दिल्ली अग्नि-कांड : लापरवाही का कलंक गाथा


है13 जून 1997 को जब राजधानी दिल्ली के उपहार सिनेमा में एक सरे दोपहर 59 लोग जलकर खाक हो गये थे और करीब 105 लोग बुरी तरह से झुलस गये थे, उस भयावह मंजर को याद करके आज भी राजधानी दिल्ली दहल जाती है। पिछली सदी के आखिरी सालों में हुए उस हादसे के बाद निराशावादी से निराशावादी दिल्लीवासी का यही सोचना था कि उपहार कांड की भयावहता दिल्ली कभी नहीं भूलेगी और इस भयावह कांड की सजगता के चलते फि र कभी ऐसी दुर्घटना नहीं होगी। लगा था कि शायद इस बेहद भयानक अग्निकांड के बाद शासन-प्रशासन हमेशा के लिए चुस्त- दुरुस्त हो जायेगा और कभी भी उपहार की पुनरावृत्ति नहीं होगी।  लेकिन ऐसा नहीं हो सका। हम उपहार कांड जैसे भयावह अग्निकांड को भी न केवल जल्द ही भूल गये बल्कि फि र से बार-बार वही गलतियां दोहराने लगे जिनकी वजह से उपहार सिनेमा में आग लगी थी। पिछले दो-ढाई दशकों की तो बात छोड़ ही दीजिए अगर सिर्फ  पिछले तीन सालों में देखें तो राजधानी दिल्ली में कम से कम 4 दर्जन से ज्यादा आगजनी की दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें 9 दुर्घटनाएं तो सार्वजनिक स्थलों पर हुई हैं और जिनमें बड़े पैमाने पर लोग हताहत हुए हैं। अगर सिर्फ  इसी साल को लें तो 8 दिसंबर 2019 के तड़के अनाज मंडी इलाके की एक खिलौना फैक्टरी में लगी आग इस साल की चौथी बड़ी आग की दुर्घटना है, जिसमें इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 43 लोगों ने दम तोड़ दिया और कम से कम दो दर्जन अभी लोग घायल हैं, जिनमें 5 की हालत काफी नाजुक है। इसी साल इससे पहले 12 फरवरी 2019 को करोलबाग इलाके के एक होटल में आग लग गई थी, जिसमें 17 लोग जिंदा जल गये थे। इसके बाद अभी कुछ महीने ही और गुजरे थे कि एक और बड़ी आग की दुर्घटना राजधानी दिल्ली में हुई बस किसी सौभाग्य के चलते इसमें लोग कम हताहत हुए थे। 13 जुलाई 2019 को भी दिल्ली के झिलमिल इलाके में एक रबर की फैक्टरी में आग लगी और इन सभी आग की दुर्घटनाओं की अगर तारीखें हटा दी जाएं, जगहों के नाम बदल दिये जाएं तो सब एक जैसी दुर्घटनाएं ही लगती हैं, जिनमें व्यक्तिगत लापरवाहियों से कहीं ज्यादा शासन-प्रशासन की लापरवाही के सूत्र मौजूद हैं।हिंदुस्तान एक गर्म जलवायु वाला देश है, नमी से रहित हवाएं और लू यहां गर्मियों के कुछ महीनों में देश के लगभग दो तिहाई इलाकों में चलती हैं, जिससे आग लगना इस देश में एक स्वाभाविक घटना है। मई और जून के महीने में देशभर में 1.5 लाख से ज्यादा आगजनी की दुर्घटनाएं होती हैं, लेकिन इन लाखों दुर्घटनाओं में किसी भी साल 10 लोगों की भी मौत नहीं हुई। इससे यह पता चलता है कि आगजनी की जो दुर्घटनाएं मौसम या कुदरत की वजहों से होती हैं, जिनमें हजारों सालों की इंसानी अनुभव व बचाव की सीख शामिल है, उनमें आम लोग कम से कम जान की सुरक्षा तो कर ही लेते हैं, भले माल की पूरी तरह से सुरक्षा न कर पाएं। लेकिन दिल्ली जैसे देश के सबसे महत्वपूर्ण शहर में जो हर साल बेमौसम आग की बड़ी दुर्घटनाएं घटती हैं, उनमें माल की सुरक्षा तो हो ही नहीं पाती, जान की सुरक्षा भी आमतौर पर मुश्किल ही होती है या बड़े पैमाने पर लोगों को अपनी जान ऐसी दुर्घटनाओं