खतरे की घंटी है बढ़ता तापमान


पिछले कई दशकों से हमारे जलवायु में परिवर्तन हो रहा है। लगभग सभी देश इस बढ़ते तापमान से प्रभावित हो रहे हैं। यूं तो पृथ्वी का तापमान औसतन 15 डिग्री सेल्सियस है। कुछ प्रमाणों की मानें तो पहले पृथ्वी का तापमान बहुत अधिक या कम रहा होगा। इस जलवायु परिवर्तन का असर हमें देखने को मिल रहा है, जिससे गर्मियां और लंबी तथा सर्दियां और छोटी होती जा रही हैं। बरसात भी अनियमित हो रही है, कहीं मूसलाधार बारिश से आफत की बाढ़ आ रही है तो कहीं सूखा पड़ा हुआ है। लगातार और तेजी से पिघलते ग्लेशियर इस मुसीबत को और भी बढ़ा रहे हैं।  जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारणों में तेजी से बढ़ता औद्योगिकरण, विकास और सब कुछ पा लेने की मनुष्य की भूख भी शामिल है। हम इस भौतिकवादी युग में मशीनी हो गए हैं, हर काम के लिए हमें मशीनों की जरूरत है और इस तकनीक के लिए हम जंगल काट रहे हैं, नदियों, तालाबों को सुखाकर उनके ऊपर बिल्डिंग बना रहे हैं। प्रकृति ने हमें बहुत खूबसूरत उपहार प्राकृतिक संसाधनों  के रूप में  प्रदान किये हैं। जंगल, नदियां, पेड़-पौंधे सब हमें मुफ्त में मिले हैं , और शायद इसलिए हमें इनकी कोई कद्र नहीं। जंगलों को काटकर उनके बदले कंक्रीट के आसमान छूते शहर बना दिये हैं। इसी उद्योगीकरण और विकास के चलते जो गैसें वातावरण में छोड़ी जाती हैं उनसे ग्रीनहाऊस की परतें मोटी होती जा रही हैं। यही परतें ऊर्जा सोख लेती हैं और नतीजा तापमान का बढ़ना होता है। पंछी, जानवर लगातार पलायन कर रहे हैं और कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। पेड़ों पर वक्त से पहले ही फूल और फल लग रहे हैं तो कुछ पौधे इस तापमान को सह न पाने के कारण सूख रहे हैं। अब तय हमें ही करना है कि हमेें क्या चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग या पृथ्वी। इसलिए जरूरी है कि विकास की नीतियों पर एक बार फिर विचार किया जाए,विकास तो मानव की जरूरत है परंतु ये विकास मानव जाति आने वाले भविष्य को ध्यान में रखते हुए करें।