अब स्वर्ण संकट में घिर गई कृषि आर्थिकता


 किसानों द्वारा लिये जाते कृषि ऋण के संदर्भ में केन्द्रीय रिज़र्व बैंक के ताज़ा खुलासे ने नि:संदेह रूप से समाज खास तौर पर कृषक समाज, सरकारों और वित्तीय क्षेत्र में घोर चिन्ता व्याप्त कर दी है। इस खुलासे में कहा गया है कि देश के किसान कृषि हेतु ऋण लेने के लिए अपनी ज़मीनों के बाद अब अपने पारिवारिक सोने को भी गिरवी रखने लगे हैं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि इस प्रक्रिया के अन्तर्गत किसान कृषि कार्यों हेतु वांछित मात्रा से कहीं अधिक ऋण उठा लेते हैं, जिससे इस ऋण को लौटा पौने की उनकी क्षमता प्रभावित होने लगती है। इससे यह भी होता है कि ऋण में ली गई धन-राशि का समयानुकूल इस्तेमाल न हो पाने से स्थितियां विपरीत रूप धारण करने लगती हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार समय पर ऋण न  लौटाये जाने से किसान परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है, जो अन्तत: गम्भीर परिणामों का सूचक बनने लगता है। इस रिपोर्ट में किसानों और कृषि क्षेत्र द्वारा लिये जाने वाले ऋणों को लेकर समस्या के गम्भीर होते जाने की चेतावनी भी दी गई है। रिज़र्व बैंक ने यह खुलासा बैंक की सितम्बर मास हेतु जारी आन्तरिक कार्यकारी समूह की रिपोर्ट में किया है। नि:संदेह यह रिपोर्ट न केवल चौंकाती है, अपितु कृषि ऋणों पर अधिकाधिक केन्द्रित होती जा रही देश की कृषि एवं ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था की बढ़ती जाती समस्याओं को ओर भी देश के समूचे वर्गों का ध्यान आकर्षित करती है। देश के पंजाब एवं हरियाणा सरीखे कृषि-आधारित प्रांतों में तो स्थिति इससे अधिक गम्भीर हो जाने की प्रबल आशंका है। सोने की बढ़ती कीमतों और लिये गये ऋण पर बढ़ते दबाव के कारण किसानों के ऋण की राशि भी बढ़ती जाती है जिसे लौटा पाना किसानों के लिए बहुधा सम्भव नहीं हो पाता जिससे किसान परिवार एक ऐसे चक्र-व्यूह में घिर जाता है जहां से उसका निकल पाना बेहद कठिन हो जाता है। इस कारण किसानों द्वारा आत्म-हत्या किये जाने की सम्भावनाएं भी बढ़ती जाती हैं। कृषि एवं किसानों की इस चरण पर होने वाली दुर्दशा का आलम यह हो गया है कि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय को इन
दोनों राज्यों की सरकारों को यह निर्देश देना पड़ा कि किसानों को इस संकट से उभारने के लिए सरकारें प्राथमिकता के आधार पर पग उठायें। स्थिति यह भी हो गई है कि कृषि ऋणों के संजाल में घिर गई ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था चरमराने के कगार पर पहुंच गई है। किसानों के अतिरिक्त कृषि श्रमिक और सम्बद्ध व्यवसायों से जुड़े लोग भी प्रभावित होने लगे हैं। कृषि क्षेत्र की समस्याएं बढ़ने से  इसका असर अन्तत: देश की समूची अर्थ-व्यवस्था पर पड़ने की सम्भावनाएं भी बन जाती हैं। रिज़र्व बैंक की इस रिपोर्ट में निष्कर्ष-स्वरूप यह खुलासा भी किया गया है कि पारिवारिक सोने की कीमत पर लिये गये ऋण से किसान-परिवारों पर विपरीत प्रभाव पड़ने के परिणाम देर-सवेर गम्भीर हो सकते हैं। रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि ऋणों पर आधारित ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकारों द्वारा लोकप्रियता के धरातल पर थोड़ा-बहुत ऋण माफ किये जाने के चर्चे तो बहुत होते हैं, परन्तु अधिकतर ऐसी घोषणाएं स्थितियों की चादर पर पैबन्द लगाने
जैसी साबित होती हैं। सरकारें ऋण-माफी की घोषणाएं तो कर देती हैं, परन्तु इतनी बड़ी राशि की माफी सम्भव न हो पाने पर ये घोषणाएं त्रिशंकू की भांति अधर में लटक जाती हैं, तथा किसान आशा-निराशा के झूले में झूलते हुए, संकट के कम होने की प्रतीक्षा में अधिक फंसते जाते हैं। कृषि से सम्बद्ध उपकरणों एवं खाद-बीज तथा घरेलू वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से किसान परिवारों का सम्पूर्ण संतुलन बिगड़ जाता है जिस कारण वे आत्म-हत्या जैसा कठोर एवं निर्मम फैसला लेने के पथ पर बढ़ जाते हैं। हम समझते हैं कि समय आ गया है कि सरकारें, समाज और वित्त विशेषज्ञ किसी ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश करें, जहां से ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था और खास तौर पर किसानों एवं कृषि क्षेत्र के संकट पर पार पाने के लिए ठोस उपाय किये जा सकें। चुनावों से पूर्व सस्ती लोकप्रियता एवं मत हासिल करने के लिए राजनीतिक दल एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धा हेतु कृषि ऋणों की माफी की बढ़-चढ़ कर घोषणाएं तो कर देते हैं परन्तु शलगमों से मिट्टी झाड़ने की क्रिया के अन्तर्गत कुछ अपनों की झोली में रेवड़ियां डालने के बाद ऐसी घोषणाएं दम तोड़ जाती हैं। इससे किसान और कृषि का वित्तीय संकट कम होने की बजाय बढ़ जाता है। पहले तो कृषि ऋणों के कारण किसान की ज़मीन ही गिरवी होने के संकट में घिरती थी। अब उनकी पारिवारिक सुरक्षा का ज़ामिन सोना भी ऋणों के संकट में घिर गया, तो किसानों की रही-सही सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी। इससे ग्रामीण धरातल पर पारिवारिक रिश्तों का ताना-बाना बिखर जाने का संकट भी पैदा होने लगेगा। हम समझते हैं कि नि:संदेह यदि हमें अपने देश के किसान और पंजाब जैसे प्रांतों की रीढ़ की हड्डी कृषि को बचाना है तो एक ओर जहां किसान को ऋणों के नाग-पाश से बचाना ज़रूरी है, वहीं कृषि क्षेत्र को आत्म-निर्भर बनाना भी उतना ही लाज़िमी होगा। यह पग जितनी शीघ्र उठाया जाएगा, उतना ही इस देश के सम्पूर्ण हित में होगा।