के चलते गंवानी पड़ती है। सवाल है हर साल देश के लगभग हर शहर में जब दर्जनों झुग्गियां जलती हैं, तो उनमें आमतौर पर एक भी आदमी की मौत जलने से नहीं होती तो फि र असमय और उन सार्वजनिक जगहों पर जैसे फैक्टरियों, बैंक्विट हॉल, सिनेमाघर, होटलों में लगी आग में लोग अपनी जान क्यों इस तरह गंवाते हैं? इसका सीधा-सा मतलब यह है कि यहां लगी आग किसी स्वभाविकता का नतीजा नहीं होती बल्कि नियमों, कानूनों की अनदेखी और उल्लंघन के साथ-साथ न्यूनतम सजगताओं की घोर प्रशासनिक लापरवाहियों का नतीजा होती है। दिल्ली के जिस अनाज मंडी इलाके में 8 दिसंबर 2019 के तड़के एक अवैध खिलौना फैक्टरी में आग लगी और 43 लोगों की देखते ही देखते जान चली गई, वह आग महज शॉर्ट सर्किट का नतीजा नहीं थी। वह भी घोर लापरवाही और कुशासन की पराकाष्ठा थी। लेकिन प्रशासन की बेशर्मी और चालाकी की पराकाष्ठा देखिए कि अपनी गलती से लोगों का ध्यान हटाने के लिए फैक्टरी मालिक की गिरफ्तारी को कुछ इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे लोगों की मौत से भी ये कहीं बड़ी उपलब्धि हो। मीडिया भी या तो प्रशासन की  चालाकी का शिकार हो जाता है या चकाचौंध में वह मूल अपराधी को जानने और उसकी तरफ  इशारा करने की अपनी ड्यूटी ही भूल जाता है। यही नहीं वह उल्टे प्रशासन की इच्छा के साथ अपना सुर मिला लेता है। अगर ऐसा नहीं होता तो जिस ब्रेकिंग न्यूज में बार-बार इसे उपलब्धि के तौरपर दिखलाया जा रहा था कि फैक्टरी के मालिक को गिरफ्तार किया गया, बेहतर होता उसी ब्रेकिंग न्यूज में उन तमाम बड़े अधिकारियों के नाम बार-बार उजागर किये जाते, जिनके कार्यकाल में इस फैक्टरी में नियमों, कानूनों का घोर उल्लंघन हुआ। गौरतलब है कि यह फैक्टरी कोई चोरी छिपे नहीं चलायी जा रही थी बल्कि यह खुले तौरपर काम कर रही थी, जहां दर्जनों लोग रहते थे। जबकि इस न्यूनतम नियम का भी यहां पालन नहीं हुआ था कि जो लोग रह रहे हैं, उनके बारे में पुलिस के पास कोई विश्वसनीय तथ्यात्मक जानकारी हो। फैक्टरी में आग लगने की स्थिति में बचाव का कोई यांत्रिक उपाय तो था ही नहीं, इस स्थिति में फैक्टरी से बाहर निकलने और भागने का कोई विधिवत रास्ता भी नहीं था। इन लापरवाहियों के लिए शासन-प्रशासन भले कानून की कितनी भी आड़ लेने की कोशिश करे, लेकिन हर प्रशासनिक अधिकारी को इंसान की जिंदगी पर मंडराते संकट के एवज में किसी भी नियम के विरुद्ध जाकर कार्यवाही करने का हक है।  आखिर शासन-प्रशासन ने कभी भी इस तरह की न सिर्फ  कोई कार्यवाही की बल्कि ऐसी किसी कार्यवाही की जरूरत का कभी जिक्र भी नहीं किया? जाहिर है भ्रष्टाचार की खुशामदी सौगात के सामने सारे नियम कानून गैर-वाजिब हो जाते हैं। इसलिए महज एक साल के भीतर चौथी बड़ी आग की दुर्घटना राजधानी दिल्ली में महज घोर लापरवाही की कहानी नहीं है बल्कि यह इस लापरवाही को बाईपास करने की चालाकी भी कलंकगाथा भी है। इस कलंक के लिए सिर्फ  सरकारों को कोसकर या उन्हें गरियाकर कोई फायदा नहीं होने वाला, जब तक आम लोग और नागरिक संस्थाएं इंसान के जीवन के प्रति और अपनी ड्यूटी को लेकर संवेदनशील व ईमानदार नहीं होंगी, ऐसी कलंकगाथाओं से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर