जाली नशा छुड़ाओ केन्द्रों का पर्दाफाश


पंजाब द्वारा नशे की भीषण मार झेले जाने के बाद, अब उसे नशे के एक और प्रहार यानि नशे के उपचार में भी नशीले पदार्थों के कारोबार का सामना करना पड़ रहा है। यह प्रहार असल में दो-धारी तलवार की तरह पड़ रहा है। इससे एक ओर नशीले पदार्थों के विरुद्ध अभियान के तहत नशा-विरोधी अर्थात नशा छुड़ाओ केन्द्रों के रूप में स्वार्थ के धरातल पर पनप रहे नशे के एक नये कारोबार की प्रेत-छाया निरन्तर विकराल होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर नशे से बचाने की आड़ में युवाओं को उत्पीड़ित एवं प्रताड़ित करने का सिलसिला शुरू किया गया है। प्रदेश में एक समय जब नशीले पदार्थों के सेवन और कारोबार ने पंजाबी शूरवीरता की पहचान युवाओं को धीरे-धीरे मृत्यु की ओर ले जाने वाले लज्जा और अपमान के कंटीले पथ पर डाल दिया था, ऐसे में आम लोगों और खास तौर पर प्रदेश का हित-चिन्तन करने वालों ने बार-बार ऐसे प्रयासों और प्रयत्नों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था, जहां से अपनी युवा शक्ति को साबुत-सूरत वापिस हासिल किया जा सके। उसी दौर में पंजाब में कई जगह खुले थे नशा छुड़ाओ केन्द्र। चूंकि यह तरीका प्रदेश की तब एक मौलिक ज़रूरत था, अत: वैध-अवैध ढंग से बने इन केन्द्रों को सरकार, प्रशासन एवं समाज का मूक समर्थन स्वत: हासिल होते चला गया। परन्तु धीरे-धीरे वरदान की धरा पर उपजा यह पौधा अभिशाप के एक ऐसे कैक्टस के रूप में बड़ा होने लगा, जिसकी न छांव थी, न इसकी किसी शाख पर कोई हरियावल पत्ता अथवा फूल दिखा था। आज स्थिति यह है कि प्रदेश के अनेक जिलों में कई जगहों पर नशा छुड़ाओ केन्द्र के नाम पर ऐसे यातना गृह खुल गये हैं, जिनके भीतर न केवल नशे और नशीले पदार्थों का एक भिन्न तरह का कारोबार होता है, अपितु इनके भीतर दाखिल सैकड़ों युवाओं को अत्याचार और उत्पीड़न का नारकीय जीवन जीने को विवश किया जाता है। इन केन्द्रों के भीतर किस प्रकार का अनाचार पनप चुका है, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है, कि नशा छुड़ाने वाली दवाओं में ही नशीले पदार्थों की अतिरिक्त एवं अधिक मात्रा डाल दी जाती है, जिससे प्रभावित युवक एक नई प्रकार के नशे का शिकार होने लगते हैं। ऊपर से वे बेशक थोड़ा-थोड़ा ठीक होते भी दिखने लगते हैं। इससे उनके घर वाले आशान्वित होकर न केवल अतिरिक्त पैसे देने को तैयार हो जाते हैं अपितु अपने बच्चों की नियति से भी अनभिज्ञ रहते हैं। इन यातना-गृहों के भीतर की दास्तान यह थी, कि ये लाखों रुपयों की अतिरिक्त आय के केन्द्र तो थे ही, इन में रहने वाले लोगों को कैदियों से बदतर तरीके से ज़ंजीरों से बांध कर रखा जाता। उनसे निर्ममतापूर्वक पट्टों-बैल्टों से मार-पीट की जाती और फिर उन्हें नशीले पदार्थ खिला कर उनसे पशुओं की तरह काम लिया जाता। इस मार-पीट से कइयों की हड्डियां टूट गईं और कई पागलपन की हद तक धकेल दिए गये। पंजाब में कई प्रकार के जागृति अभियान और सामाजिक जागरूकता से नशीले कारोबार और नशे के सेवन में कमी तो थोड़ी-बहुत आई है। इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि युवाओं के भीतर स्वयं को इस नाग-पाश से मुक्त होने की आस की जागृति भी उपजी है। अत; सामाजिक एवं प्रशासनिक धरातल पर नशा छुड़ाओ केन्द्रों की उपयोगिता भी है और ज़रूरत भी है, परन्तु ये केन्द्र सरकार एवं प्रशासन की नज़र और उसके संरक्षण में होने चाहिएं। ऐसे नशा केन्द्रों की नियमित रूप से दैनिक जांच भी होती रहनी चाहिए, अन्यथा इनका हाल भी कुछ कथित नारी सुधार गृहों की भांति हो सकता है जहां उपचार की बजाय दुराचार पनपने लगा था। नि:संदेह वैध मान्यता-प्राप्त और कुछ ईमानदार एवं प्रतिबद्ध संगठनों और लोगों द्वारा चलाये जा रहे ऐसे केन्द्रों ने समाज की अच्छी सेवा की है। इन्होंने कुछ अच्छे परिणाम भी दिये हैं। यह भी, कि समाज के एक बड़े हिस्से पर उग आए इस नासूर पर नश्तर चलाने के लिए ऐसे वैध केन्द्रों की अभी ज़रूरत भी है, परन्तु इन अवैध यातना-केन्द्रों और इनके मालिकों/संरक्षकों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई किये जाने की बड़ी ज़रूरत भी है। पहले रोपड़ और अब अमृतसर में ऐसे जाली नशा छुड़ाओ केन्द्रों का पर्दाफाश हुआ, तो कई निर्दोष युवा नशेड़ी होने एवं गुलामी का अभिशाप ढोने से बच भी गए हैं। इस प्रकार के और भी कई केन्द्र पंजाब में हो सकते हैं जो युवाओं को ज़िन्दगी का वरदान देने की बजाय नशे की दलदल में और गहरे तक धकेलने का कारण बन रहे हैं। ऐसे केन्द्रों के विरुद्ध बाकायदा जांच-पड़ताल का एक व्यापक अभियान चलाया जाना चाहिए। ऐसा कोई अभियान जितनी शीघ्र चलाया जाएगा, पंजाब और पंजाब के लोगों खासकर युवाओं के उतना ही हित में होगा।