डेरा प्रमुख फिर कानूनी शिकंजे में


अंतत: 16 वर्ष बाद एक बार फिर गुरमीत राम रहीम कानून के शिकंजे में बुरी तरह फंस गए हैं। विशेष अदालत ने उसको तथा उसके साथियों को एक पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में दोषी करार दे दिया है। गुरमीत राम रहीम के सिरसा के अलावा पंजाब और हरियाणा में अनेक स्थानों पर अनेकों डेरे थे। उसके बड़ी संख्या में लोग श्रद्धालु भी थे। इस क्षेत्र में बड़े राजनीतिज्ञों के अलावा उसको हर क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्ति आकर नमस्कार ही नहीं, अपितु उसकी दण्डवत वंदना भी करते थे। हर पक्ष से इतने सक्षम व्यक्ति का उस समय कुछ भी बिगाड़ पाना बेहद मुश्किल प्रतीत होता था। जब अक्तूबर 2002 में डेरे के दो श्रद्धालुओं ने छत्रपति को गोलियां मारी थीं। कुछ दिनों बाद उसकी मौत हो गई थी। चाहे उस समय भी यह बात किसी से छिपी नहीं थी परन्तु इतने बड़े डेरे के प्रमुख को हाथ डाल सकना मुश्किल था। इसलिए जब वर्ष 2003 में इस हत्या संबंधी रिपोर्ट लिखी गई तो उसमें राम रहीम का नाम शामिल नहीं था। बाद में डेरे के प्रमुख के ड्राईवर खट्टा सिंह के बयानों के आधार पर राम रहीम का नाम तो रिपोर्ट में शामिल कर लिया गया था परन्तु उस समय भी किसी को ख्याल नहीं था कि वह इस तरह शिकंजे में फंस जायेगा। केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सी.बी.आई.) ने इस केस की लम्बे समय तक और हर पक्ष से जांच-पड़ताल की। दोनों तरफ से दर्जनों ही गवाह पेश किए गए परन्तु अंतत: सत्य सामने आ ही गया। इस केस का आधार डेरे में सेवा करती सैकड़ों साध्वियों में से दो साध्वियों द्वारा राम रहीम पर दुष्कर्म करने के दोषों संबंधी विस्तार वाली चिट्ठी बनी थी, जिसको इन साध्वियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री और उच्च अदालतों को भेजा था। पंजाब तथा हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने तौर पर ही इसका नोटिस लेते हुए यह केस सी.बी.आई. को सौंप दिया था। छत्रपति ने अपने अखबार ‘पूरा सच’ में इस अज्ञात चिट्ठी को पूरे विस्तार से छाप दिया था, जिसके बाद उसको धमकियां मिलीं और उसको मौत के घाट उतार दिया गया। साध्वियों के दुष्कर्म के दोष में डेरा प्रमुख पहले ही 20 वर्ष की सज़ा काट रहा है। उपरोक्त हत्या केस के अलावा उस पर कई अन्य केस भी चल रहे हैं। इस बड़े घटनाक्रम ने एक बार तो उनके लाखों श्रद्धालुओं के दिल तोड़ दिए हैं, जो दिन-रात डेरा प्रमुख की श्रद्धा में लीन रहते थे। ऐसे श्रद्धालुओं ने उसको उस ऊंचे स्थान पर पहुंचा दिया था जहां बैठकर वह दुनिया भर का ऐशो-आराम कर सकता था (जिसका विस्तार गत दिनों सामने आता रहा है) और इस ऊंचाई पर पहुंच कर उसको दुनिया भूल गई प्रतीत होती थी। यह एक डेरे की बात नहीं है। आज भी देश भर में हज़ारों ही साधुओं-संतों के ऐसे डेरे हैं, जो श्रद्धालुओं को अंध-विश्वास की दुनिया में धकेल रहे हैं, जो उनको अनापेक्षित मुक्ति के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं और उनकी अंध-विश्वासी भावनाओं का पूरा लाभ ले रहे हैं। गत दिनों इनमें से कुछ बड़े डेरों के फैलाए पाखंड भी सामने आते रहे हैं। परन्तु इसके बावजूद आज हम देश के करोड़ों लोगों को ऐसे अंध-विश्वास के चक्कर में भटकते देख रहे हैं। इस चक्कर ने मानवीय दिमाग का चलना एक तरह से बंद ही कर दिया है और उनको चौरासी के चक्कर में डाल दिया है। आज विज्ञान और कम्प्यूटर का युग है। वैज्ञानिकों ने प्रकृति के अथाह छिपे रहस्यों का पता लगा लिया है। यहां तक कि उन्होंने यह भी साबित कर दिया है कि सृष्टि के अस्तित्व के समय के करोड़ों वर्षों के समय के बहाव से कैसे अस्तित्व में आई और यह भी कि यह किसी द्वारा रची नहीं गई, अपितु लम्बी प्रक्रिया के बाद यह स्थूल रूप में सामने आई है। परन्तु आज भी हम अंध-विश्वास की अंधेरी गलियों में पूरी तरह गुम होकर रह गए हैं। आज भी हम असंख्य परछाइयों को पकड़ने का प्रयास कर रहे हैं। नि:संदेह समय के बीतने से अरबों-खरबों की संख्या में लोग इन अंधेरी गलियों में गुम हो जाते रहे हैं और गुम होते जा रहे हैं। उनके मार्गदर्शक मौज भरी ज़िंदगी जीते-बिताते रहे हैं और बिता रहे हैं। सोये हुए मानवीय मन की नींद कब खुलेगी, इस संबंध में सुनिश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। चाहे समय-समय पर ऐसे बाबाओं को जितनी मज़र्ी बड़ी सज़ाएं भी भुगतनी क्यों न पड़ रही हों।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द