प्रकृति की अद्वितीय धरोहर है मणि महेश


प्रकृति की अद्वितीय धरोहर है मणि महेश। नाम से ही हमें पता चलता है, यह महादेव का प्राचीन स्थान है। शांति एवं मनभावन पर्यावरण को खोजने के लिए पर्यटक व्याकुल रहते हैं लेकिन जब पर्यटक को यहां की अनुपम पर्वतीय शीतलता का अहसास होता है तो वह अभिभूत हो जाता है।व्यक्ति के हृदय को प्रकृति के सौन्दर्य से स्पर्श करता है मणि महेश। इसकी तुलना मां और पुत्र से भी की जा सकती है। जैसे कोई मां अपने पुत्र को गोद में लेकर सहला रही हो, उसी प्रकार मणि महेश की प्रकृति एवं उसकी शीतल छाया प्राणी को अपना क्लांत सिर उसकी गोद में रखकर निद्रा में लीन होने को विवश करती है जो उसे इस आंचल के अतिरिक्त अन्यत्र नहीं मिलेगी। यहां का शांत, सुंदर और स्तब्ध कर देने वाला वातावरण व्यक्ति को मानसिक सुख प्रदान करता है। लोक मान्यता के अनुसार भक्ति स्थल होने के कारण जो भी श्रद्धालु अपनी पूरी श्रद्धा से मन्नत द्वारा वर मांगता है, भगवान शिव उसकी मनोकामना को अवश्य पूर्ण करते हैं। श्रद्धालुओं की शक्ति और पूर्ण श्रद्धा के प्रतीक हैं मणि महेश में शिव जी की प्रतिमा पर चढ़े हुए ढेरों त्रिशूल, छत्र और स्तम्भ से बंधे धागे। एक पौराणिक कथा के अनुसार पार्वती के पिता द्वारा यज्ञ में शिव को आमंत्रित न करने के बावजूद देवी पार्वती यज्ञ में जा पहुंचीं। इस बीच अपने पति का अपमान सहन न कर पाने पर पार्वती अग्निकुण्ड में कूद पड़ीं। शिवजी को इस घटना का पता चला तो वह क्रोध में तांडव करने लगे। व्यापक विनाश की आशंका को भांप कर विष्णु जी ने अपने चक्र से मां पार्वती की देह को अंग-भंग कर दिया। इस कारण मां पार्वती के देहावशेष चारों ओर हिमालय में अलग-अलग स्थानों पर बिखर गए। मणि महेश में देवी पार्वती की मंगल नाभि गिरी बताई जाती है। मणि महेश पहुंचने के लिए पर्यटक चम्बा से अपनी यात्रा प्रारंभ करते हैं। चम्बा इस क्षेत्र से 70 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। हडसर से 13 कि.मी. की खड़ी चढ़ाई पार करके भी मणि महेश पहुंचा जा सकता है, जहां पर देवदार तथा जंगली वृक्षों, बूटियों के घने जंगलों को पार करना पड़ता है। इन जंगलों में भालू और तेंदुये पाये जाते हैं। साथ ही, मार्ग में कलरव करती बहती है रावी नदी जो कहीं-कहीं ग्लेशियर के टुकड़ों के भीतर या नीचे से बहती प्रतीत होती है। राधा अष्टमी से तकरीबन एक मास पूर्व यहां सजावट शुरू हो जाती है। राधा अष्टमी पर यहां उत्सव का आयोजन भी किया जाता है।
 लगभग दो कि.मी. चलकर चढ़ाई पूरी कर कर ली जाती है। हालांकि यह काफी कठिन है लेकिन इसका अपना प्राकृतिक सौंदर्य है। जंगली बूटियों और फूलों से लदी हरी पहाड़ियां भी अनुपम सौंदर्य के दर्शन कराती हैं। पथ में भेड़ों को चराते हुए चरवाहे भी मिलते हैं। गरम चोला, पायजामा और हिमाचल की विशेष टोपी इनकी पोशाक है। चरवाहे अपने पास दो-तीन पालतू कुत्ते भी रखते हैं जो इनकी जंगली जानवरों से रक्षा करते हैं। छणछो से तीन घंटे में गौरीमठ पहुंचा जा सकता है। यह स्थान लगभग 13000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। एक कुण्ड है जिसके विषय में मान्यता है कि इस कुण्ड में गौरी स्नान किया करती थी। इस कुण्ड में केवल महिलायें ही स्नान करती हैं। इस कुण्ड से मणि महेश नौ किलोमीटर दूर है। पथ इतना सुंदर है कि थकान महसूस ही नहीं होती। बर्फ से ढके पर्वत सौंदर्य की अद्वितीय प्रतिमा प्रतीत होते हैं। इसके पश्चात् मध्य में स्थित है मणिमहेश ताल। ताल के मध्य में पत्थरों द्वारा मार्ग बना हुआ है जो मध्य में छोटे-छोटे मंदिरों तक पहुंचता है। खुले आकाश के नीचे पत्थरों से चौकी पर विराजमान हैं चौमुखी शिव पार्वती की मूर्तियां एवं अन्य प्रतिमाएं। प्रकृति की यह अद्वितीय धरोहर नेत्रों को ऐसा सम्पन्न कर देती है कि अपलक दृश्य निहारते रहने को करता है मन। (उर्वशी)