अमरीका के बदले रुख से बुरे फंसे यूक्रेन और यूरोपीय देश

हाल में सत्ता परिवर्तन के बाद अमरीका ने अपनी नीतियों में बहुत बड़ा बदलाव करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा में यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस के खिलाफ आए प्रस्ताव में पुतिन का साथ दिया। यही नहीं अमरीका के हस्तक्षेप के बाद जी-7 देशों की ओर से रूसी हमले की आलोचना करने के लिए जारी बयान भी उसे हल्का कर दिया गया और रूस को हमलावर मानने से इन्कार कर दिया। ट्रम्प के रक्षा सचिव पीट हेगसेथ कह चुके हैं कि 2014 और 2022 में जो इलाके रूस ने हासिल किए हैं, अगर यूक्रेन उन्हें वापिस हासिल करने की उम्मीद कर रहा है तो वह आशा ‘अवास्तविक’ है। यही नहीं, यूक्रेन के लिए और भी बुरी खबरें हैं। उसे नाटो में शामिल नहीं किया जाएगा। दूसरी ओर अगर कोई शांति समझौता रूस और यूक्रेन के बीच होता है तो उस पर क्रियान्वयन के लिए अमरीका वहां सैना भी नहीं भेजेगा। अगर यूरोपीय देश अपनी तरफ से यूक्रेन में सेना भेजते हैं तो उनकी सुरक्षा का दायित्व नाटो पर नहीं होगा। अमरीका का इस तरह पाला बदलना रूस के लिए यूक्रेन पर हमले के तीन साल पूरे होने पर अमरीका की बड़ी सौगात की तरह है लेकिन इससे अब तक रूस के खिलाफ  युद्ध में अमरीका के साथ रहे जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देश बुरे फंस गए हैं और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। यूरोपीय देश चाहते हैं कि अगर अमरीका युद्ध रुकवाने के लिए रूस से कोई बातचीत करता है तो उन्हें भी उसका हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इन देशों का मानना है कि वार्ता में जो भी हल निकले, उसमें यूक्रेन को मज़बूत स्थिति में होना चाहिए। वर्तमान हालात में यूक्रेन को यकीन नहीं है कि वह वित्तीय और सैन्य प्रतिबद्धता के लिए अपने सबसे मज़बूत सहयोगी अमरीका पर और अधिक भरोसा कर सकता है। उसको लग रहा है कि यूक्रेन केवल अमरीकी कम्पनियों के लिए लूट और युद्ध का मैदान बनकर रह गया है। उसके लिए यह बात इसलिए भी झटका थी कि गत दिसम्बर माह में ही ट्रम्प और ज़ेलेंस्की की मुलाकात हुई थी। इससे पहले बाइडन सरकार की नीति थी कि यूक्रेन पर अगर कोई बातचीत होगी तो उसमें वह भी शामिल होगा, लेकिन ट्रम्प ने पहले पुतिन से बात की और फिर ज़ेलेंस्की से चर्चा। ट्रम्प-पुतिन की बातचीत से बिल्कुल पहले ज़ेलेंस्की ने कहा था, ‘अगर यूक्रेन युद्ध पर रूस और अमरीका बात करें तो अमरीका को सही सूचनाएं नहीं मिलेंगी।’ यानी अगर सही बात ही नहीं पहुंचेगी तो सही फैसला कैसे होगा।
वास्तव में, शांति की इच्छा पुतिन और ज़ेलेंस्की दोनों ज़ाहिर करते रहे हैं, लेकिन शांति किस कीमत पर होनी चाहिए, इसे लेकर दोनों की राय अलग-अलग है। पुतिन चाहते हैं कि यूक्रेन के जिन इलाकों पर उनका कब्ज़ा हो चुका है, वे वापिस न लिए जाएं। ज़ेलेंस्की चाहते हैं कि रूस वे इलाके यूक्रेन को वापिस करे। पुतिन की मुश्किल यह है कि अगर वह जीते गए इलाके वापिस करते हैं तो एक तरह से युद्ध में उनकी हार मानी जाएगी और इससे उनकी साख कमज़ोर होगी।
ज़ेलेंस्की अगर यूक्रेन के इलाके वापिस लिए बगैर युद्ध रोकते हैं तो उनके लिए राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा। वैसे भी उनका आधिकारिक कार्यकाल पहले ही खत्म हो चुका है। फिलहाल, युद्ध की वजह से वहां चुनाव नहीं हो पा रहे हैं। जब जो बाइडन राष्ट्रपति थे, तब यूक्रेन को अमरीका और यूरोपीय देशों की ओर से दी जा रही मदद लोकतंत्र को बचाने की जंग थी। उन्हें इस बात का एहसास था कि अगर पुतिन की मनमानी को नहीं रोका गया तो वह विस्तारवादी नीतियों पर आगे बढ़ते रहेंगे। पुतिन के बारे में माना जाता रहा है कि सोवियत संघ के दौर के साम्राज्यवाद को वह फिर से स्थापित करना चाहते हैं। 2014 में उन्होंने यूक्रेन से क्रीमिया को छीना था। 2022 के बाद युद्ध में भी पुतिन यूक्रेन के कई क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने में कामयाब रहे हैं। यूक्रेन के सहयोगी यूरोपीय देश चाहते हैं कि युद्ध पुतिन की शर्तों पर खत्म नहीं करना चाहिए। युद्ध खत्म करवाने की एवज में रूसी राष्ट्रपति से भी रियायतें हासिल करनी चाहिएं। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह न सिर्फ  दुनिया में लोकतंत्र के लिए झटका होगा, बल्कि इससे दूसरी ताकतों को मनमानी करने का मौका मिलेगा।
आशंका है कि चीन भी ताइवान को अपने में मिलाने के लिए युद्ध शुरू कर सकता है। हाल ही में शी जिनपिंग ने कहा कि ताइवान मसले को वह आने वाली पीढ़ियों की खातिर नहीं छोड़ना चाहते यानी वह अपने कार्यकाल में उसका विलय चीन में करना चाहते हैं। वहीं ट्रम्प ने भी ऐसे संकेत दिए। (अतिति)

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