हां, मैंने मुखबिरी की है!


मैं जब घर पहुंची तो जैसे कोहराम मचा था। मुझ पर पाबंदियां आयद करने के दावे किये जाने लगे थे, परन्तु मैंने भी स़ाफ-स़ाफ कह दिया था—‘मैंने अपनी मंज़िल तय कर ली है। मेरा रास्ता रोकने की आप कोशिश न ही करें, तो बेहतर होगा। घरवालों ने थोड़ा-बहुत उज्र किया, परन्तु फिर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। तो भी, घर का हर बशर मेरे फैसले को जायज़ करार देते नहीं लगा। इसके बाद हमारी दो-तीन और मुलाकातें इसी इलाके में हुईं। मुझे यह भी पता चला कि यह मकान उसे कश्मीर की आज़ादी के एक कट्टर हिमायती ने दे रखा है। इस मकान की आड़ में वह पुलिस और फौजी कवायद से बचा रहता था। इस दौरान हमारे आपसी संबंध दोस्ती से आगे जिस्म तक पहुंच चुके थे। जिस्मानी रिश्तों के दौरान ही, उसने मुझे इस बात के लिए उकसाया कि अगर मैं भी इस जंग में शामिल हो जाऊं तो वह पाकिस्तान में अपने आ़काओं से कह कर उसे कश्मीरी ़ख्वातूनी तन्ज़ीम की सरपरस्त बना देगा। उसने उसी कमरे में पड़ा एक तन्ज़ीमी लिबास मुझे पहनने को भी दिया था। इस प्रकार एक ओर जहां कश्मीर की आज़ादी की लहर मेरी रगों में खून के साथ दौड़ने लगी थी, वहीं वानी के साथ मेरे रिश्तों की एक नई तहरीर हर नये रोज़ लिखी जाने लगी थी। फिर एक दिन वो हो गया, जो सचमुच नहीं होना चाहिए था, और यही वो पल था, जिसने जन्नत की चाह में मेरे द्वारा अपनाई गई ज़िन्दगी को दोजख की गहरी खाई के दहाने पर ला खड़ा किया। मैं घर को हमेशा के  लिए छोड़ कर उसके साथ जंगलों में रहने के लिए आ गई थी। वह मुझे कई बार अपने ख़ुिफया ठिकानों पर भी ले गया। वह मुझे गांवों और आबादी वाले दीगर इलाकों में भी लेकर गया। मैंने देखा, और जाना भी कि , बेशक यह सच हो या झूठ भी, लोग इन लोगों से मुहब्बत भी करते थे, और इनसे डरते भी थे। वानी मुझे जहां-जहां भी ले कर गया, औरतें मेरी बलाए लेतीं, और मर्द मुझे झुक-झुक कर सलाम करते। हम जहां भी जाते, हमें देख कर आज़ादी-ए-कश्मीर को ले कर नारेबाज़ी होने लगती। वानी ने सचमुच मुझे कश्मीरियत की महारानी बना दिया था। मैं बिना परों के आसमानों में उड़ने लगी थी। जब कभी हम किसी पोशीदा मुहिम पर जाते, मैं अपने कंधे पर बंदूक भी रखने लगी थी।
इस दौरान कश्मीर में दहशतगर्दी भी बढ़ी थी और फौजी-आमद-ओ-ऱफत में भी इज़ाफा हुआ था। वानी अब पूरी तरह ब़ागी हो गया था, और मुझे भी उसके साथ पूरी तरह से शरीक ऐलान कर दिया गया था। हमारा ठिकाना अब कहीं एक जगह नहीं रह गया था... आज यहां, तो कल वहां; दिन कहीं, तो रात कहीं पर। कभी इस गांव, तो कभी उस बस्ती।  लेकिन एक दिन कुछ यूं हुआ कि मैं जैसे किसी पर-कटे परिन्दे की जानिब धड़ाम से ज़मीं पर आ गिरी थी। कहते हैं, औरत के भीतर माज़ी को याद रखने, और होनी को महसूस करने की कूवत आदमी की बनिस्बत ज्यादा होती है। वानी को मैं जैसे-जैसे जानती-समझती गई, उसकी ज़िन्दगी के और कई चेहरे मेरे सामने आते गये।
