धर्म और संस्कृति की जान स्वामी विवेकानंद


जब-जब भी जुल्म बढ़ा, अन्याय की हवा चली, लोग बेसहारा हुए, तो उनकी पुकार सुनकर भगवान ने समय-समय पर इस धरती पर महान पुरुषों को भेजा, ताकि वे लोगों को अंधेरे की दुनिया से बाहर निकाल कर ज्ञान की रोशनी दिखा सकें। ऐसे ही भारत के इतिहास में वह भाग्यशाली दिन था, जिस दिन स्वामी विवेकानंद जी इस धरती पर अवतरित हुए। 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में श्री विश्वनाथ दत्ता तथा माता भुवनेश्वरी देवी के घर में वह चिराग आया जिसने सारे विश्व को रोशन कर दिया। उनका बचपन का नाम नरेन्द्र था। विश्वनाथ जी दत्ता कोलकाता की उच्च न्यायालय में अटार्नी एट लॉ के पद पर आसीन थे। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी बड़ी धार्मिक वृत्ति वाली निपुण महिला थीं जिनका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।उनकी माता जी उन्हें रामायण, महाभारत की कथाएं सुनाया करती थीं परंतु इससे उनकी धार्मिक प्रवृत्ति शांत नहीं हुई। इसी कड़ी में प्रो. विलियम हेस्टी ने उन्हें वर्ड्सवर्थ की कविता ‘द एक्सकर्शन’ पढ़ने का सुझाव दिया  जिससे विवेकानंद को आनंद की अनुभूति हुई। बाद में अपने भाई राम कृष्ण दत्त के आग्रह पर वह परमहंस के अनुयायी बन गए।  यहां उन्होंने अपने गुरु को एक बार प्रश्न किया, क्या आपने ईश्वर को देखा है? उत्तर मिला—हां, मैंने देखा है। जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूं। विवेकानंद समझ गए कि यह महान विभूति उनकी आध्यात्मिक इच्छा को शांत कर सकती है और उन्होंने गुरु जी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। 1886 ई. में गुरु जी के देह-अवसान के बाद गुरु जी के कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और राम-कृष्ण बंधुतत्व की नींव रखी जिससे आध्यात्मिकता की गति तीव्र हो गई। चिराग का अपना कोई मुकाम नहीं होता। वो जहां भी जाता है, रोशनी ही देता है। 1888 ई. में उन्होंने स्थान-स्थान पर जाकर भारत की आध्यात्मिकता और संस्कृति और धर्म को अपनाने हेतु विश्व भ्रमण का संकल्प लिया। वे भारत की सम्पूर्ण विजय चाहते थे। इस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु वह चीन, जापान और कनाडा होते हुए जुलाई 1893 ई. के मध्य में अमेरिका पहुंच गए। प्रो. जान हैनरी, श्रीमती जॉर्ज हेल जैसी हस्तियों ने उनका समर्थन किया और शिकागो के धर्म सम्मेलन में भाग लेने का उनका मार्ग प्रशस्त किया। इस सम्मेलन में तकरीबन 7 हज़ार लोग थे। विवेकानंद जी ने उन्हें भाई-बहन के शब्द से संबोधित किया और भारतीय संस्कृति की उपमा में कई घंटे बोलते रहे।  उन्होंने कहा कि भारत सर्वोच्च भूमि है। उसकी गरिमा को पूरा विश्व भी ज़ोर लगा कर नहीं मिटा सकता। इसके लिए युवकों को आगे आने का आह्वान दिया। उनके विचार में नैतिकता और चरित्र दो ऐसी महान शक्तियां हैं, जिनसे भारत का निर्माण हो सकता है। वह मानते थे कि युवा शक्ति सरमाया है, जो भारत जैसी भूमि को पावन और पवित्र बना सकते हैं।  संसार का कोई धर्म हिन्दू-धर्म के समान मनुष्य की महानता को ऊंचे स्तर पर नहीं ले जा सकता। हमारा दुर्भाग्य है कि यह महान विभूति समाज सेवक, परोपकारी 39 वर्ष की में ही हमें छोड़ कर चले गए। भारतवर्ष सदैव उन पर गर्व महसूस करता रहेगा और उनको याद करता रहेगा।

-गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी