आर्थिक मंदी और जय शाह के मामले से परेशान है संघ


इस समय देश और पंजाब की राजनीति और राजनीतिक घटनाओं पर सवालों से ज्यादा आर्थिक सवाल छाए हुए हैं। असल में राजनीतिक नेताओं और पार्टियों ने जनता को किसी भी तरह के भ्रम देकर और बड़े-बड़े वायदे दिखा कर सिर्फ चुनाव जीतने को ही अपना निशाना बना लिया है। हालात यह है कि जनता भी बिना यह सोचे कि यह वायदे कब और कैसे पूरे किए जा सकते हैं, सिर्फ उस पार्टी को ही जिता देती है, जो पार्टी ज्यादा बड़े वायदे और बड़े लालच देती है, लेकिन जीतने के बाद जनता को उन वायदों की पूर्ति  की आशा होती है, जिनकी पूर्ति मौजूदा साधनों से सम्भव भी नहीं होती। 
एक ओर पंजाब सरकार चाहे अढ़ाई एकड़ और पांच एकड़ ज़मीन से कम वाले किसानों के ऋण माफ करने की कोशिश करती नज़र आ रही है। चाहे यह भी वायदा था कि हर किसान का ऋण माफ कर दिया जायेगा, लेकिन बाकी वायदों की पूर्ति के तो अब कोई आसार भी नज़र नहीं आ रहे। पंजाब सरकार का खज़ाना खाली है और केन्द्र की तरफ से और कज़र्ा मिलने के आसार भी नज़र नहीं आ रहे, तो वित्त संबंधी वायदे कहां से पूरे होंगे? दूसरी ओर चाहे केन्द्र सरकार के पास पैसों की कमी नहीं, लेकिन केन्द्र सरकार भी इस समय आर्थिक प्रश्नों के घेरे में घिरी नज़र आ रही है। देश की उत्पादन दर नीचे जा रही है। सरकार नोटबंदी और जी.एस.टी. के मामले पर पार्टी के अंदरूनी और बाहरी विरोधियों के ही निशाने पर नहीं आ गई, बल्कि ऐसी सूचनाएं भी हैं कि भाजपा को सत्ता में लाने के लिए रणनीति बनाने वाला संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.) भी केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर चिंता में है। इस संबंध में आर.एस.एस. प्रमुख श्री मोहन बागवत भी परेशान बताए जाते हैं। एक ओर वह मोदी सरकार की ओर से उठाए आर्थिक कदमों के परिणामों से परेशान हैं और दूसरी ओर भाजपा के राष्ट्रीय प्रधान श्री अमित शाह के बेटे जय शाह पर लगे आरोपों से भी परेशान बताए जा रहे हैं। जानकार क्षेत्रों में चर्चा है कि यही कारण है कि अभी 6 अक्तूबर को दिल्ली का दौरा करके गए श्री भागवत स्थिति पर विचार-विमर्श करने के लिए फिर से दिल्ली आ रहे हैं। आर.एस.एस. श्री शाह के मामले में कितना परेशान है, इसका अंदाज़ा तो इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जिस समय श्री जय शाह के मामले पर विरोधियों का मुंह बंद करवाने के लिए हर नाकाम कोशिश की जा रही है। उस समय ही आर.एस.एस. के सह-कार्यकर्त्ता के बड़े पद पर विराजमान श्री दत्ता क्षेय हसबोले ने कहा है कि श्री अमित शाह के बेटे जय शाह के खिलाफ अगर कोई मामला बनता है तो इसकी जांच होनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि  जय के इस मामले की रिपोर्ट छापने वाली वैबसाइट पर 100 करोड़ रुपए के हज़र्ाने का दावा भी ठोक दिया है और देश के न्यूज़ चैनलों पर इस मामले की ज्यादा चर्चा होने को रोकने की मंशा पर भाजपा के अधिकारियों को इस मामले में किसी भी बहस में शामिल होने से रोक दिया गया है। अगर समझा जाए तो यह टीवी चैनलों को एक इशारा है कि इस मामले पर बहस न की जाए। लेकिन समझा जा रहा है कि गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनावों के  समय लोगों में फैली आर्थिक बेचैनी, व्यापार के मंदे हालात और गुजरात के निवासी भाजपा के राष्ट्रीय प्रधान के बेटे पर उंगली उठाना आर.एस.एस. के लिए बड़ी चिंता का कारण तो होगा ही।
अब बढ़ेगा दबाव
पंजाब मंत्रिमंडल में वृद्धि जो गुरदासपुर लोकसभा के उप-चुनाव के बहाने रुका हुआ था, के बारे चर्चा अब फिर शुरू हो गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अब मंत्री बनने के चाहवान फिर से मंत्रिमंडल में बढ़ौत्तरी के लिए दबाव बनाना शुरू करेंगे। इस के साथ ही लोकसभा उप-चुनाव के दौरान पूर्व मंत्री स. बिक्रम सिंह मजीठिया की ओर से अपनाए तीखे तेवरों से भी कुछ कांग्रेसी विधायक काफी मुश्किल में बताए जा रहे हैं, जबकि स्व. मुख्यमंत्री बेअन्त सिंह के विधायक के पौत्रे  के खिलाफ राष्ट्रीय महिला कमिशन की ओर से केतिया कांड 23 वर्षों के बाद दोबारा खोलने के लिए अकाली दल की ओर से करवाई शिकायत को भी 41 कांग्रेसी विधायकों की ओर से मुख्यमंत्री को श्री मजीठिया के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए लिखा पत्र भी साथ ही जोड़ कर देखा जा रहा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अब कुछ कांग्रेसी संगठनों की ओर से 3 से 4 दर्जन कांग्रेसी विधायकों को इकट्ठा करके मुख्यमंत्री से मिलने का कार्यक्रम बनाया जा रहा है। 