मुझे पता चला, कि ज़ाती ज़िन्दगी में वह शराब भी पीता था। वह नशा भी करता था। वह औरतबाज़ी में भी मशगूल रहता। जिस घर-गांव में हम पनाह लेते, उनकी औरतें/लड़कियां खुद उसके साथ हम-बिस्तर होने आ जातीं। यदि कोई नहीं आती, तो वानी के बंदे उनमें से किसी एक को खींच लाते। वानी अब तो मेरे बिल्कुल सामने दीगर औरतों के साथ हम-बिस्तर होने लगा था। वानी का यह गैबी चेहरा अब मुझे ़खौफ देने लगा था। मैं इस ज़िन्दगी से आज़िज होने लगी थी। आज़ादी-ए-कश्मीर के झंडे  को लेकर जो ख़्वाब मैंने देखे/बुने थे, वे सब शीशे की मानिंद एक-एक कर टूटते जा रहे थे। टूटे हुए शीशों की किरचें रेज़ा-रेज़ा मेरे जिस्म के भीतर, मेरे दिल में चुभती जातीं..., लेकिन उसके साथ जितनी दूर तक मैं निकल आई थी, वहां से बच कर निकल पाना भी अब मेरे लिए मुमकिन नहीं रहा था। मैं इस दौर-ए-ज़िन्दगी से निजात हासिल करना चाहती थी, परन्तु यह काम इतना आसान नहीं लगता था। गाहे-बगाहे मैं इनके साथ दूर से और दूर होते जा रही थी।
इस मुहिम का हिस्सा बने इन लोगों और पाकिस्तान में बैठे इनके आ़काओं ने कश्मीरी अवाम को कुछ इस सीमा तक वरगला रखा है कि जिस इलाका-ए-आबादी में हम रह रहे थे, उसका हर गांव, हर घर, और हर घर का हर बाशिन्दा इनके लिए कुछ भी कर गुज़रने को हर समय तैयार रहता है। इसी कारण हम जिस भी जानिब चले जाते, बच्चे-बूढ़े, औरतें-मर्द आज़ादी के हक में नारेबाज़ी करने लगते। युवतियां बाहें उछाल-उछाल कर इनकी ओर ताकने लगतीं। जिस घर में हम मुकाम बना लेते, उस घर के बाहर खीर, बादाम-पिस्ता, फल और गोश्त की तरकारी लिये एक से अधिक लोग जमा हो जाते। इर्द-गिर्द के किसी भी गांव में पुलिस की नकल-ओ-हरकत की हर जानकारी तत्काल इन तक पहुंच जाती थी। इनके िखल़ाफ मुखबिरी होने वाली ज़रा-सी सूह मिलने पर ये शक्की आदमी को बड़ी बेदर्दी से, तसीहे देकर मार देते। सितम-ज़ऱीफी की हद देखिये, कि इनकी इस ज़ालिमाना हरकत के विरुद्ध इलाके का कोई बशर रत्ती भर आवाज़ नहीं उठाता। यहां तक कि जिस घर के बंदे को ये उठा कर ले जाते, उसका भी कोई सदस्य मुंह तक नहीं खोलता। जंगल-जंगल इनके अड्डे, बस्ती-बस्ती और बस्ती का हर घर इनका ठिकाना। तब एक दिन हद हो गई...यानि वह हो गया जो नहीं होना चाहिए था...और यह वो हुआ था जिसने मुझे भी हद से आगे बढ़ कर कुछ कर गुज़रने को मजबूर कर दिया। वानी की बातों से मैंने एक दिन पहले ही अन्दाज़ा लगा लिया था, कि मकबूजा कश्मीर से कुछ जेहादीन आ रहे हैं जिनके साथ जंगल में करीब-ए-हद एक मीटिंग तय है। अगले ही दिन जब बड़ी सवेर, मुंह अन्धेरे वानी ने मुझे चलने के लिए कहा, तो मैं समझ गई थी कि वो तयशुदा मीटिंग आज ही है। हमारे साथ दो और लोग  चले थे। उनके पास आधुनिक स्वचालित हथियार थे। डेढ़-दो घंटे चलने के बाद हम जब एक मुकाम पर पहुंचे तो वहां पहले से चार लोग मौजूद थे। सभी के पास अपने हथियार थे। उनके साथ एक खातून भी थी जो उम्र से करीब-करीब पैंतीस-छत्तीस बरस की लगी थी। उसने शोख नीले रंग की सलवार-कमीज पहन रखी थी। पांव में लाहौरी सैंडिल थे—बस्कूए वाले। उसकी कमर में बंधी बैल्ट के साथ लटक रहा था एक बड़ा खूबसूरत-सा रिवाल्वर।