्प नहीं है।
मोदी सरकार ने पीएमबीजेपी के तहत जन औषधि योजना को एक बड़े जन-कल्याण वाले काम के तौर पर पेश किया। सरकार ने यह योजना यह कह कर शुरू की थी कि आम लोग इन विक्रय केन्दों से अच्छी गुणवत्ता की जेनेरिक दवाएं काफी कम कीमत पर खरीद पाएंगे। दिसम्बर 2025 तक सरकार ने 17,990 जन औषधि केन्द्र खोल भी दिए थे। सरकार सिर्फ जन औषधि केन्द्रों की गिनती करके सफलता का दावा नहीं कर सकती जबकि कैंसर, दिल की बीमारी, डायबिटीज़ और अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीज़ महंगी दवाओं के खर्च से जूझ रहे हैं। मरीज़ को डॉक्टर की लिखी दवा की ज़रूरत होती है। अगर वह सस्ती नहीं होती, तो इलाज रुक जाता है, देर हो जाती है या छोड़ दिया जाता है। उस मरीज़ के लिए महंगी दवा खरीदना मजबूरी हो जाती है। यह सही है कि जन औषधि से अनेक मरीज़ों को लाभ हुआ है। अगर किसी मरीज़ को जन औषधि केन्द्र पर कोई खास दवा नहीं मिलती, तो उसे बड़े दवा बाज़ार की कीमतों का सामना करना पड़ता है। सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि सरकार खुद ही कीमतों के नियम की हद तय करती है। भारत में ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 के तहत एक ड्रग-प्राइस रेगुलेटरी फ्रेमवर्क है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) इस प्रणाली के ज़रूरी पहलुओं को लागू करने के लिए ज़िम्मेदार है।
फिर भी सूचीबद्ध और असूचीबद्ध दवाओं के बीच के अंतर ने बाज़ार के बड़े हिस्से को सख्त मूल्य निर्धारण प्रणाली से बाहर रखा है। सरकार के पास जनहित में दखल देने की शक्ति है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद सरकार ने कैंसर की कुछ दवाओं के मामले में अपनी इस शक्ति का इस्तेमाल भी किया है। हालांकि, कई दवाओं की कीमतों को नहीं छुआ गया है, और बहुत-सी दवाएं अभी भी आम लोगों की पहुंच से बाहर हैं। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में यह तर्क दिया है कि उसकी मूल्य नीति नवाचार, प्रतिस्पर्धा, दवा उद्योग में निवेश और उद्योग के विकास को बढ़ावा देने में सहयोगी है, लेकिन इनमें से कोई भी तर्क इस ज़िम्मेदारी से बचने का आधार नहीं हो सकता कि जीवन रक्षक दवाएं आम लोगों के लिए किफायती बनी रहें। (संवाद)