यह विधायक श्री मजीठिया के विरुद्ध कारवाई की मांग करेंगे। हमारी जानकारी के अनुसार गुरदासपुर के उप-चुनाव के परिणाम के बाद जल्द ही कार्पोरेशन चुनावों की घोषणा हो सकती है, जिसके कारण पंजाब मंत्रिमंडल में बढ़ौत्तरी का मामला एक बार फिर लटक सकता है। हालांकि मंत्री बनने के चाहवान की हर सम्भव कोशिश रहेगी कि कार्पोरेशन चुनाव से पहले ही दीवाली के आस-पास वह मंत्री बन जाए।
अकाली दल की रणनीति
अब जब गुरदासपुर लोकसभा के उप-चुनाव में मतदान प्रक्रिया पूरी हो चुकी है तो राजनीतिक दलों से यह सवाल बड़ी शिद्दत के साथ पूछा जा रहा है कि इस चुनाव में लड़ तो भाजपा उम्मीदवार रहा था, पर फिर भी जब भाजपा का कोई राष्ट्रीय नेता चुनाव का प्रचार करने के लिए नहीं आया तो अकाली दल के प्रधान स. सुखबीर सिंह बादल और पूर्व मंत्री स. बिक्रम सिंह मजीठिया ने इस चुनाव में अपनी सारी ताकत क्यों लगा दी? जानकार सूत्रों का कहना है कि इसके पीछे अकाली दल की दोहरी रणनीति काम कर रही थी। 
पहले तो यह कि विधानसभा चुनाव में हुई बड़ी हार के कारण माझा में अकाली दल की स्थिति डावांडोल हो चुकी थी, इसलिए अगर अकाली दल इस समय होशियारी से लड़ाई न लड़ता तो उसका आधार पूरी तरह डगमगा सकता था। इसी तरह इस चुनाव में खुद सरगर्म रहकर स. सुखबीर सिंह बादल और स. मजीठिया ने अपनी पार्टी के कैडर को निराश होने व टूटने से और कांग्रेस में जाने से बचाने का काम किया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार दूसरा निशाना दूर की राजनीति है। यह पहली बार है कि अकाली दल के प्रधान ने भाजपा के साथ गठबंधन होने के बाद भाजपा प्रभाव वाले भोआ, सुजानपुर और पठानकोट विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रचार किया है। समझा जाता है कि इन क्षेत्रों में अकाली दल की सीधी पकड़ बनाने का एक मौका समझ कर ऐसा किया गया है, क्योंकि बेशक अकाली-भाजपा गठबंधन में अभी कोई झगड़े नहीं हैं, लेकिन ऐसे संकेत तो मिलते ही रहते हैं कि भाजपा किसी समय आर.एस.एस. के इशारों पर और अकाली दल से अलग होने का फैसला कर सकती है। गौरतलब है कि आर.एस.एस. के कई नेताओं की ओर से तो विधानसभा चुनावों से पहले भी अकाली दल से अलग होकर चुनाव लड़ने के चर्चे सुनाई दे रहे हैं।
अकाली-भाजपा का नया कारण?
हालांकि अभी तो अकाली-भाजपा गठबंधन में कोई सीधा टकराव नहीं है, लेकिन ऐसे संकेत तो मिलते ही रहते हैं कि अकाली दल तो भाजपा के बिना सांस भी नहीं लेती पर भाजपा हाईकमान अकाली दल को अब कोई बहुत अहमियत नहीं देती। इसी दौरान आर.एस.एस. की सिख शाखा ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ बिना अकाली दल की लीडरशिप को विश्वास में लिए, सिखों में अपनी सीधी पैंठ बनाने की कोशिशों में लगी है। लेकिन अब तो भाजपा के सिख सैल ने सरेआम अकाली दल से गुरुद्वारा प्रबंधन में भाजपा में शामिल सिखों को प्रतिनिधित्व देने की मांग करके अकाली दल के लिए एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। भाजपा के सिख सैल के नेता स. कुलदीप सिंह ने मांग की है कि जब हम अकाली दल के साथ मिलकर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव लड़ते हैं तो गुरुद्वारा चुनाव क्यों नहीं? 
उन्होंने कहा कि हम सिख हैं, हम क्यों नहीं शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी या दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी के सदस्य बन सकते? जाहिर है कि इस मांग का समर्थन भाजपा के राष्ट्रीय सचिव स. आर.पी. सिंह ने भी किया है। उन्होंने कहा कि अगर दोनों पार्टियां बाकी चुनाव मिलकर लड़ती हैं तो गुरुद्वारा चुनाव मिलकर लड़ने में क्या गलत है? हालांकि दिल्ली सखि गुरुद्वारा कमेटी के प्रधान स. मनजीत  सिंह जी.के. ने इसका सख्त विरोध किया है और कहा है कि गुरुद्वारा  प्रबंध सिखों का धार्मिक मामला है। हम इसमें किसी को शामिल नहीं होने देंगे। लेकिन इसके बारे में अकाली दल के प्रधान स. सुखबीर सिंह बादल और पूर्व मुख्यमंत्री स. प्रकाश सिंह बादल का क्या स्टैंड होता है, यह देखने वाली बात है। इसी दौरान यह भी नोटिस करने वाली बात है कि राष्ट्रीय सिख संगत की ओर से कुछ समय पहले की गई शिरोमणि कमेटी का हिसाब-किताब एडिट करवाए जाने की मांग ने भी अकाली दल के लिए कई प्रश्न खड़े किए हैं।

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